पहलगाम में हुए भीषण आतंकी हमले की पहली बरसी पर पूरा देश एक साथ शोक और संकल्प के भाव में खड़ा है. 22 अप्रैल 2025 को बैसरन घाटी में हुए इस हमले में 26 लोगों (25 पर्यटकों और एक स्थानीय पोनीवाला आदिल शाह) की जान चली गई थी. एक साल बाद भी इस घटना के जख्म ताजा हैं. जहां एक ओर पीड़ित परिवार अब भी अपने नुकसान से उबर नहीं पाए हैं, वहीं, भारतीय सेना ने आतंकवाद के खिलाफ सख्त रुख दोहराते हुए स्पष्ट संदेश दिया है कि मानवता की सीमाएं पार होने पर जवाब निर्णायक होता है. पहलगाम के खूबसूरत पहाड़ी स्थल पर लिद्दर नदी के किनारे काले संगमरमर से बना एक स्मारक अब उन 26 जिंदगियों की याद दिलाता है, जो इस हमले में बुझ गईं. इस स्मारक पर सभी पीड़ितों के नाम अंकित हैं और यह न सिर्फ श्रद्धांजलि का प्रतीक है, बल्कि आतंक के खिलाफ देश के सामूहिक संकल्प का भी प्रतीक बन चुका है.
बैसरन घाटी में जिनलोगों की हत्या की गई, उनके परिजनों के सीने में जख्म आज भी हरे हैं. (फाइल फोटो/Reuters)
अपनों को खोने का दर्द अभी भी जिंदा
इस हमले में मारे गए केरल के 65 वर्षीय एन. रामचंद्रन के परिवार के लिए बीता एक साल जैसे थम गया है. उनकी बेटी आरती आर मेनन (जिन्होंने अपने पिता को अपनी आंखों के सामने खोया) आज भी इस सदमे से बाहर नहीं आ सकी हैं. उनका कहना है कि एक साल बीत गया, लेकिन कुछ भी नहीं बदला. यह दर्द केवल एक परिवार का नहीं, बल्कि उन सभी परिवारों का है जिन्होंने इस हमले में अपने प्रियजनों को खोया. हरियाणा के करनाल निवासी नौसेना अधिकारी लेफ्टिनेंट विनय नरवाल की कहानी भी उतनी ही मार्मिक है. शादी के कुछ ही दिनों बाद हनीमून पर गए विनय को आतंकियों ने नजदीक से गोली मार दी. उनके पिता के शब्दों में यह केवल परिवार का ही नहीं, बल्कि देश का भी नुकसान है. कर्नाटक के मणिपाल निवासी मंजूनाथ राव, बेंगलुरु के आईटी प्रोफेशनल भरत भूषण और महाराष्ट्र के संतोष जगदाले जैसे कई अन्य लोग भी इस हमले का शिकार बने. उनके परिवार आज भी मानसिक आघात, भय और असुरक्षा की भावना से जूझ रहे हैं. कई पीड़ितों ने बताया कि अचानक तेज आवाज सुनकर आज भी वे घबरा जाते हैं और सामान्य जीवन जी पाना मुश्किल हो गया है.
पहलगाम हमला: कब क्या हुआ?
- 22 अप्रैल 2025: जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में आतंकियों ने हमला किया, जिसमें 26 पर्यटक और स्थानीय लोग मारे गए. हमलावरों ने धर्म के आधार पर पहचान कर निशाना बनाया.
- 23-24 अप्रैल 2025: हमले के तुरंत बाद द रेजिस्टेंस फ्रंट (TRF) ने जिम्मेदारी ली. भारत ने सुरक्षा कड़ी की और पाकिस्तान की संलिप्तता की कड़ी निंदा की.
- अप्रैल अंत और मई की शुरुआत: नियंत्रण रेखा (LoC) पर भारत और पाकिस्तान के बीच लगातार झड़पें और गोलीबारी की घटनाएं सामने आईं.
