जुर्म की दुनिया में एक कहावत मशहूर है कि ‘कातिल चाहे कितना भी शातिर क्यों न हो, वह कोई न कोई निशान जरूर छोड़ जाता है.’ लेकिन जब मामला 40 साल पुराना हो जाए, तो निशान भी धुंधले पड़ जाते हैं. दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने एक ऐसा ही कारनामा कर दिखाया है जिसे सुनकर आप दंग रह जाएंगे. साल 1986 में पूर्वी दिल्ली के शकरपुर इलाके में एक शख्स ने अपनी पत्नी की हत्या की और ऐसा गायब हुआ कि चार दशक तक पुलिस उसकी परछाईं भी नहीं छू सकी. वह अपनी पहचान मिटाकर कभी पंजाब के खेतों में मजदूर बना, तो कभी हरियाणा के आश्रमों में साधु. लेकिन किस्मत का पहिया घूमा और 2026 की एक दोपहर ‘जनगणना अधिकारी’ बनकर आई पुलिस ने 84 साल के इस बुजुर्ग कातिल को दबोच लिया. ‘इंडियन एक्सप्रेस’ में छपी खबर के मुताबिक, यह पूरा ऑपरेशन किसी फिल्मी थ्रिलर से कम नहीं था, जहाँ एक गलत स्पेलिंग से शुरू हुआ सफर सलाखों के पीछे खत्म हुआ.
आधी-अधूरी फाइल और वो धुंधला सा सुराग
क्राइम ब्रांच की टीम ने जब मार्च के महीने में पुराने रिकॉर्ड्स की छानबीन शुरू की, तो उनके हाथ 19 अक्टूबर 1986 की एक FIR लगी. फाइल के पन्ने पीले पड़ चुके थे और लिखावट भी धुंधली हो गई थी. रिकॉर्ड के मुताबिक, चंद्र शेखर प्रसाद नाम के एक गत्ता कारोबारी ने अपनी पत्नी के सिर पर ईंट से हमला कर उसे मौत के घाट उतार दिया था. उसे अपनी पत्नी के चरित्र पर शक था. वारदात के वक्त उसके तीन मासूम बच्चे घर में सो रहे थे. पुलिस के पास सुराग के नाम पर बस एक गांव का नाम था—बिहार के नालंदा का ‘भिखानी बीघा’. लेकिन मुसीबत ये थी कि रिकॉर्ड में गांव का नाम गलत यानी ‘बिकानी बीघा’ लिखा था. यहीं से जांच टीम के सब्र और सूझबूझ की असली परीक्षा शुरू हुई.
बिहार के गांवों की खाक और अनाथालय का सच
DCP (क्राइम) संजीव कुमार यादव ने इस केस के लिए एक विशेष टीम बनाई. टीम के एक हेड कांस्टेबल रौशन, जो खुद बिहार के रहने वाले थे, उन्हें नालंदा भेजा गया. गांव में किसी ने भी प्रसाद के बारे में साफ-साफ कुछ नहीं बताया. रिश्तेदारों का कहना था कि उन्हें नहीं पता कि वह जिंदा भी है या नहीं. लेकिन पुलिस को एक छोटी सी जानकारी मिली कि वारदात के बाद बच्चों को उनकी मां के मायके वालों ने एक अनाथालय में रखवा दिया था. पुलिस ने जब उन बच्चों की तलाश शुरू की, तो पता चला कि प्रसाद के दोनों बेटे दिल्ली में ही रह रहे हैं और अपनी पहचान छिपाकर काम कर रहे हैं. यह एक बड़ी सफलता थी जिसने जांच की दिशा बदल दी.
सर्विलांस का जाल और ‘चंदू चाचा’ की एंट्री
पुलिस ने चुपके से प्रसाद के बेटों के मोबाइल नंबर हासिल किए और उन्हें सर्विलांस पर डाल दिया. कॉल डिटेल्स (CDR) खंगालने पर पता चला कि एक संदिग्ध नंबर से बेटों को अक्सर फोन आता है. यह नंबर किसी बुजुर्ग का था जो अक्सर अलीपुर की एक फैक्ट्री के पास एक्टिव रहता था. जांच में पता चला कि फैक्ट्री के मजदूर उस बुजुर्ग को ‘चंदू चाचा’ कहकर पुकारते थे. वह बुजुर्ग कभी कुरुक्षेत्र के आश्रमों में रहता था, तो कभी दिल्ली आकर अपने बेटे की फैक्ट्री के पास रुक जाता था. पुलिस को पूरा यकीन हो गया कि यही वो शख्स है जिसकी उन्हें 40 साल से तलाश थी, लेकिन उसे सीधे पकड़ना जोखिम भरा था.
