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950 के दशक में भारत में विकेटकीपिंग चयन किसी ‘रूसी रूलेट’ जैसा महसूस होता था एक गलती, और आप टीम से बाहर. इस अराजकता में जिन नामों ने जगह बनाई, उनमें से एक थे पी.जी. “नाना” जोशी. पुणे के इस विनम्र खिलाड़ी ने अपनी पढ़ाई का खर्च उठाने के लिए बर्तन तक धोए, और बाद में भारत के लिए विकेट के पीछे खड़े हुए.
1950 में विकेट-कीपर नाना जोशी को एक कैच छोड़ने की वजह टीम से बाहर कर दिया गया
नई दिल्ली. इन दिनों आईपीएल के मैचों में जिस तरह से कैच छूट रहे है और खराब फील्डिंग की वजह से मैच के नतीजे बदल जा रहे है उससे बरबस भारतीय क्रिकेट की वो कहानी याद आती है जहां एक कैच करियर खत्म कर देता था. क्रिकेट के इतिहास में कुछ कहानियाँ ऐसी होती हैं जो रिकॉर्ड्स से नहीं, बल्कि किस्मत, संघर्ष और एक छोटी सी गलती से लिखी जाती हैं. 1950 के दशक का भारतीय क्रिकेट भी कुछ ऐसा ही था जहाँ विकेटकीपर का चयन किसी जुए से कम नहीं लगता था. एक चूक, और करियर खत्म. इसी अनिश्चितता के दौर में उभरे एक शांत स्वभाव के खिलाड़ी पी.जी. “नाना” जोशी जिनकी कहानी आज भी दिल को छू जाती है
1950 के दशक में भारत में विकेटकीपिंग चयन किसी ‘रूसी रूलेट’ जैसा महसूस होता था एक गलती, और आप टीम से बाहर. इस अराजकता में जिन नामों ने जगह बनाई, उनमें से एक थे पी.जी. “नाना” जोशी. पुणे के इस विनम्र खिलाड़ी ने अपनी पढ़ाई का खर्च उठाने के लिए बर्तन तक धोए, और बाद में भारत के लिए विकेट के पीछे खड़े हुए.
जोशी की जलवा
जोशी ने तब सुर्खियाँ बटोरीं जब उन्होंने 1950 में कॉमनवेल्थ इलेवन के खिलाफ नाबाद शतक जड़ा और छह शिकार किए. उस टीम में फ्रैंक वॉरेल और बिल एले जैसे बड़े नाम शामिल थे लेकिन जब तक उन्होंने टेस्ट डेब्यू किया, तब तक भारत में विकेटकीपिंग चयन पूरी तरह किस्मत का खेल बन चुका था. जोशी, माधव मंत्री, प्रोबीर सेन, नारें तम्हाणे सभी काबिल, लेकिन कोई भी सुरक्षित नहीं. एक कैच छूटा, एक स्टंपिंग मिस हुई… और आप टीम से बाहर.
ड्रॉप कैच ने खत्म किया करियर
1960 में, नाना जोशी ने हनीफ मोहम्मद का कैच 12 रन पर छोड़ दिया और वह 160 रन बना गए. बस, यही एक गलती उनके करियर पर भारी पड़ गई. हालांकि, उसी मैच में जोशी ने नाबाद 52 रन बनाए और नौवें विकेट के लिए एक रिकॉर्ड साझेदारी भी की, जो छह दशकों बाद भी कायम है. पी.जी. “नाना” जोशी का अंतरराष्ट्रीय करियर छोटा रहा, लेकिन उन्होंने अपने सीमित मौकों में योगदान दिया. 4 टेस्ट की 6 पारियों में वो 20 की औसत से 100 रन बनाए जिसमें एक अर्धशतक शामिल है.घरेलू क्रिकेट में नाना जोशी का प्रदर्शन काफी प्रभावशाली रहा और यहीं से उन्हें पहचान मिली.
यह कहानी सिर्फ एक खिलाड़ी की नहीं, बल्कि उस दौर की है जहाँ प्रतिभा के साथ-साथ किस्मत भी उतनी ही जरूरी थी यह कहानी है संघर्ष, दर्द और खामोश वापसी की एक ऐसे भूले-बिसरे विकेटकीपर की, जिसने क्रिकेट का सबसे मुश्किल खेल खेला: खुद को बनाए रखने का संघर्ष.
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मैं, राजीव मिश्रा, वर्तमान में नेटवर्क 18 में एसोसिएट स्पोर्ट्स एडिटर के रूप में कार्यरत हूँ. इस भूमिका में मैं डिजिटल स्पोर्ट्स कंटेंट की योजना, संपादकीय रणनीति और एंकरिंग की जिम्मेदारी निभाता हूँ. खेल पत्रका…और पढ़ें