- 6-7 मई 2025: भारत ने ऑपरेशन सिंदूर लॉन्च किया. इसके तहत पाकिस्तान और पीओके में आतंकी ठिकानों पर सटीक, संतुलित और गैर-उकसावे वाले मिसाइल हमले किए गए, जिनमें जैश-ए-मोहम्मद के मरकज सुब्हान अल्लाह जैसे ठिकाने निशाने पर रहे.
- 7-8 मई 2025: जवाबी कार्रवाई में पाकिस्तान ने श्रीनगर, जम्मू, पठानकोट समेत कई सैन्य ठिकानों पर ड्रोन और मिसाइल हमले किए.
- 10 मई 2025: दोनों देशों के बीच युद्धविराम (सीजफायर) पर सहमति बनी, जिससे बढ़ते सैन्य तनाव पर विराम लगा.
सेना का कड़ा संदेश और ‘ऑपरेशन सिंदूर’
हमले की बरसी से एक दिन पहले भारतीय सेना ने सोशल मीडिया पर एक सख्त संदेश जारी किया – कुछ सीमाएं कभी पार नहीं की जानी चाहिए. इस संदेश के साथ ‘ऑपरेशन सिंदूर’ का जिक्र भी प्रमुखता से किया गया, जो इस हमले के जवाब में भारत द्वारा चलाया गया सैन्य अभियान था. मई 2025 में शुरू किए गए इस ऑपरेशन के तहत भारत ने पाकिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) में स्थित आतंकी ठिकानों पर सटीक हमले किए. महज 25 मिनट में कई ठिकानों को निशाना बनाया गया. सरकार के अनुसार, इन हमलों में 100 से अधिक आतंकियों को मार गिराया गया और आतंकी ढांचे को भारी नुकसान पहुंचाया गया. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस अभियान को न्याय का नया स्वरूप बताते हुए कहा था कि भारत अब आतंक के खिलाफ केवल प्रतिक्रिया नहीं देगा, बल्कि उसे जड़ से खत्म करने की दिशा में काम करेगा. पहलगाम अटैक के बाद ‘आतंक और बातचीत साथ नहीं चल सकते’ जैसी स्पष्ट नीति ने भारत के बदले हुए रुख को दर्शाया.
पहलगाम अटैक के बाद इंडियन आर्मी ने अपनी रणनीति में अहम बदलाव किया है. (फाइल फोटो/Reuters)
आतंक-रोधी रणनीति में बड़ा बदलाव
पहलगाम हमला भारत की आतंक-रोधी नीति में एक निर्णायक मोड़ साबित हुआ. पहले जहां भारत सीमित जवाबी कार्रवाई करता था, अब रणनीति बहु-आयामी और आक्रामक हो गई है. ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के अलावा ‘ऑपरेशन महादेव’ के तहत हमले में शामिल आतंकियों को तीन महीने के भीतर मार गिराया गया. इसके साथ ही ‘ऑपरेशन अमृत’, ‘ऑपरेशन वज्र’ और ‘ऑपरेशन ट्राइडेंट’ जैसे अभियानों के जरिए देशभर में आतंक के नेटवर्क, फंडिंग और घुसपैठ को रोकने के लिए व्यापक कार्रवाई की गई. हजारों सिम कार्ड बंद किए गए और सैकड़ों संदिग्धों को गिरफ्तार किया गया. इतना ही नहीं भारत ने 1960 की सिंधु जल संधि को भी स्थगित कर दिया, जो दशकों से भारत-पाकिस्तान संबंधों में स्थिरता का आधार मानी जाती थी. इस कदम ने यह स्पष्ट कर दिया कि अब पानी जैसे संसाधन भी रणनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल किए जा सकते हैं.
