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क्या मंदिर के नियमों को बदल सकता है कोई सदस्य? सबरीमाला केस में धार्मिक आजादी और अनुशासन पर SC में तीखी बहस

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नई दिल्ली: ऐतिहासिक सबरीमाला मंदिर मामले में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के समक्ष सुनवाई जारी है. वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल सुब्रमणियम ने धार्मिक स्वतंत्रता और व्यक्तिगत अधिकारों के बीच के सूक्ष्म अंतर को स्पष्ट करते हुए महत्वपूर्ण दलीलें पेश कीं. उन्होंने अनुच्छेद 25 (व्यक्तिगत धार्मिक स्वतंत्रता) और अनुच्छेद 26 (धार्मिक संप्रदायों के अधिकार) के अंतर्संबंधों पर विस्तार से प्रकाश डाला.

वरिष्ठ वकील गोपाल सुब्रमणियम के तर्क
·         धार्मिक स्वतंत्रता के चार स्तंभ: सुब्रमणियम ने तर्क दिया कि अनुच्छेद 25(1) के तहत धर्म की स्वतंत्रता के चार मुख्य पहलू हैं:

1.      धर्म की सैद्धांतिक या दार्शनिक सामग्री.

2.      दर्शन से जुड़ी प्रथाएं.

3.      पूजा का अधिकार.

4.      आस्था की सीमा.

· व्यक्तिगत बनाम सामूहिक अधिकार: उन्होंने स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 25 व्यक्तिगत यात्रा है, जबकि अनुच्छेद 26 वह स्थान है जहाँ लोग सामूहिक रूप से अपनी आस्था व्यक्त करते हैं. किसी संस्था या मंदिर के भीतर व्यक्ति अपने व्यक्तिगत अधिकारों (अनुच्छेद 25) का प्रयोग करना जारी रखता है, भले ही वह एक समूह (अनुच्छेद 26) का हिस्सा हो.

· प्रचार और अभिव्यक्ति का अधिकार: “अभिज्ञा” (Profess), “अभ्यास” (Practice) और “प्रचार” (Propagate) शब्दों की व्याख्या करते हुए उन्होंने कहा कि यदि किसी व्यक्ति के पास ज्ञान है, तो वह भाषण या व्याख्यान के माध्यम से अपनी आस्था का प्रचार कर सकता है.

· संप्रदाय के भीतर मतभेद: उन्होंने एक बहुत ही महत्वपूर्ण बिंदु उठाया कि किसी संप्रदाय का मतलब यह नहीं कि सभी की राय एक हो. संप्रदाय के भीतर आंतरिक बहस, चर्चा और मतभेद हो सकते हैं, और यह विचार-विमर्श भी अनुच्छेद 26 की स्वतंत्रता का हिस्सा है.

· मंदिरों में प्रवेश और समानता: सुब्रमणियम ने कहा कि अनुच्छेद 25(2)(ख) के तहत मंदिरों में प्रवेश का अधिकार सभी वर्गों और संप्रदायों के लिए खुला होना चाहिए. उन्होंने अनुच्छेद 25(1), 25(2)(ख) और 26 के बीच एक “स्वाभाविक संबंध” स्थापित करने पर जोर दिया.

क्या है इस बहस के कानूनी मायने?
1. अनुशासन बनाम स्वतंत्रता: सुब्रमणियम के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति किसी संप्रदाय का सदस्य बनता है, तो उसे उस संप्रदाय के अनुशासन का पालन करना होता है. वह सदस्य रहते हुए उस दर्शन के मूल सिद्धांतों को बदलने का प्रयास नहीं कर सकता.

2. अनुच्छेद 26 की व्यापकता: उन्होंने तर्क दिया कि संस्थागत ढांचा होने पर भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता अनुच्छेद 26 में ही निहित मानी जा सकती है, इसके लिए अलग से अनुच्छेद 19(1)(क) की आवश्यकता नहीं है.

3. जातिगत बहिष्कार से परे: उन्होंने स्पष्ट किया कि हिंदू धर्म के सभी वर्गों के लिए मंदिर खोलने की बात केवल जाति आधारित नहीं है, बल्कि इसमें विभिन्न ‘संप्रदाय’ भी शामिल हैं.

सवाल-जवाब
सबरीमाला मामले में वरिष्ठ वकील गोपाल सुब्रमणियम किस पक्ष पर बहस कर रहे थे?

वे धार्मिक स्वतंत्रता के संवैधानिक पहलुओं, विशेषकर अनुच्छेद 25 और 26 के बीच के तालमेल और संप्रदायों के अधिकारों पर संविधान पीठ को जानकारी दे रहे थे.

अनुच्छेद 25 और 26 में मुख्य अंतर क्या बताया गया?

अनुच्छेद 25 व्यक्तिगत स्वतंत्रता (अंतरात्मा की आवाज) से संबंधित है, जबकि अनुच्छेद 26 धार्मिक संप्रदायों या समूहों को सामूहिक रूप से अपने धर्म के प्रबंधन की स्वतंत्रता देता है.

क्या संप्रदाय के सदस्यों को अपनी बात रखने की आजादी है?

हाँ, सुब्रमणियम के अनुसार, संप्रदाय के भीतर अनुशासन में रहते हुए विचार व्यक्त करना एक संरक्षित स्वतंत्रता है और वहां आम सहमति के लिए बहस की गुंजाइश होती है.



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