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Organic Farming Tips: कृषि वैज्ञानिकों ने किसानों को उर्वरकों के बढ़ते खर्च से राहत दिलाने के लिए कई नए और प्रभावी खेती के विकल्प सुझाए हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि जैविक खाद, हरी खाद, ड्रिप सिंचाई और मिट्टी परीक्षण जैसी तकनीकों को अपनाकर किसान रासायनिक उर्वरकों का उपयोग काफी हद तक कम कर सकते हैं. इससे खेती की लागत घटेगी और मिट्टी की उर्वरक क्षमता भी लंबे समय तक बनी रहेगी. वैज्ञानिकों ने फसल चक्र अपनाने और जैव उर्वरकों के उपयोग पर भी जोर दिया है, जिससे उत्पादन बेहतर होने के साथ पर्यावरण संरक्षण में भी मदद मिलेगी. किसानों को सलाह दी गई है कि वे जरूरत के अनुसार ही उर्वरकों का इस्तेमाल करें और आधुनिक कृषि तकनीकों को अपनाएं.
जोधपुर। अमेरिका-ईरान युद्ध जैसे वैश्विक हालात के बीच पेट्रोलियम उत्पादों और रासायनिक उर्वरकों की आपूर्ति को लेकर चिंता बढ़ती जा रही है. इसी बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किसानों से रासायनिक उर्वरकों का उपयोग कम करने और जैविक खेती को बढ़ावा देने की अपील की है. पीएम की इस अपील के बाद अब कृषि वैज्ञानिक भी किसानों को ऐसे विकल्प सुझा रहे हैं, जिनसे खेती में यूरिया और अन्य रासायनिक खादों की निर्भरता कम की जा सकती है.
कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसान धीरे-धीरे प्राकृतिक और जैविक उपायों को अपनाना शुरू करें तो खेती की लागत कम होने के साथ-साथ मिट्टी की सेहत और फसल की गुणवत्ता में भी सुधार आएगा.
मिट्टी की उर्वरा शक्ति लगातार हो रही कमजोर
कृषि विश्वविद्यालय के कुलगुरु वीरेंद्र सिंह जैतावत ने कहा कि लगातार रासायनिक खादों के बढ़ते उपयोग से जमीन की उर्वरा शक्ति प्रभावित हो रही है. मिट्टी में ऑर्गेनिक कार्बन की मात्रा कम होती जा रही है, जिससे फसलों की प्राकृतिक क्षमता पर असर पड़ रहा है. उन्होंने कहा कि किसान यदि संतुलित मात्रा में रासायनिक खादों का उपयोग करते हुए गोबर की खाद, घर के जैविक कचरे से बनी खाद, केंचुआ खाद, हरी खाद, नीम और सरसों की खली जैसी प्राकृतिक खादों का इस्तेमाल बढ़ाएं तो मिट्टी की गुणवत्ता को दोबारा सुधारा जा सकता है.
गोबर खाद और जैविक विकल्प बन सकते हैं बड़ा सहारा
कुलगुरु जेठावत ने कहा कि गांवों में उपलब्ध संसाधनों से तैयार होने वाली गोबर खाद और बायोगैस स्लरी किसानों के लिए बेहद उपयोगी साबित हो सकती है. इससे न सिर्फ रासायनिक उर्वरकों की खपत कम होगी बल्कि खेती की लागत भी घटेगी. उन्होंने किसानों से अपील करते हुए कहा कि वे कम से कम अपनी खेती के कुछ हिस्से में जैविक और प्राकृतिक खेती की शुरुआत जरूर करें.इससे पर्यावरण संरक्षण, जल संरक्षण और सुरक्षित खाद्य उत्पादन को बढ़ावा मिलेगा. साथ ही आने वाली पीढ़ियों को भी बेहतर और सुरक्षित धरती मिल सकेगी.
जीवामृत और देसी तकनीकों बेतहर विकल्प
कृषि विश्वविद्यालय में जीवामृत, घनजीवामृत और अन्य देसी तकनीकों पर लगातार अनुसंधान किया जा रहा है. शुरुआती परिणाम काफी सकारात्मक सामने आए हैं. उन्होंने कहा कि विशेष रूप से कीट और बीमारियों की रोकथाम में जीवामृत और प्राकृतिक उपाय प्रभावी साबित हो रहे हैं. इसके साथ ही नीम ऑयल स्प्रे, दसपर्णी अर्क, बीज उपचार, राइजोबियम, पीएसबी और एजोस्पाइरिलम जैसे जैविक विकल्प कम लागत में किसानों को बेहतर उत्पादन देने में मदद कर रहे हैं.
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