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batters Most innings before first duck in ODI: क्रिकेट के इतिहास में शून्य पर आउट होना एक सदमे जैसा है, लेकिन कुमार धर्मसेना ने डेब्यू के बाद लगातार 72 पारियों तक खाता खोलकर विश्व रिकॉर्ड बनाया. उनके पीछे गार्डन ग्रीनिज और समीउल्लाह शिनवारी रहे, जिन्होंने डक के लिए लंबे समय तक इंतजार कराया. न्यूजीलैंड के मैकमिलन और केर्न्स के साथ ग्रीम स्मिथ ने भी गजब का संयम दिखाया. फाफ डु प्लेसिस ने भी 60 पारियों तक डक का मुंह नहीं देखा. इन 7 दिग्गजों ने साबित किया कि एकाग्रता और जुझारूपन से क्रिकेट में शून्य के कलंक को सालों तक टाला जा सकता है.
क्रिकेट की अनिश्चितताओं के बीच ‘डक’ या शून्य पर आउट होना किसी भी बल्लेबाज की प्रतिष्ठा पर एक छोटा सा दाग माना जाता है. मगर इतिहास के पन्नों में कुछ ऐसे धैर्यवान बल्लेबाज भी रहे, जिन्होंने करियर की शुरुआत के बाद लगातार कई पारियों तक अपनी विकेट की ऐसी ढाल बनाई कि शून्य उनके करीब भी न आ सका. कुमार धर्मसेना की अविश्वसनीय निरंतरता से लेकर ग्रीम स्मिथ के जुझारूपन तक. आइए जानते हैं उन बल्लेबाजों के बारे में जिन्होंने अपनी पहली ‘डक’ से पहले रनों का अंबार लगा दिया.

श्रीलंका के दिग्गज खिलाड़ी कुमार धर्मसेना (Kumar Dharamsena) के नाम एक ऐसा रिकॉर्ड दर्ज है जो बड़े-बड़े बल्लेबाजों को हैरान कर देता है. 24 अगस्त 1994 को डेब्यू करने के बाद उन्होंने लगातार 72 पारियों तक अपना विकेट कभी शून्य पर नहीं गिरने दिया. उनकी यह मैराथन दौड़ आखिरकार 11 दिसंबर 2001 को कोलंबो के प्रेमदासा स्टेडियम में वेस्टइंडीज के खिलाफ थमी. सात सालों तक शून्य से दूर रहने का यह कीर्तिमान आज भी शीर्ष पर है.

वेस्टइंडीज के महान सलामी बल्लेबाज गार्डन ग्रीनिज (Gordon Greenidge) अपनी आक्रामक बल्लेबाजी के लिए जाने जाते थे, लेकिन उनकी एकाग्रता भी कमाल की थी। 1975 के वर्ल्ड कप से शुरू हुआ उनका सफर 70 पारियों तक बिना किसी शून्य के चलता रहा. करीब 11 साल बाद, 1986 में पोर्ट ऑफ स्पेन के मैदान पर इंग्लैंड के खिलाफ वे पहली बार बिना खाता खोले पवेलियन लौटे.
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अफगानिस्तान क्रिकेट के उदय की कहानी में समीउल्लाह शिनवारी (Samiullah Shenwari ) का नाम स्वर्ण अक्षरों में लिखा है. उन्होंने 2009 में डेब्यू किया और ग्रीनिज की बराबरी करते हुए 70 पारियों तक शून्य के आंकड़े को खुद से दूर रखा. साल 2019 में देहरादून के मैदान पर आयरलैंड के खिलाफ उनकी यह अनोखी सुरक्षा दीवार आखिरकार टूट गई, लेकिन तब तक वे इतिहास रच चुके थे.

न्यूजीलैंड के क्रेग मैकमिलन (Craig McMillan ) अपनी टीम के मध्यक्रम की जान हुआ करते थे. 1997 में श्रीलंका के खिलाफ करियर की शुरुआत करने वाले मैकमिलन ने लगातार 68 पारियों तक कम से कम एक रन तो बनाया ही. नेपियर के मैदान पर साल 2001 में श्रीलंका ने ही उनका यह रिकॉर्ड तोड़ा, जब वे पहली बार वनडे क्रिकेट में डक का शिकार हुए.

न्यूजीलैंड के एक और दिग्गज क्रिस केर्न्स () ने गेंद और बल्ले दोनों से जलवा बिखेरा. 1991 में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ डेब्यू करने के बाद उन्होंने 67 पारियों तक शून्य का कलंक अपने नाम नहीं लगने दिया. एडिलेड के खूबसूरत मैदान पर 1997 में ऑस्ट्रेलिया के ही खिलाफ वे पहली बार बिना खाता खोले आउट हुए, जिससे उनके 6 साल के लंबे सफर का अंत हुआ.

दक्षिण अफ्रीका के सबसे सफल कप्तानों में से एक ग्रीम स्मिथ ने भी इस लिस्ट में अपनी जगह बनाई है. 2002 में करियर शुरू करने वाले स्मिथ ने 67 पारियों तक खुद को डक से बचाए रखा. दिलचस्प बात यह है कि उनका यह रिकॉर्ड 2005 में अफ्रीका इलेवन की ओर से खेलते हुए एशिया इलेवन के खिलाफ डरबन में टूटा था.

दक्षिण अफ्रीका के फाफ डु प्लेसिस अपनी तकनीकी मजबूती के लिए जाने जाते हैं. 2011 में वेस्टइंडीज के खिलाफ अपना वनडे सफर शुरू करने वाले फाफ ने 60 पारियों तक शून्य पर आउट न होने का रिकॉर्ड बनाया. साल 2015 में डरबन के उसी मैदान पर वेस्टइंडीज ने ही उन्हें पहली बार शून्य पर रोक दिया, जहां से उन्होंने अपना सफर शुरू किया था.

इन आंकड़ों के पीछे केवल तकनीक नहीं, बल्कि गजब की मानसिक मजबूती छिपी है। एक बल्लेबाज के लिए अपनी पहली 60 या 70 पारियों में हर बार खाता खोलना यह दर्शाता है कि उन्होंने क्रीज पर आते ही कितनी सावधानी बरती. यह रिकॉर्ड बताता है कि ये खिलाड़ी अपनी टीम के लिए कितने विश्वसनीय थे.

इस डेटा को देखने पर एक मजेदार बात सामने आती है कि अक्सर जिस टीम के खिलाफ खिलाड़ी ने डेब्यू किया, कुछ सालों बाद उसी टीम या उसी मैदान पर उसका ‘डक’ का सूखा खत्म हुआ. जैसे फाफ डु प्लेसिस और क्रेग मैकमिलन के मामलों में देखा गया. यह क्रिकेट के खेल की अनिश्चितता और खूबसूरती को दर्शाता है.

आज के दौर में जहां टी-20 के प्रभाव से बल्लेबाज पहली ही गेंद से बड़े शॉट खेलते हैं, वहां धर्मसेना या ग्रीनिज जैसे खिलाड़ियों का 70 पारियों तक शून्य से बचना एक लगभग असंभव उपलब्धि लगती है. ये आंकड़े केवल नंबर नहीं हैं, बल्कि क्रिकेट के उस दौर की गवाही देते हैं जहां विकेट की कीमत आज से कहीं ज्यादा हुआ करती थी.


