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पहले सैलानियों को कराती थीं जगंल की सैर सवारी, अब कर रहीं गांवों की रखवाली, जयमाला और चंपाकली की अनोखी कहानी

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Bahraich News: बहराइच के कतर्नियाघाट वाइल्डलाइफ सैंक्चुअरी में दो फीमेल हाथी जयमाला और चंपाकली कभी सैलानियों को जंगल की सैर कराती थीं, लेकिन अब सुरक्षा कारणों से इन्हें जाने से मना कर दिया गया है. कई बार इन हाथियों पर बैठे-बैठ कर दूर लेपर्ड या अन्य जानवरों के दीदार भी हो जाते थे.

बहराइच: जिले के कतर्नियाघाट वाइल्डलाइफ सैंक्चुअरी में दो फीमेल हाथी जयमाला और चंपाकली लंबे समय से सैलानियों के लिए आकर्षण का केंद्र बनी हुई हैं, जिनको पहले टूरिस्टों की सैर के लिए इस्तेमाल में लाया जाता था. इनपर बैठकर सैलानी दूर जंगल तक देखकर जंगल का आनंद उठाते थे. इसके अलावा इससे सैर-सपाटा करने में काफी सुरक्षा भी रहती थी, क्योंकि जंगल में हाथी के किनारे कोई भी आक्रामक वन्यजीव नहीं आते थे, जिस वजह से सैलानी जंगल का खूब लुप्त उठाते थे. कई बार इन हाथियों पर बैठे-बैठ कर दूर लेपर्ड या अन्य जानवरों के दीदार भी हो जाते थे.

इसलिए हुए इन हाथियों से सैर-पाटा बंद
बहराइच कतर्नियाघाट वन अधिकारी अपूर्व दीक्षित ने बताया कि सुरक्षा कारणों से वन विभाग ने पिछले कई सालों से हाथियों से सैलानियों के लिए सैर-सपाटा नहीं करने का आदेश दिया है, बल्कि इसके लिए सफारी की व्यवस्था की गई है. अब इन हाथियों को कांबिंग के लिए इस्तेमाल किया जाता है. जब कभी जंगल के किनारे बसे हुए गांव में लेपर्ड या अन्य आक्रामक वन्यजीव का हमला होता है, तो ऐसे में कतर्नियाघाट रेंज में स्थित यह दो हाथी ग्रामीणों की जान बचाते हैं और आक्रामक वन्यजीव को वापस जंगल में भगाने का काम करते हैं. कई बार जंगल का रास्ता कच्चा होने की वजह से अधिकारी या फिर सैलानियों की गाड़ी भी मिट्टी में फंस जाती है. ऐसी दशा में यह दो हाथी ही मददगार साबित होते हैं और फसी हुई गाड़ी को बाहर निकालने में भी मदद करते हैं.

विशेष अवसर पर यह हाथी करते हैं सर्कस
कतर्नियाघाट रेंज में मौजूद इन हाथियों को हाथी दिवस या अन्य कार्यक्रम पर निकालकर इनसे सर्कस कराया जाता है. यह इतने समझदार होते हैं कि मालिक के कहने पर बैठ जाते हैं, कहने पर खड़े हो जाते हैं और जोर-जोर से आवाज भी लगाते हैं. इनकी देख-रेख करने वाले महावत इनको हर रोज ट्रेनिंग देते हैं, ताकि जब भी कभी कांबिंग किया जाए तो कहने पर ये खड़े हो जाएं, बैठ जाएं और जोर-जोर से आवाज लगाएं, क्योंकि जंगल के किनारे जब लेपर्ड या अन्य आक्रामक वन्यजीव का खतरा होता है या भागना होता है, तो वह हाथियों की आवाज से दूर भाग जाते हैं. ऐसे में महावत इनको आवाज लगाने को बोलते हैं और यह आवाज लगाते हैं. इनकी आवाज दूर-दूर तक जाती है और आक्रामक वन्यजीव वापस घने जंगल में लौट जाते हैं.

About the Author

आर्यन सेठ

आर्यन ने नई दिल्ली के जामिया मिलिया इस्लामिया से पत्रकारिता की पढ़ाई की और एबीपी में काम किया. उसके बाद नेटवर्क 18 के Local 18 से जुड़ गए.



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