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रोड्स-फिलिप्स से पहले भी था एक सुपरमैन, 66 साल पहले उसको देखने उमड़ती थी भीड़, 1965 में फील्डिंग से जीता MOM

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रोड्स-ग्लेन फिलिप्स से पहले भी था एक सुपरमैन, 66 साल पहले खेला वो फील्डर

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कॉलिन ब्लैंड को आधुनिक फील्डिंग का ‘जनक’ कहा जाए तो गलत नहीं होगा. एक ऐसे दौर में जब फील्डिंग को सिर्फ एक मजबूरी माना जाता था, ब्लैंड ने इसे एक कला और रोमांच में तब्दील कर दिया.  वह जॉन्टी रोड्स से दशकों पहले फील्डिंग के ‘पोस्टर बॉय’ बन चुके थे.

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60 के दशक में दक्षिण अफ्रीका के कॉलिन ब्लैंड इतने शानदार फील्डर थे कि उनकी प्रैक्टिस देखने के लिए मैदान आते थे फैंस

नई दिल्ली. आज के दौर में जब हम बेहतरीन फील्डिंग की बात करते हैं, तो हमारे ज़हन में जॉन्टी रोड्स, ग्लेन फिलिप्स या रवींद्र जडेजा का नाम आता है. आईपीएल में श्रेयस अय्यर का कैच या रिंकू सिंह के फील्डिंग की बात होती है   लेकिन 1960 के दशक में कॉलिन ब्लैंड वह नाम था जिसने दुनिया को बताया कि फील्डिंग भी एक ‘मैच विनिंग’ कला हो सकती है.  क्रिकेट के मैदान पर आमतौर पर तालियाँ चौकों, छक्कों या विकेटों के लिए बजती हैं, लेकिन 1960 के दशक में एक खिलाड़ी ऐसा भी था जिसके सिर्फ मैदान पर दौड़ने और गेंद को पकड़ने भर से स्टेडियम में शोर मच जाता था.

कॉलिन ब्लैंड को आधुनिक फील्डिंग का ‘जनक’ कहा जाए तो गलत नहीं होगा. एक ऐसे दौर में जब फील्डिंग को सिर्फ एक मजबूरी माना जाता था, ब्लैंड ने इसे एक कला और रोमांच में तब्दील कर दिया.  वह जॉन्टी रोड्स से दशकों पहले फील्डिंग के ‘पोस्टर बॉय’ बन चुके थे. उनकी फील्डिंग के ड्रिल्स और घंटो मैदान पर कैचिंग और सिंगल विकेट पर थ्रो देखने के लिए मैदान फैंस स भर जाता था.

1965 का वह ऐतिहासिक लॉर्ड्स टेस्ट

कॉलिन ब्लैंड के करियर का सबसे यादगार पल 1965 में इंग्लैंड के खिलाफ लॉर्ड्स के ऐतिहासिक मैदान पर आया. इस मैच ने फील्डिंग की परिभाषा बदल दी. इंग्लैंड की टीम मजबूत स्थिति में थी, लेकिन ब्लैंड ने अपनी जादुई फील्डिंग से पासा पलट दिया. उन्होंने पहले दिग्गज बल्लेबाज केन बैरिंगटन को मिडविकेट से एक चीते जैसी फुर्ती के साथ दौड़ते हुए, मुड़कर सीधे थ्रो पर रन आउट किया.  अभी दर्शक इस हैरतअंगेज नजारे से उबरे भी नहीं थे कि ब्लैंड ने जिम पार्क्स को भी लगभग उसी अंदाज में पवेलियन भेज दिया.  ये दोनों थ्रो इतने सटीक थे कि विकेटकीपर को अपनी जगह से हिलने की जरूरत भी नहीं पड़ी.  लॉर्ड्स का मैदान ‘स्टेंडिंग ओवेशन’ से गूंज उठा.  कहा जाता है कि उस दिन दर्शकों ने बल्लेबाजी से ज्यादा ब्लैंड की फील्डिंग का लुत्फ उठाया था.

एंटीसिपेशन और मिडविकेट का सुल्तान

कॉलिन ब्लैंड की सबसे बड़ी ताकत थी ‘एंटीसिपेशन’ यानी गेंद कहाँ जाएगी, इसका पहले से ही अंदाजा लगा लेना.  वह बल्लेबाज के बल्ले के मूवमेंट को देखकर ही भांप लेते थे कि गेंद किस दिशा में आने वाली है. उनका पसंदीदा इलाका मिडविकेट और कवर था. विपक्षी बल्लेबाज ब्लैंड की मौजूदगी में रन चुराने से डरते थे.  उनकी बाहें किसी गुलेल की तरह काम करती थीं, जहाँ से निकली गेंद सीधे स्टंप्स से टकराती थी.

कड़ी मेहनत और अभ्यास

ब्लैंड की यह सटीकता कोई इत्तेफाक नहीं थी. वह घंटों अकेले मैदान पर अभ्यास करते थे. उन्होंने एक स्टंप लगाकर उस पर गेंद मारने का इतना अभ्यास किया था कि वह बंद आँखों से भी निशाना साध सकते थे.  उनके बारे में मशहूर था कि वह नेट प्रैक्टिस के बाद घंटों तक बाउंड्री से स्टंप्स को हिट करने की ट्रेनिंग लेते थे, जो उस दौर के क्रिकेटरों के लिए बिल्कुल नई बात थी.

ब्लैंड की विरासत

कॉलिन ब्लैंड ने 21 टेस्ट मैचों में दक्षिण अफ्रीका का प्रतिनिधित्व किया और लगभग 50 की औसत से रन भी बनाए, लेकिन उनकी पहचान हमेशा एक महान फील्डर के रूप में रही. विजडन ने उन्हें 1966 में ‘क्रिकेटर ऑफ द ईयर’ चुना, जो एक फील्डर की अहमियत पर मुहर थी.  आज के दौर की ‘डाइविंग’ और ‘डायरेक्ट हिट’ वाली फील्डिंग की नींव कहीं न कहीं कॉलिन ब्लैंड ने ही रखी थी. वह सही मायने में क्रिकेट के पहले ऐसे खिलाड़ी थे, जिन्होंने साबित किया कि एक अकेला फील्डर भी अपनी फुर्ती से मैच का रुख मोड़ सकता है.

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राजीव मिश्रAssociate editor

मैं, राजीव मिश्रा, वर्तमान में नेटवर्क 18 में एसोसिएट स्पोर्ट्स एडिटर के रूप में कार्यरत हूँ. इस भूमिका में मैं डिजिटल स्पोर्ट्स कंटेंट की योजना, संपादकीय रणनीति और एंकरिंग की जिम्मेदारी निभाता हूँ. खेल पत्रका…और पढ़ें



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