नई दिल्ली. क्रिकेट के मैदान पर एक बल्लेबाज के लिए सबसे कठिन पल कौन सा होता है? बहुत से लोग कहेंगे पहली 10 गेंदें, या फिर पारी का आखिरी ओवर. लेकिन आंकड़ों के गवाहों से पूछें, तो वे एक ही सुर में कहेंगे ‘नर्वस नाइंटीज’. यह वह स्थिति है जब खिलाड़ी के नाम के आगे स्कोरबोर्ड पर 90 से 99 के बीच की संख्या चमक रही होती है. शतक बस एक कदम दूर होता है, लेकिन एक छोटी सी गलती, एक गलत शॉट या गेंदबाज की बेहतरीन गेंद उस शतक के सपने को धूल में मिला देती है. लेकिन क्या ‘नर्वस नाइंटीज’ वास्तव में एक विफलता है? या यह उस बल्लेबाज की महानता का प्रमाण है कि वह इतनी बार क्रीज पर टिकने और दुनिया के सबसे बेहतरीन गेंदबाजी आक्रमण को ध्वस्त करने में कामयाब रहा?
जब हम वनडे क्रिकेट के आंकड़ों की बात करते हैं, सचिन तेंदुलकर का नाम हर लिस्ट में सबसे ऊपर आता है. उनके नाम दर्ज 18,426 रन और 49 शतक इस बात का प्रमाण हैं कि वे रन मशीन थे। लेकिन, इसी लिस्ट में एक और आंकड़ा है जो उनकी निरंतरता को दर्शाता है’90s’. सचिन अपने करियर में 18 बार 90 से 99 के बीच आउट हुए. आलोचक इसे असफलता कह सकते हैं, लेकिन गहराई से सोचें तो यह उनकी महानता की पराकाष्ठा है. अगर कोई बल्लेबाज 18 बार नब्बे के दशक में आउट हुआ है और 49 बार शतक जड़ा है, तो इसका मतलब है कि वह 67 बार दुनिया के सर्वश्रेष्ठ गेंदबाजों के खिलाफ नब्बे या उससे ऊपर पहुंचा था. ये आंकड़े उनकी असफलता की कहानी नहीं, बल्कि उनकी उस अटूट क्षमता की कहानी कहते हैं, जिसके कारण वे लगातार क्रीज पर डटे रहते थे. जब सचिन 90 पर होते थे, तो पूरा स्टेडियम थम जाता था. वह एक ऐसा मानसिक दबाव था जिसे शायद केवल सचिन ही इतने लंबे समय तक झेल पाए.
दुनिया के वो 6 बल्लेबाज जो वनडे में सबसे ज्यादा बार हुए नर्वस नाइंटीज के शिकार.
‘9’ का वह क्लब जहां शतक और बल्लेबाज के बीच दीवार बन गई
सचिन तेंदुलकर के बाद वनडे इतिहास में ‘नर्वस नाइंटीज’ का दर्द साझा करने वाले खिलाड़ियों की एक ऐसी लिस्ट है जिन्होंने 9 बार इस कड़वे अनुभव का सामना किया. ये खिलाड़ी अलग-अलग युग और अलग-अलग शैली के हैं, लेकिन एक चीज में वे समान हैं उनकी निरंतरता. मॉडर्न क्रिकेट के सबसे शांत बल्लेबाजों में से एक न्यूजीलैंड के केन विलियम्सन 175 मैचों के अपने करियर में 15 शतक जड़ चुके हैं. लेकिन 9 बार वे उस ‘नर्वस’ मोड़ पर आकर रुके जहां शतक बस एक औपचारिकता लग रहा था. उनकी बल्लेबाजी का धैर्य ही उन्हें बताता है कि 90 के दशक में आउट होना खेल का हिस्सा है, कमजोरी नहीं.
यही हाल ग्रांट फ्लावर (जिम्बाब्वे) का रहा. 1992 से 2010 के बीच अपने 221 मैचों के करियर में, ग्रांट ने 6 शतक जड़े और 9 बार 90 का आंकड़ा पार नहीं कर पाए. वहीं, नेथन एस्टल (न्यूजीलैंड) जैसे विस्फोटक बल्लेबाज का भी 223 मैचों में 9 बार 90s में आउट होना यह दिखाता है कि जब आप शतक के इतने करीब आकर भी तेजी से रन बनाने का जोखिम उठाते हैं, तो गिरने की संभावना बढ़ जाती है. श्रीलंका के अरविंदा डी सिल्वा का नाम भी इस लिस्ट में शामिल है। 308 मैचों में 11 शतक और 9 बार ‘नर्वस नाइंटीज’. डी सिल्वा की कलात्मक बल्लेबाजी क्रिकेट प्रेमियों के लिए एक दावत थी. 9 बार 90 के दशक में आउट होना इस बात का प्रमाण है कि वे कितनी बार अपनी टीम को जीत की दहलीज तक ले गए.
कोहली ‘नर्वस नाइंटीज’ और ‘कन्वर्जन रेट’ की नई परिभाषा
जब हम इस लिस्ट को देखते हैं, तो एक नाम बहुत ही दिलचस्प तरीके से उभर कर आता है विराट कोहली. विराट के नाम वनडे में 311 मैचों में 8 बार ‘नर्वस नाइंटीज’ दर्ज है. लेकिन जब हम उनके 54 शतकों पर गौर करते हैं, तो कहानी पूरी बदल जाती है. विराट कोहली का यह आंकड़ा उनके ‘कन्वर्जन रेट’ (शतक में बदलने की क्षमता) को दर्शाता है. जहां अन्य दिग्गज 9 बार 90 में आउट हुए, विराट ने 8 बार 90 में आउट होने के बावजूद 54 बार शतक को अंजाम तक पहुंचाया है. यह बताता है कि मॉडर्न क्रिकेट में, विशेषकर विराट के खेल में 90 पर पहुंचना एक लक्ष्य नहीं, बल्कि शतक तक पहुंचने का एक स्टेशन है.
आंकड़ों के पीछे का सच
‘नर्वस नाइंटीज’ कोई कलंक नहीं है. यह क्रिकेट की खूबसूरती का हिस्सा है. जब भी कोई बल्लेबाज 90 के स्कोर पर होता है, पूरा ड्रेसिंग रूम सांसें थाम लेता है. वह एक ऐसा मनोवैज्ञानिक दबाव है जिसे शब्दों में बयान करना मुश्किल है. सचिन के 18 बार, विलियमसन, फ्लावर, एस्टल और डी सिल्वा के 9 बार, और विराट के 8 बार इस स्थिति तक पहुंचना, यह साबित करता है कि महान बल्लेबाज वही है जो बार-बार उस कगार तक पहुंचने का साहस करता है. अंततः, क्रिकेट केवल शतक के लिए नहीं, बल्कि उस संघर्ष के लिए भी खेला जाता है जो शतक तक पहुंचने के रास्ते में आता है.