सेंसस ऑफिसर का भेष और मनोवैज्ञानिक जाल
इंस्पेक्टर सुनील कुमार कालखंडे की टीम ने फैसला किया कि वे पुलिस की वर्दी में नहीं जाएंगे. उन्होंने ‘जनगणना अधिकारी’ (Census Officer) बनने का स्वांग रचा. टीम के सदस्य फाइलों और पेन के साथ फैक्ट्री पहुंचे और मजदूरों से कहने लगे कि 2027 की जनगणना का सर्वे चल रहा है. उन्होंने एक-एक मजदूर का नाम और आधार कार्ड पूछना शुरू किया. जब ‘चंदू चाचा’ की बारी आई, तो उसने झिझकते हुए अपना नाम ‘चंदू’ बताया. पुलिस ने कड़ाई से कहा कि सरकारी रिकॉर्ड के लिए पूरा नाम और पिता का नाम बताना अनिवार्य है. घबराहट में उसने अपना असली नाम ‘चंद्र शेखर प्रसाद’ और गांव का सही नाम उगल दिया.
फरारी के 40 साल और आश्रमों की शरण
गिरफ्तारी के बाद जो खुलासा हुआ, उसने पुलिस को भी हैरान कर दिया. प्रसाद ने बताया कि 1986 में कत्ल करने के बाद वह सबसे पहले पंजाब के पटियाला भागा था. वहाँ उसने दिहाड़ी मजदूरी की ताकि पहचान छिपी रहे. इसके बाद वह मोगा चला गया और फिर हरियाणा के अलग-अलग हिस्सों में घूमता रहा. उसने अपनी गिरफ्तारी से बचने के लिए कुरुक्षेत्र, पानीपत और सोनीपत के कई आश्रमों में समय बिताया. उसे लगा था कि इतने सालों बाद पुलिस उसे भूल चुकी होगी. उसने बिहार में अपनी पुश्तैनी जमीन भी बेच दी थी और उसी पैसे से अपनी फरारी काट रहा था.
याददाश्त का बहाना और कानून का शिकंजा
पूछताछ के दौरान 84 वर्षीय प्रसाद ने दावा किया कि उम्र के कारण उसे अब उस रात की ज्यादा बातें याद नहीं हैं. उसने यह भी बताया कि उसके साथ मर्डर में शामिल अन्य साथी और घर का नौकर अब मर चुके हैं. उसे लग रहा था कि गवाहों की कमी के कारण वह बच जाएगा, लेकिन पुलिस ने तकनीकी साक्ष्यों और पुरानी फाइलों के आधार पर केस को मजबूत कर दिया है. उसके बेटों ने भी बाद में कबूल किया कि उनके पिता अक्सर मर्डर और जेल की बातें करते थे, लेकिन उन्हें लगा था कि शायद ये उम्र का असर है या कोई मनगढ़ंत कहानी.
सालों बाद मिला अधूरा न्याय
इस गिरफ्तारी ने एक बार फिर साबित कर दिया कि न्याय में देरी हो सकती है, लेकिन अंधेर नहीं. शकरपुर की उन गलियों में जहाँ कभी यह खौफनाक मंजर हुआ था, आज बड़ी-बड़ी इमारतें बन चुकी हैं. वहां रहने वाले लोग भी बदल चुके हैं, लेकिन कानून की फाइल में वह घाव आज भी हरा था. दिल्ली पुलिस की इस मेहनत ने उन तीन बच्चों को जवाब दिया है जिन्होंने अपनी मां को खोया और अपने पिता के साये से दूर अनाथालय में पले-बढ़े. ‘चंदू चाचा’ का असली चेहरा अब सबके सामने है और 84 साल की उम्र में उसे अपनी करनी का फल भुगतना ही होगा.


