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डेब्यू मैच ही साबित हुआ आखिरी, 10 भारतीय क्रिकेटर्स, जो एक मैच खेलकर गुमनामी में खो गए

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नई दिल्ली. भारतीय क्रिकेट टीम के लिए खेलना देश के हर क्रिकेटर का सपना होता है. भारतीय क्रिकेट में प्रतिभा इतनी ज्यादा है कि टीम में जगह बनाने से भी कहीं ज्यादा उस जगह को बरकरार रखना है. कई खिलाड़ी घरेलू क्रिकेट में रनों और विकेटों का अंबार लगाकर टीम में जगह तो बना लेते हैं, लेकिन मौका मिलने के बाद उस प्रदर्शन को बरकरार नहीं रख पाते और टीम से बाहर हो जाते हैं. इसके बाद फिर उन्हें कभी मौका नहीं मिलता. इस स्टोरी में हम ऐसे ही 10 खिलाड़ियों के बारे में बताने जा रहे हैं, जो भारत के लिए सिर्फ एक मैच खेलने के बाद गुमनाम हो गए.

विदर्भ के दिग्गज सलामी बल्लेबाज फैज फजल ने साल 2016 में जिम्बाब्वे के खिलाफ अपना एकमात्र वनडे मैच खेला. 30 की उम्र में डेब्यू करने वाले फजल ने उस मैच में नाबाद 55 रन बनाए और भारत को जीत दिलाई. घरेलू क्रिकेट में 8000 से ज्यादा रन बनाने के बावजूद रोहित शर्मा और शिखर धवन जैसे बड़े नामों की मौजूदगी के कारण उन्हें दोबारा कभी मौका नहीं मिला.

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1952-53 में पाकिस्तान के खिलाफ टेस्ट मैच खेलने वाले विजय राजेंद्रनाथ एक विकेटकीपर थे. उस मैच में उन्होंने गजब की कीपिंग करते हुए 4 स्टंपिंग कीं, लेकिन उन्हें बल्लेबाजी का मौका ही नहीं मिला. वह आज भी एक अनोखे रिकॉर्ड के मालिक हैं- बिना कोई कैच पकड़े एक टेस्ट करियर में सबसे ज्यादा स्टंपिंग करने वाले खिलाड़ी.

साल 2001 में इंग्लैंड के खिलाफ मोहाली टेस्ट में ऑलराउंडर इकबाल सिद्दीकी ने डेब्यू किया. उन्होंने ग्राहम थोर्प का विकेट लिया और मैच की दूसरी पारी में जब भारत को जीत के लिए सिर्फ 5 रन चाहिए थे, तो उनसे ओपनिंग कराई गई. उन्होंने विजयी रन बनाया, लेकिन इसके बाद वह कभी भारतीय जर्सी में नजर नहीं आए.

मयंक मारकंडे ने ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ टी20 डेब्यू किया था.

2018 के आईपीएल में मुंबई इंडियंस के लिए शानदार प्रदर्शन करने वाले मयंक मारकंडे को 2019 में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ एक टी20 मैच खेलने का मौका मिला. उस मैच में उन्होंने बिना कोई विकेट लिए 31 रन लुटा दिए. इसके बाद उनकी फॉर्म गिरती गई और वह टीम से बाहर हो गए.

1971 के मशहूर वेस्टइंडीज दौरे पर जब सुनील गावस्कर घायल थे, तब केनिया जयंतीलाल को ओपनिंग का मौका मिला. उन्होंने सिर्फ 5 रन बनाए. उसी मैच में दिलीप सरदेसाई ने दोहरा शतक जड़ दिया और भारत को दोबारा बल्लेबाजी की जरूरत नहीं पड़ी. गावस्कर के वापस आते ही जयंतीलाल को बाहर होना पड़ा और वह फिर कभी वापस नहीं आए.

1936 में इंग्लैंड के खिलाफ टेस्ट खेलने वाले बाका जिलानी का चयन काफी विवादित था. कहा जाता है कि कप्तान के साथ उनकी दोस्ती और सीके नायडू के साथ उनकी अनबन की वजह से उन्हें टीम में जगह मिली थी. जिलानी रणजी ट्रॉफी के इतिहास में पहली हैट्रिक लेने वाले गेंदबाज थे, लेकिन अपने इकलौते टेस्ट में वह कोई विकेट नहीं ले पाए.

पंजाब के विकेटकीपर बल्लेबाज पंकज धरमानी ने 1996 में दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ एकमात्र वनडे खेला. उस मैच में वह केवल 8 रन बना सके. घरेलू क्रिकेट में 1000 से ज्यादा रन एक ही सीजन में बनाने के बावजूद चयनकर्ताओं ने उन्हें दोबारा मौका नहीं दिया.

श्रीनाथ अरविंद ने साउथ अफ्रीका के खिलाफ टी20 डेब्यू किया था.

कर्नाटक के बाएं हाथ के तेज गेंदबाज श्रीनाथ अरविंद ने 2015 में दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ एक टी20 मैच खेला. उस मैच में उनकी काफी पिटाई हुई और उन्होंने 44 रन दे डाले. इसके बाद वह भारतीय टीम में कभी वापसी नहीं कर पाए.

एम.जे. गोपालन एक बेहतरीन क्रिकेटर होने के साथ-साथ हॉकी के भी अच्छे खिलाड़ी थे. 1933 में उन्होंने अपना एकमात्र टेस्ट खेला. 1936 के दौरे पर उनके सामने धर्मसंकट था कि वह क्रिकेट टीम के साथ इंग्लैंड जाएं या हॉकी टीम के साथ बर्लिन ओलंपिक. उन्होंने क्रिकेट को चुना, लेकिन विडंबना यह रही कि उन्हें उस दौरे पर एक भी मैच खेलने को नहीं मिला.

1948 में वेस्टइंडीज के खिलाफ डेब्यू करने वाले सुदांशु बनर्जी ने शानदार खेल दिखाया था. उन्होंने अपने इकलौते मैच में 5 विकेट झटके थे. इतना अच्छा प्रदर्शन करने के बाद भी उन्हें दोबारा टीम में शामिल नहीं किया गया. शानदार प्रदर्शन करने के बाद भी टीम में मौका न मिलना किसी भी क्रिकेटर के लिए बुरे सपने जैसा है.



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