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तू चल मैं आया… दुनिया के वो 5 टेस्ट, जहां एक दिन में गिरे सबसे ज्यादा विकेट, 138 साल से नहीं टूटा विश्व रिकॉर्ड

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तू चल मैं आया… दुनिया के वो 5 टेस्ट, जहां एक दिन में गिरे सबसे ज्यादा विकेट

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Most wickets in one day in Test: टेस्ट क्रिकेट के इतिहास में कुछ दिन ऐसे रहे हैं जब गेंदबाजों के आगे बल्लेबाजों ने पूरी तरह घुटने टेक दिए. 1888 में लॉर्ड्स के मैदान पर एक ही दिन में 27 विकेट गिरना आज भी एक अटूट वर्ल्ड रिकॉर्ड है. इसके अलावा मेलबर्न, ओवल और बेंगलुरु जैसे मैदानों पर भी विकेटों का पतन देखा गया. 2011 का केपटाउन टेस्ट तो गेंदबाजों के उसी घातक दबदबे का ताजा उदाहरण है, जो साबित करता है कि टेस्ट क्रिकेट में परिस्थितियां किसी भी पल खेल का पासा पलट सकती हैं.

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टेस्ट क्रिकेट के वो 5 दिन, जब गेंदबाजों ने मचाया ‘कत्लेआम’.

नई दिल्ली. टेस्ट क्रिकेट को ‘धैर्य का खेल’ कहा जाता है, जहां बल्लेबाज घंटों क्रीज पर टिकने के लिए संघर्ष करते हैं. लेकिन इतिहास के कुछ दिन ऐसे रहे हैं जब गेंद और बल्ले की इस जंग में गेंदबाजों ने ऐसा कोहराम मचाया कि क्रिकेट का मैदान किसी ‘कब्रगाह’ जैसा लगने लगा. जब हम टेस्ट क्रिकेट के 149 साल पुराने इतिहास को खंगालते हैं, तो कुछ ऐसे अविश्वसनीय आंकड़े सामने आते हैं जो आज के दौर के फैंस को हैरान कर सकते हैं.

बात 16 जुलाई 1888 की है. क्रिकेट के मक्का कहे जाने वाले लॉर्ड्स के मैदान पर इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया की टीमें आमने-सामने थीं. मैच के दूसरे दिन जो हुआ, वह आज भी एक विश्व रिकॉर्ड है. उस दिन बल्लेबाजों के लिए पिच पर टिकना किसी दुःस्वप्न जैसा था. पूरी दुनिया ने देखा कि कैसे मात्र 157 रनों के अंतराल में 27 विकेट गिर गए. पवेलियन जाने और आने वाले खिलाड़ियों की कतार लगी रही. गेंदबाजों की उस आंधी में लॉर्ड्स की वह ऐतिहासिक घास भी शायद अपनी गवाह दे रही थी कि टेस्ट क्रिकेट में भी एक दिन में करीब तीन पारियां सिमट सकती हैं. यह टेस्ट इतिहास का वह दिन है जब गेंदबाजों ने पूरी तरह से खेल को अपने नियंत्रण में ले लिया था.

मेलबर्न की वो तूफानी नए साल की शुरुआत
20वीं सदी की शुरुआत ही एक धमाके के साथ हुई. 1 जनवरी 1902 को मेलबर्न के मैदान पर ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड की टीमें भिड़ीं. नए साल के जश्न के बीच खेल के पहले ही दिन गेंदबाजों ने अपना जलवा दिखाया. उस दिन 221 रन बने, लेकिन इसके बदले में 25 बल्लेबाजों को अपनी विकेट गंवानी पड़ी. उस दौर की अनकवर्ड पिचें (बिना ढकी पिचें) और नमी ने गेंदबाजों को ऐसी धार दी कि बल्लेबाज बस तू चल मैं आया की तर्ज पर आउट होते रहे. मेलबर्न की वो तपती धूप और तेज हवाओं ने एक ही दिन में टेस्ट मैच का रुख पलट कर रख दिया था.

