नई दिल्ली. क्रिकेट इतिहास में कुछ कहानियां जितनी प्रेरणादायक होती हैं, उनका अंत उतना ही दर्दनाक होता है. साल 2003 का पुरुष क्रिकेट वर्ल्ड कप याद कीजिए. सचिन तेंदुलकर का वो ऐतिहासिक दौर, सौरव गांगुली की कप्तानी और इन सबके बीच लाल-हरी जर्सी में सजी एक टीम, जिसने पूरी दुनिया को चौंका दिया था. वह टीम थी केन्या. स्टीव टिकोलो की कप्तानी वाली इस टीम ने दिग्गजों को धूल चटाते हुए 2003 वर्ल्ड कप के सेमीफाइनल में जगह बनाई थी. केन्या क्रिकेट का वह स्वर्ण काल था और ऐसा लग रहा था कि टेस्ट क्रिकेट जगत को जल्द ही उसका अगला ‘फुल मेंबर’ (पूर्ण सदस्य) मिलने वाला है. लेकिन आज, उसी अफ्रीका महाद्वीप से नामीबिया और ओमान जैसी टीमें वैश्विक पटल पर चमक रही हैं, वहीं केन्या क्रिकेट के नक्शे से लगभग गायब हो चुका है. आखिर केन्याई क्रिकेट का यह पतन कैसे हुआ और क्यों ओमान, नामीबिया या पीएनजी (पापुआ न्यू गिनी) जैसे देश आगे निकल गए?
2003 में दक्षिण अफ्रीका की धरती पर खेले गए विश्व कप में केन्या ने वह कर दिखाया जो किसी एसोसिएट टीम ने सपने में भी नहीं सोचा था. उन्होंने ग्रुप स्टेज में पूर्व चैंपियन श्रीलंका को 53 रनों से हराकर तहलका मचा दिया था. इसके बाद सुपर सिक्स चरण में जिम्बाब्वे को मात देकर इस टीम ने सीधे सेमीफाइनल का टिकट कटाया. हालांकि, सेमीफाइनल में भारतीय टीम ने सौरव गांगुली के शतक की बदौलत केन्या को 91 रनों से हरा दिया, लेकिन केन्याई खिलाड़ियों ने दुनिया का दिल जीत लिया था. कॉलिन्स ओबुया, थॉमस ओडोयो, आसिफ करीम और मौरिस ओडुम्बे जैसे नाम रातों-रात स्टार बन गए थे.
केन्या क्रिकेट टीम आज विश्व क्रिकेट से गायब हो चुकी है.
पतन की शुरुआत अंदरूनी राजनीति और भ्रष्टाचार
2003 की ऐतिहासिक सफलता के बाद केन्याई क्रिकेट को जो उड़ान भरनी चाहिए थी, वह खुद के ही बनाए जाल में उलझकर रह गई. केन्याई क्रिकेट के पतन की सबसे बड़ी वजह खराब प्रशासन, भ्रष्टाचार और बोर्ड की अंदरूनी राजनीति रही.
खिलाड़ियों और बोर्ड का विवाद
वर्ल्ड कप के तुरंत बाद खिलाड़ियों और तत्कालीन ‘केन्या क्रिकेट एसोसिएशन’ (KCA) के बीच पैसों और अनुबंधों को लेकर लंबी लड़ाई शुरू हो गई. खिलाड़ियों ने हड़ताल कर दी, जिससे घरेलू ढांचा पूरी तरह चरमरा गया.
मैच फिक्सिंग और प्रतिबंध
केन्या के स्टार खिलाड़ी मौरिस ओडुम्बे पर 2004 में मैच फिक्सिंग के आरोपों के चलते 5 साल का प्रतिबंध लग गया. इसने टीम की रीढ़ तोड़ दी. बोर्ड के भीतर मचे वित्तीय घमासान और 2005 तक बोर्ड के पूरी तरह भंग होने की स्थिति के कारण प्रायोजक (Sponsors) टीम को छोड़कर भाग गए. केन्या क्रिकेट पूरी तरह कंगाल हो गया.
नई पीढ़ी को तैयार करने में नाकामी
केन्या की सबसे बड़ी गलती यह रही कि उन्होंने अपनी उस ‘गोल्डन जनरेशन’ (स्टीव टिकोलो, थॉमस ओडोयो आदि) का कोई विकल्प तैयार नहीं किया. जब ये सीनियर खिलाड़ी संन्यास लेने लगे, तो पीछे कोई ऐसा युवा खिलाड़ी नहीं था जो उनकी जगह ले सके. देश में न तो कोई ठोस स्कूल या क्लब क्रिकेट का ढांचा था और न ही कोई हाई-परफॉर्मेंस सेंटर. नतीजा यह हुआ कि 2011 वर्ल्ड कप के बाद केन्या का ग्राफ इतनी तेजी से गिरा कि वे वन-डे इंटरनेशनल (ODI) का दर्जा भी गंवा बैठे.
दूसरी तरफ नामीबिया, ओमान और पीएनजी का उदय जहां केन्या ने अपने पैरों पर खुद कुल्हाड़ी मारी, वहीं दुनिया की दूसरी एसोसिएट टीमों ने सही दिशा में कदम बढ़ाए. टीम सफलता की वजह वर्तमान स्थिति नामीबिया मजबूत घरेलू ढांचा और दक्षिण अफ्रीकी क्रिकेट का सहयोग. टी20 वर्ल्ड कप में लगातार भागीदारी और शीर्ष एसोसिएट टीमों में शामिल. नामीबिया और ओमान जैसी टीमों ने आईसीसी (ICC) से मिलने वाले फंड का सही इस्तेमाल किया. उन्होंने आधुनिक क्रिकेट स्टेडियम बनाए, विदेशी कोच नियुक्त किए और अपने खिलाड़ियों को पेशेवर अनुबंध दिए. इसके उलट, केन्या को जो मौके और पैसा मिला, उसे वहां के अधिकारियों ने आपसी लड़ाई और कुप्रबंधन में गंवा दिया.
कहां है आज केन्या?
वर्तमान समय में केन्या क्रिकेट की हालत बेहद दयनीय है. वे अब विश्व कप खेलने की दौड़ से कोसों दूर हैं और अफ्रीका के क्षेत्रीय क्वालिफायर्स में भी युगांडा, तंजानिया और नाइजीरिया जैसी टीमों से हार रहे हैं. वे आईसीसी की डिवीजन-3 स्तर की क्रिकेट में संघर्ष कर रहे हैं, जहां उन्हें आधिकारिक वनडे मैच खेलने का मौका तक नहीं मिलता.


