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चंदौली में एक ऐसा मंदिर है, जो दक्षिण भारत के मंदिर की तरह ही बना हुआ है. यहां भगवान की मूर्ति देखने में बिल्कुल तिरुपति के भगवान विष्णु के मूर्ति की तरह लगती है. यह मंदिर पड़ाव क्षेत्र में स्थित है. आइए इस मंदिर की महत्ता और मान्यता के बारे में जानते हैं.
चंदौली: जिले में एक अनोखा मंदिर स्थित है, जिसकी बनावट और स्थापत्य दक्षिण भारत के प्रसिद्ध मंदिरों की झलक पेश करता है. पड़ाव क्षेत्र में स्थित यह मंदिर खासतौर पर इसलिए चर्चा में है, क्योंकि यहां स्थापित भगवान विष्णु की मूर्ति देखने में तिरुपति बालाजी की प्रतिमा से काफी मिलती-जुलती प्रतीत होती है. यही वजह है कि स्थानीय श्रद्धालुओं के साथ-साथ दूर-दराज से आने वाले भक्तों के लिए भी यह आस्था का प्रमुख केंद्र बनता जा रहा है.
देव स्वरूपों की प्रतिमाएं हैं स्थापित
मंदिर के पुजारी रमाशंकर तिवारी ने लोकल 18 से बताया कि इस मंदिर की स्थापना दक्षिण भारतीय परंपराओं के अनुसार की गई है. यहां केवल भगवान विष्णु ही नहीं, बल्कि गोपाल कृष्ण, वेदव्यास महर्षि, मध्वाचार्य, हनुमान जी, गरुड़ जी और नरसिंह भगवान जैसे कई देव स्वरूपों की प्रतिमाएं स्थापित हैं. मंदिर परिसर में पीतल की बनी हनुमान जी और गरुड़ जी की मूर्तियां विशेष आकर्षण का केंद्र हैं. इसके अलावा लक्ष्मी जी और काल भैरव की छोटी प्रतिमाएं भी यहां विराजमान हैं, जो इस मंदिर को आध्यात्मिक रूप से और भी समृद्ध बनाती हैं.
वैराग्य की राह पर चल पड़े विजय दास
इस मंदिर की मान्यता और परंपरा में संत विजय दास का विशेष स्थान बताया जाता है. पुजारी ने बताया कि विजय दास जी का जन्म 1682 में कर्नाटक के रायचूर जिले के चिकलपरवी गांव में एक गरीब परिवार में हुआ था. उनके पिता का नाम श्रीनिवासप्पा और माता का नाम कुसुमा था. बचपन से ही उन्होंने कठिन परिस्थितियों में जीवन बिताया और छोटे-मोटे काम करके परिवार का सहारा बने. कहा जाता है कि उनकी माता चाहती थीं कि वे काशी जाकर शिक्षा प्राप्त करें और विद्वान बनें. इसी दौरान एक प्रसंग में वे अपने मामा के यहां विवाह समारोह में जाने निकले, लेकिन वहां उन्हें सम्मान नहीं मिला और कठिन श्रम करवाया गया. अपमानित होकर वे वहां से लौट आए और रास्ते में साधुओं के संपर्क में आकर वैराग्य की राह पर चल पड़े.
दक्षिण भारतीय शैली में निर्मित है यह मंदिर
आगे चलकर उन्होंने आध्यात्मिक दीक्षा ली और भगवान विष्णु माधव की भक्ति में लीन हो गए. मान्यता है कि पूर्णिमा के दिन उन्हें दिव्य अनुभूति प्राप्त हुई, जब संत पुरंदर दास ने उनके सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद दिया. इसके बाद उनका जीवन पूरी तरह भक्ति और जनकल्याण के कार्यों में समर्पित हो गया. बता दें कि मंदिर से जुड़ी यह कथा न केवल इसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को दर्शाती है, बल्कि श्रद्धालुओं के लिए आस्था और प्रेरणा का भी स्रोत है. दक्षिण भारतीय शैली में निर्मित यह मंदिर चंदौली की सांस्कृतिक विविधता और धार्मिक समन्वय का एक सुंदर उदाहरण प्रस्तुत करता है.
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विवेक कुमार एक सीनियर जर्नलिस्ट हैं, जिन्हें मीडिया में 10 साल का अनुभव है. वर्तमान में न्यूज 18 हिंदी के साथ जुड़े हैं और हरियाणा, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड की लोकल खबरों पर नजर रहती है. इसके अलावा इन्हें देश-…और पढ़ें


