सहारनपुर: अप्रैल महीने से अक्टूबर महीने तक पशुपालक अपने पशुओं में होने वाली कई बीमारियों को लेकर परेशान रहते हैं. इनमें कुछ बीमारियां ऐसी होती हैं, जो एक पशु से दूसरे पशु में संक्रमण फैलाती हैं और धीरे-धीरे सभी पशु संक्रमित हो जाते हैं. आज हम इस खबर में बताएंगे कि पशुओं में कौन-कौन से ऐसे लक्षण दिखाई देते हैं, जिनसे आप उनके बीमार होने की पहचान कर सकते हैं और समय रहते इलाज कर उनकी जान बचा सकते हैं. अक्सर देखा जाता है कि जब पशु एक बार गंभीर रूप से बीमार हो जाता है, तो उसकी जान बचाना बेहद मुश्किल हो जाता है. पशु की मौत होने पर पशुपालक को लाखों रुपये का नुकसान उठाना पड़ता है.
पशुओं के कुछ लक्षण जैसे चारा ठीक से न खाना, कम खाना या उनके हाव-भाव में बदलाव आना, बीमारी के संकेत हो सकते हैं. इसके अलावा आने वाले दिनों में पशुओं में कौन-कौन सी बीमारियां हो सकती हैं, इस बारे में पशु वैज्ञानिक डॉ. मनोज सिंह ने पूरी जानकारी दी.
जानें पशुओं को कौन-कौन सी बीमारियां तेजी से अपनी चपेट में लेती हैं
पशु वैज्ञानिक डॉ. मनोज सिंह ने लोकल 18 से बातचीत में बताया कि यदि पशुपालक पशुओं के आसपास साफ-सफाई रखेंगे, तो बीमारियों का खतरा काफी कम हो जाएगा. एक महीने बाद पशुओं में बैक्टीरियल बीमारी गलघोंटू और लंगड़ी बुखार के टीके लगाए जाएंगे. वहीं, इस समय पशुओं को खुरपका-मुंहपका का टीका लगवाया जा सकता है. हालांकि, टीका लगवाने के बाद भी बीमारी होने की संभावना पूरी तरह खत्म नहीं होती, इसलिए पशुपालकों को विशेष सावधानी बरतनी चाहिए.
पशुपालकों को रोज पशुओं पर नजर रखनी चाहिए
उन्होंने बताया कि पशुपालकों को रोज पशुओं पर नजर रखनी चाहिए. जो व्यक्ति प्रतिदिन पशु को चारा खिलाता है, उसे पशु के पास जाकर यह देखना चाहिए कि कितना चारा डाला गया था और कितना बचा है. यदि अधिक चारा बच रहा है, तो इसका मतलब हो सकता है कि या तो चारा जरूरत से ज्यादा डाला गया है, पशु की खाने की क्षमता कम हो गई है या फिर उसकी तबीयत खराब है. अगले दिन चारे की मात्रा थोड़ी कम करके देखनी चाहिए. यदि चारा कम बचता है, तो समझना चाहिए कि पशु को कम चारे की आवश्यकता है. इससे पशु स्वस्थ रहता है और खर्च भी कम होता है.
अप्रैल से अक्टूबर तक बाहरी परजीवियों का खतरा
डॉ. मनोज सिंह ने बताया कि अप्रैल से अक्टूबर तक बाहरी परजीवियों जैसे किलनी, मच्छर और मक्खियों का संक्रमण पशु बाड़ों में बहुत बढ़ जाता है. इनके नियंत्रण के लिए बाजार में कई दवाइयां उपलब्ध हैं. पशुपालक पशु चिकित्सक से सलाह लेकर उन दवाइयों की कुछ बूंदें एक लीटर पानी में मिलाकर पशु बाड़े की सफाई और पोछा कर सकते हैं. यदि पशु के शरीर पर अधिक किलनी लगी हो, तो तुरंत उसका उपचार कराना चाहिए.
उन्होंने बताया कि ये बाहरी परजीवी पशुओं का खून चूसते हैं, जिससे पशुओं का वजन धीरे-धीरे कम होने लगता है और दूध उत्पादन भी घट जाता है. साथ ही ये परजीवी एक पशु से दूसरे पशु में संक्रमण फैलाने का काम करते हैं. इसलिए पशुपालकों को साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखना चाहिए.


