Last Updated:
सुभाष मोदी एक अनुभवी अंपायर थे जिन्होंने 22 वनडे अंतरराष्ट्रीय मैचों में अंपायरिंग की, जबकि उनके बेटे हितेश मोदी केन्या की राष्ट्रीय टीम के एक प्रमुख मध्यक्रम बल्लेबाज थे. क्रिकेट के इतिहास में ऐसा बहुत कम हुआ है जब पिता और पुत्र एक ही अंतरराष्ट्रीय मैच का हिस्सा रहे हों. इन दोनों ने कुल तीन बार एक ही मैदान साझा किया.
हितेश मोदी बतौर बल्लेबाज और सुभाष मोदी बतौर अंपायर तीन अंतर्राष्ट्रीय मैचों में एक साथ मैदान पर उतरे
नई दिल्ली. क्रिकेट को ‘अनिश्चितताओं का खेल’ कहा जाता है, लेकिन कभी-कभी यह खेल ऐसी मानवीय कहानियों को जन्म देता है जो किसी फिल्मी पटकथा से भी अधिक अविश्वसनीय लगती हैं. कल्पना कीजिए एक ऐसे दृश्य की, जहाँ एक अंतरराष्ट्रीय मैच चल रहा है. क्रीज पर एक बल्लेबाज खड़ा है और ठीक सामने अंपायर की टोपी पहने उसके पिता खड़े हैं. क्या पिता का दिल बेटे के लिए धड़केगा या एक अंपायर का कर्तव्य सर्वोपरि होगा? केन्या के सुभाष मोदी और उनके बेटे हितेश मोदी की कहानी इसी नैतिकता और पेशेवर ईमानदारी की एक मिसाल है.
सुभाष मोदी एक अनुभवी अंपायर थे जिन्होंने 22 वनडे अंतरराष्ट्रीय मैचों में अंपायरिंग की, जबकि उनके बेटे हितेश मोदी केन्या की राष्ट्रीय टीम के एक प्रमुख मध्यक्रम बल्लेबाज थे. क्रिकेट के इतिहास में ऐसा बहुत कम हुआ है जब पिता और पुत्र एक ही अंतरराष्ट्रीय मैच का हिस्सा रहे हों. इन दोनों ने कुल तीन बार एक ही मैदान साझा किया. पहली बार यह ऐतिहासिक पल 1999 में नैरोबी में बांग्लादेश के खिलाफ एक मैच के दौरान आया. यह अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट का पहला मौका था जब पिता ने अपने ही बेटे के मैच में अंपायरिंग की थी.
अंपायर का धर्म बनाम पिता का प्रेम
इस कहानी का सबसे चर्चित हिस्सा वह ईमानदारी है जो सुभाष मोदी ने मैदान पर दिखाई. खेल के प्रति उनकी निष्ठा इतनी अटूट थी कि उन्होंने अपने बेटे को आउट देने में कभी संकोच नहीं किया. अपने करियर के दौरान, सुभाष ने हितेश को दो बार आउट करार दिया. पहली बार 2001 में वेस्टइंडीज के खिलाफ एक मैच में उन्होंने हितेश को एलबीडब्ल्यू (LBW) आउट दिया था. उस वक्त स्टेडियम में सन्नाटा पसर गया था, लेकिन सुभाष के चेहरे पर कोई शिकन नहीं थी. उनके लिए वह केवल केन्या का एक बल्लेबाज था, उनका बेटा नहीं.
करियर की आखिरी गेंद और वह आखिरी फैसला
सबसे भावुक क्षण 2006 में जिम्बाब्वे के खिलाफ आया यह हितेश मोदी के करियर का अंतिम अंतरराष्ट्रीय मैच साबित होने वाला था. मैच अपनी रोमांचक स्थिति में था और हितेश क्रीज पर संघर्ष कर रहे थे तभी जिम्बाब्वे के गेंदबाज की एक गेंद हितेश के पैड पर लगी. जोरदार अपील हुई और अंपायर सुभाष मोदी की उंगली हवा में उठ गई. विडंबना देखिए, जिस पिता ने बेटे को पहला बल्ला थामना सिखाया होगा, उसी पिता के एक फैसले ने बेटे के अंतरराष्ट्रीय करियर की आखिरी गेंद लिख दी. हितेश आउट होकर पवेलियन लौट गए और इसके बाद उन्होंने फिर कभी केन्या के लिए अंतरराष्ट्रीय मैच नहीं खेला.
एक बेमिसाल विरासत
सुभाष और हितेश मोदी की यह कहानी हमें सिखाती है कि खेल के मैदान पर नियमों और नैतिकता का स्थान भावनाओं से ऊपर होता है. सुभाष मोदी ने साबित किया कि एक अंपायर के लिए ‘सफेद कोट’ पहनते ही व्यक्तिगत रिश्ते खत्म हो जाते हैं. आज भी जब क्रिकेट में ईमानदारी और निष्पक्षता की बात होती है, तो मोदी परिवार का यह किस्सा जरूर सुनाया जाता है. यह केवल पिता-पुत्र के रिकॉर्ड की बात नहीं है, बल्कि यह खेल भावना की वह पराकाष्ठा है जो क्रिकेट को ‘जेंटलमैन गेम’ बनाती है.
About the Author

मैं, राजीव मिश्रा, वर्तमान में नेटवर्क 18 में एसोसिएट स्पोर्ट्स एडिटर के रूप में कार्यरत हूँ. इस भूमिका में मैं डिजिटल स्पोर्ट्स कंटेंट की योजना, संपादकीय रणनीति और एंकरिंग की जिम्मेदारी निभाता हूँ. खेल पत्रका…और पढ़ें


