23.9 C
Munich

शोर के पीछे की खामोशी: बंगाल की सियासत में RSS की मूक क्रांति का असर

Must read


West Bengal Election and RSS: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजों ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि राजनीति केवल बड़े मंचों, विशाल रैलियों और जोरदार नारों से तय नहीं होती. कई बार असली लड़ाई उन स्तरों पर लड़ी जाती है, जहां न कैमरे पहुंचते हैं और न ही सुर्खियां बनती हैं. इस बार के चुनाव में भी एक ऐसी ही खामोश रणनीति चर्चा में है, जिसे राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (RSS) से जोड़कर देखा जा रहा है.

जहां एक ओर ममता बनर्जी और उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) का आक्रामक चुनाव प्रचार केंद्र में रहा, वहीं दूसरी ओर संघ से जुड़े कार्यकर्ताओं ने अपेक्षाकृत शांत रहकर जमीनी स्तर पर अपनी पकड़ मजबूत करने पर ध्यान दिया. सूत्रों के अनुसार इस बार रणनीति ‘नि:शब्द विप्लव’ या ‘मूक क्रांति’ की थी- यानी बिना ज्यादा प्रचार-प्रसार के मतदाताओं तक पहुंच बनाना.

बताया जा रहा है कि इस अभियान का फोकस बड़े आयोजनों के बजाय छोटे-छोटे संवादों पर था. गांवों, कस्बों और शहरी वार्डों में जाकर मतदाताओं से सीधे संपर्क स्थापित किया गया. बंगाल की अस्मिता, विकास और सांस्कृतिक पहचान जैसे मुद्दों को आधार बनाकर जनजागरण अभियान चलाया गया. इस दौरान महिला, युवा, प्रबुद्ध वर्ग, किसान, श्रमिक और अनुसूचित जाति-जनजाति समुदायों तक अलग-अलग तरीकों से पहुंचने की कोशिश की गई.

लाखों की संख्या में छोटी-छोटी बैठकें

सूत्रों के मुताबिक पूरे अभियान के दौरान लाखों की संख्या में छोटी-छोटी बैठकें और संवाद कार्यक्रम आयोजित किए गए. ये वे गतिविधियां थीं जो बड़े मीडिया विमर्श का हिस्सा नहीं बन पाईं, लेकिन स्थानीय स्तर पर उनका असर दिखाई दिया. इन बैठकों के जरिए मतदाताओं के बीच एक वैकल्पिक राजनीतिक सोच को धीरे-धीरे जगह देने की कोशिश की गई.

संघ की संगठन क्षमता इस रणनीति का अहम हिस्सा मानी जा रही है. बताया जाता है कि बूथ स्तर पर बेहद सूक्ष्म योजना बनाई गई थी. कई क्षेत्रों में बूथों को अलग-अलग श्रेणियों- A, B, C और D में विभाजित कर उनके अनुसार रणनीति तैयार की गई. कार्यकर्ताओं को पहले से प्रशिक्षित किया गया, ताकि वे स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार प्रभावी ढंग से काम कर सकें. इस तरह चुनावी प्रक्रिया को एक तरह से माइक्रो मैनेजमेंट के जरिए संचालित किया गया.

टीएमसी का मजबूत गढ़

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इस शांत लेकिन निरंतर प्रयास ने उन इलाकों में भी असर डाला, जिन्हें लंबे समय से टीएमसी का मजबूत गढ़ माना जाता था. हालांकि इस बदलाव की गति धीमी और कम दिखाई देने वाली थी, लेकिन नतीजों के साथ इसका असर ज्यादा स्पष्ट होकर सामने आया. यह भी कहा जा रहा है कि इस तरह की रणनीति का प्रभाव तुरंत दिखाई नहीं देता, बल्कि समय के साथ मतदाताओं के रुझान में बदलाव के रूप में सामने आता है. चुनावी नतीजों के बाद अब इस मूक क्रांति को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं.

हालांकि, इस पूरे घटनाक्रम को लेकर अलग-अलग राजनीतिक दलों और विश्लेषकों की अपनी-अपनी व्याख्याएं हैं. लेकिन इतना जरूर है कि पश्चिम बंगाल की सियासत में इस बार केवल मंचों की गूंज ही नहीं, बल्कि खामोश जमीनी प्रयास भी अहम भूमिका निभाते नजर आए. कुल मिलाकर बंगाल चुनाव ने एक बार फिर यह संकेत दिया है कि लोकतंत्र में जीत की कहानी सिर्फ दिखाई देने वाले शोर से नहीं, बल्कि अनदेखी खामोशी से भी लिखी जाती है.



Source link

- Advertisement -spot_img

More articles

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

- Advertisement -spot_img

Latest article