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पहले खेती में नहीं बचता था फायदा…आज जैविक मक्के की खेती से गोंडा का किसान कर रहा बंपर कमाई

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पहले खेती में नहीं बचता था फायदा…आज जैविक खेती से गोंडा का किसान कर रहा कमाई

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Agriculture News: गोंडा के एक किसान ने यह साबित कर दिया कि अगर खेती को नई सोच और तकनीक के साथ किया जाए, तो मिट्टी सोना उगल सकती है. पारंपरिक खेती में बढ़ती लागत और कम मुनाफे से परेशान होकर धर्मेंद्र कुमार मिश्रा ने ‘जैविक खेती’ का रास्ता चुना और आज वे मक्के की फसल से लाखों का कारोबार कर रहे हैं. सिर्फ 1000 रुपये की मामूली लागत से शुरू हुआ यह सफर आज दूसरे किसानों के लिए मिसाल बन गया है.

गोंडा: उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले के रहने वाले किसान धर्मेंद्र कुमार मिश्रा ने खेती-किसानी को एक सफल बिजनेस बना दिया है. विकासखंड रूपईडीह के मधवा नगर गांव के रहने वाले धर्मेंद्र पहले दूसरे किसानों की तरह ही गेहूं और धान की पारंपरिक खेती करते थे. लेकिन खाद, बीज और कीटनाशकों के बढ़ते खर्च के कारण उन्हें खास मुनाफा नहीं हो पा रहा था. हार मानने के बजाय उन्होंने कुछ अलग करने की सोची और जैविक तरीके से मक्के की खेती शुरू की. आज उनकी यह मेहनत रंग ला रही है.

धर्मेंद्र कुमार मिश्रा ने लोकल 18 को बताया कि उन्होंने सिर्फ आठवीं तक की पढ़ाई की है. घर की माली हालत ठीक न होने के कारण उन्हें पढ़ाई छोड़नी पड़ी. इसके बाद उन्होंने अपनी पूरी ताकत खेती में झोंक दी. फिलहाल वे करीब एक से डेढ़ बीघा जमीन पर पूरी तरह जैविक तरीके से मक्के की फसल उगा रहे हैं.

सोशल मीडिया से मिली खेती की प्रेरणा
धर्मेंद्र बताते हैं कि उन्हें जैविक खेती करने का विचार सोशल मीडिया और पानी संस्थान के जरिए मिला. उन्हें समझ आया कि रासायनिक खेती में लागत ज्यादा और फायदा कम है. उन्होंने सबसे पहले आलू की जैविक खेती से शुरुआत की थी, जिसमें उन्हें काफी अच्छी पैदावार और बाजार में जबरदस्त डिमांड मिली. जिसके बाद उन्होंने मक्के पर दांव लगाया है.
एक से डेढ़ बीघा में मक्के की इस खेती में उनकी कुल लागत महज 1000 रुपये के आसपास आई है. धर्मेंद्र का कहना है कि अगर फसल ऐसी ही बनी रही और बाजार में सही रेट मिला, तो इस बार उन्हें तगड़ी आमदनी होने की उम्मीद है.

खाद की जगह गोबर और वर्मी कंपोस्ट का इस्तेमाल
धर्मेंद्र अपनी फसल में किसी भी तरह के जहरीले केमिकल का इस्तेमाल नहीं करते. वे यूरिया या डीएपी की जगह गोबर की खाद, वर्मी कंपोस्ट और जैविक घोल का इस्तेमाल करते हैं. इससे न केवल उनकी लागत कम हुई है, बल्कि उनके खेत की मिट्टी भी पहले से ज्यादा उपजाऊ हो गई है. जैविक मक्के की शुद्धता की वजह से बाजार में ग्राहक इसे हाथों-हाथ ले रहे हैं और उन्हें सामान्य से बेहतर दाम मिल रहे हैं.

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Seema Nath

सीमा नाथ 6 साल से मीडिया के क्षेत्र में काम कर रही हैं. उन्होंने अपने करियर की शुरुआत शाह टाइम्स में रिपोर्टिंग के साथ की जिसके बाद कुछ समय उत्तरांचल दीप, न्यूज अपडेट भारत के साथ ही लोकल 18 (नेटवर्क18) में काम …और पढ़ें



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