क्या है ‘महिला वोटर शेयर’ का यह फॉर्मूला?
इस विश्लेषण में यह मान लिया गया है कि अगर 33 प्रतिशत महिला आरक्षण को तुरंत लागू किया जाता है, तो इसके लिए ‘सीट रोटेशन’ का तरीका अपनाया जाएगा. इसके तहत, हर राज्य में उन लोकसभा सीटों को महिलाओं के लिए रिजर्व कर दिया जाएगा, जहां महिला वोटरों का प्रतिशत उस राज्य के औसत से सबसे अधिक है. इस गणित के हिसाब से लोकसभा की 181 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हो जाएंगी.
राहुल, राजनाथ और गडकरी की सीटों का गणित
- राहुल गांधी (रायबरेली): यूपी में महिला मतदाताओं का औसत 46.7 प्रतिशत है. लेकिन 2024 में राहुल गांधी ने जिस रायबरेली सीट से जीत दर्ज की है, वहां महिला मतदाताओं का हिस्सा 47.69 प्रतिशत है. औसत से ज्यादा होने के कारण रायबरेली महिला आरक्षित सीट बन जाएगी.
- राजनाथ सिंह (लखनऊ): रक्षा मंत्री और बीजेपी के वरिष्ठ नेता राजनाथ सिंह की लखनऊ सीट पर भी 47.11 प्रतिशत महिला मतदाता हैं, जो इसे महिला आरक्षण के दायरे में ला खड़ा करता है.
- नितिन गडकरी (नागपुर): महाराष्ट्र में महिला वोटरों का राज्य स्तरीय औसत 48 प्रतिशत है, लेकिन केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी की नागपुर सीट पर यह आंकड़ा 49.9 प्रतिशत है. ऐसे में नागपुर सीट भी महिलाओं के लिए आरक्षित होने की प्रबल दावेदार बन जाती है.
- अमेठी में भी खतरा: इसके अलावा, कांग्रेस के किशोरी लाल शर्मा द्वारा जीती गई स्मृति ईरानी की पुरानी सीट ‘अमेठी’ (47.46 प्रतिशत महिला वोटर) भी इसी रडार पर आ रही है.
इन दिग्गजों को भी खोजना पड़ेगा नया ठिकाना
सिर्फ राहुल या गडकरी ही नहीं, कई अन्य प्रमुख नेताओं की सीटें भी इस फॉर्मूले के तहत महिलाओं के खाते में जा सकती हैं. इनमें हिमाचल प्रदेश के हमीरपुर से अनुराग ठाकुर, कर्नाटक के मांड्या से एच.डी. कुमारस्वामी, बिहार के गया से जीतन राम मांझी, गुंटूर से चंद्रशेखर पेम्मासानी, असम के जोरहाट से गौरव गोगोई, पश्चिम बंगाल के श्रीरामपुर से कल्याण बनर्जी और बर्दवान-दुर्गापुर से कीर्ति आजाद जैसे बड़े नाम शामिल हैं.
181 में से 155 सांसदों को छोड़नी होगी अपनी सीट!
सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि अगर आज 181 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित की जाती हैं, तो वर्तमान में उन सीटों पर काबिज 155 सांसदों (जो कि पुरुष हैं) को अगली बार किसी नई सीट से चुनाव लड़ना होगा. वर्तमान लोकसभा की केवल 26 महिला सांसद ही ऐसी हैं, जो इस फॉर्मूले के तहत अपनी मौजूदा सीट पर दोबारा चुनाव लड़ पाएंगी, क्योंकि उनकी सीटें पहले से ही हाई-महिला वोटर वाली कैटेगरी में आती हैं.
दक्षिण भारत का गणित
- आमतौर पर दक्षिण भारतीय राज्यों में महिला मतदाताओं का अनुपात उत्तर भारत की तुलना में काफी ज्यादा है. राष्ट्रीय औसत जहां 48.6 प्रतिशत है, वहीं केरल (51.6%), आंध्र प्रदेश (50.9%), तमिलनाडु (50.8%), तेलंगाना (50.3%) और कर्नाटक (49.9%) इसमें काफी आगे हैं.
- अगर आरक्षण पूरे देश के स्तर पर एक साथ लागू होता, तो आरक्षित होने वाली ज्यादातर सीटें दक्षिण भारत की होतीं. लेकिन, आरक्षण का ‘राज्यवार फॉर्मूला’ इस असंतुलन को रोकता है. हर राज्य का अपना स्वतंत्र कोटा होने के कारण, आरक्षित सीटों का बंटवारा पूरे देश में समान रूप से होगा, और बड़े राज्य आरक्षित सीटों के आवंटन पर हावी नहीं हो पाएंगे.
देश में मचेगा सियासी भूचाल
यह डेटा इस बात की तस्दीक करता है कि जब भी महिला आरक्षण को अमलीजामा पहनाया जाएगा, राजनीतिक दलों के भीतर एक भारी उथल-पुथल मचेगी. पार्टियों को न सिर्फ एक तिहाई सीटों पर उतारने के लिए मजबूत महिला चेहरों की तलाश करनी होगी, बल्कि राहुल गांधी, राजनाथ सिंह और गडकरी जैसे अपने दिग्गज नेताओं के लिए नई और सुरक्षित सीटें भी खोजनी पड़ेंगी. चुनाव से पहले ही ‘सेफ सीट’ खोजने की यह कवायद देश में एक बड़े सियासी भूचाल का कारण बन सकती है.