ओवल और बेंगलुरु का संयोग (1896 और 2018)
समय के चक्र में दो अलग-अलग सदियों के दो मैच एक ही आंकड़े पर आकर ठहर जाते हैं. पहली घटना 10 अगस्त 1896 की है, जब ओवल के मैदान पर इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया के बीच मैच के दूसरे दिन 255 रनों के भीतर 24 विकेट गिरे. वह एशेज सीरीज का वो दौर था जब गेंदबाजी की कला अपने चरम पर थी. ठीक इसी तरह का मंजर साल 2018 में भारत के बेंगलुरु में देखा गया. भारत और अफगानिस्तान के बीच ऐतिहासिक टेस्ट मैच का दूसरा दिन था. अफगानिस्तान की टीम अपना पहला टेस्ट खेल रही थी और भारतीय गेंदबाजों ने उनके अनुभव की कमी का पूरा फायदा उठाया. चिन्नास्वामी स्टेडियम में उस दिन 339 रन तो बने, लेकिन साथ ही 24 विकेट भी गिरे. यह मॉडर्न क्रिकेट के दौर में एक दुर्लभ घटना थी, जहां स्पिन और स्विंग के जाल में फंसी अफगानी टीम एक ही दिन में दो बार ऑलआउट होने की कगार पर पहुंच गई थी.

केपटाउन का वो सनसनीखेज पलटवा
इतिहास के इन पन्नों में सबसे रोमांचक मुकाबला 9 नवंबर 2011 को केपटाउन में खेला गया. दक्षिण अफ्रीका और ऑस्ट्रेलिया के बीच मैच का दूसरा दिन किसी रोलरकोस्टर राइड से कम नहीं था. सुबह जब खेल शुरू हुआ तो कोई नहीं जानता था कि शाम तक स्कोरबोर्ड पर 23 विकेटों का पतन दर्ज होगा. उस दिन ऑस्ट्रेलिया की टीम अपनी दूसरी पारी में महज 47 रनों पर ढेर हो गई थी. पिच पर ऐसी हरकत थी कि दुनिया के दिग्गज बल्लेबाज भी लाचार नजर आ रहे थे. 294 रनों के कुल योग के साथ उस दिन गिरे 23 विकेटों ने यह साबित कर दिया कि दक्षिण अफ्रीका की तेज पिचें आज भी बल्लेबाजों के लिए सबसे कठिन चुनौती पेश करती हैं.

हर गेंद पर एक नई कहानी लिखी जाती थी
ये पांचों मैच हमें याद दिलाती हैं कि टेस्ट क्रिकेट सिर्फ लंबी पारियों का खेल नहीं है. जब परिस्थितियां गेंदबाजों के अनुकूल होती हैं, तो 450 ओवर का खेल भी चंद घंटों के रोमांच में सिमट सकता है. लॉर्ड्स के 27 विकेटों से लेकर केपटाउन की 47 रनों वाली पारी तक, ये आंकड़े गवाह हैं कि क्रिकेट के मैदान पर असली राजा वही है जो विपरीत परिस्थितियों में गेंद को अपनी उंगलियों पर नचाना जानता है. आज के फ्लैट पिचों के दौर में, इतिहास के ये पन्ने हमें उस ‘क्लासिक’ टेस्ट क्रिकेट की याद दिलाते हैं जहां हर गेंद पर एक नई कहानी लिखी जाती थी.

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Kamlesh Raiचीफ सब एडिटर

करीब 15 साल से पत्रकारिता में सक्रिय. दिल्ली यूनिवर्सिटी से पढ़ाई. खेलों में खासकर क्रिकेट, बैडमिंटन, बॉक्सिंग और कुश्ती में दिलचस्पी. IPL, कॉमनवेल्थ गेम्स और प्रो रेसलिंग लीग इवेंट्स कवर किए हैं. फरवरी 2022 से…और पढ़ें



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