कश्मीर में एकजुटता
हमले के बाद कश्मीर घाटी में जो दृश्य देखने को मिला, वह अभूतपूर्व था. बड़ी संख्या में स्थानीय लोग सड़कों पर उतरे और आतंकवाद के खिलाफ विरोध जताया. डोडा समेत कई इलाकों में लोगों ने कैंडल मार्च निकाले और एकजुटता का संदेश दिया. स्थानीय निवासियों का कहना है कि इस तरह के हमले न सिर्फ मानवता के खिलाफ हैं, बल्कि कश्मीर की शांति और भाईचारे को भी नुकसान पहुंचाते हैं. उन्होंने यह भी कहा कि आतंक के जरिए समाज में विभाजन पैदा करने की कोशिशें हमेशा विफल रही हैं.
पहलगाम अटैक के बाद भारत ने ऑपरेशन सिंदूर लॉन्च कर करारा जवाब दिया था. (फाइल फोटो/Reuters)
पहलगाम अटैक: ऐसे बदली मिलिट्री डॉक्ट्रिन
- सटीक सैन्य ऑपरेशन (Military Precision): आतंकियों के खिलाफ टार्गेटेड और सटीक ऑपरेशन.
- आंतरिक सुरक्षा पर जोर (Sustained Internal Security Pressure): देश के भीतर लगातार निगरानी और कार्रवाई तेज.
- जीरो टॉलरेंस राजनीतिक संदेश (Zero-Tolerance Political Messaging): आतंकवाद के खिलाफ सख्त और स्पष्ट सरकारी रुख.
- हाइड्रो-डिप्लोमैटिक लीवरेज (Hydro-Diplomatic Leverage): जल संसाधनों के जरिए कूटनीतिक दबाव बनाने की रणनीति.
पर्यटन पर असर और वापसी के संकेत
पहलगाम हमला कश्मीर की अर्थव्यवस्था के लिए बड़ा झटका था, क्योंकि पर्यटन यहां की रीढ़ है. हमले के बाद कई महीनों तक पर्यटकों की संख्या में भारी गिरावट आई. होटल व्यवसाय, टैक्सी चालक और स्थानीय व्यापारियों को नुकसान उठाना पड़ा. हालांकि, एक साल बाद अब स्थिति धीरे-धीरे सामान्य हो रही है. देश के विभिन्न हिस्सों से पर्यटक फिर से पहलगाम का रुख कर रहे हैं. कई पर्यटकों ने सुरक्षा व्यवस्था और स्थानीय लोगों की मेहमाननवाजी की सराहना की है. उनका कहना है कि डर के आगे झुकना सही नहीं और कश्मीर की खूबसूरती का अनुभव हर भारतीय का सपना है.
पहली बरसी: सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम
रसी के मौके पर प्रशासन ने सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए हैं. पहलगाम और आसपास के इलाकों में अतिरिक्त पुलिस और अर्धसैनिक बलों की तैनाती की गई है. कई जगहों पर चेकिंग बढ़ाई गई है और निगरानी प्रणाली को मजबूत किया गया है. इस कार्यक्रम में नेताओं, सामाजिक संगठनों, पीड़ित परिवारों और स्थानीय प्रतिनिधियों के शामिल होने की संभावना है. प्रशासन का कहना है कि सभी तैयारियां पूरी कर ली गई हैं, ताकि यह आयोजन शांतिपूर्ण तरीके से संपन्न हो सके. पहलगाम हमला केवल एक आतंकी घटना नहीं था, बल्कि इसने देश की सुरक्षा नीति, कूटनीतिक रणनीति और सामाजिक सोच को भी प्रभावित किया. एक साल बाद भी पीड़ित परिवारों का दर्द कम नहीं हुआ है, लेकिन देश ने यह दिखा दिया है कि वह आतंक के सामने झुकेगा नहीं. शोक के साथ-साथ यह बरसी एक मजबूत संदेश भी देती है – भारत न तो भूलता है और न ही माफ करता है.


