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श्रीकृष्ण जन्मभूमि-शाही ईदगाह केस में ‘अयोध्या जैसी रणनीति’ अपना रहा मुस्लिम पक्ष? ये बात क्‍यों उठी, आइये समझते हैं

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Shri Krishna Janmabhoomi Case Update : श्रीकृष्ण जन्मभूमि और शाही ईदगाह मस्जिद केस में कई अन्य अहम अर्जियां भी लंबित हैं, जिनमें शाही ईदगाह परिसर के सर्वे, आधिकारिक भाषा अधिनियम के पालन और विभिन्न पक्षों द्वारा पूजा की अनुमति से जुड़ी अर्जियां शामिल हैं. हाल की सुनवाई में अदालत में क्‍या हुआ और मुस्लिम पक्ष को कहां झटका लगा, आइये इसे समझते हैं…

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श्रीकृष्ण जन्मभूमि-शाही ईदगाह मस्जिद विवाद पर इलाहाबाद हाईकोर्ट का अहम फैसला.

प्रयागराज/मथुरा : मथुरा स्थित श्रीकृष्ण जन्मभूमि और शाही ईदगाह मस्जिद के बीच चल रहे स्वामित्व विवाद में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मस्जिद पक्ष को बड़ा झटका देते हुए सिविल वादों की पोषणीयता (मेंटेनेबिलिटी) को लेकर उठाई गई आपत्ति खारिज कर दी है. हालांकि, मामले से जुड़ी अन्य अर्जियों पर सुनवाई अभी जारी है. इस मामले में 10 अप्रैल को इलाहाबाद हाईकोर्ट में हुई सुनवाई के दौरान शाही ईदगाह पक्ष की ओर से एक संशोधन प्रार्थना पत्र दाखिल किया गया, जिसमें यह मांग की गई थी कि हिंदू पक्षकारों द्वारा दायर वादों को निरस्त किया जाए, क्योंकि उनमें आस्था के प्रश्न को मुख्य आधार बनाया गया है और आस्था के अस्तित्व के संबंध में कोई ठोस सामग्री रिकॉर्ड पर नहीं रखी गई है. इसका काउंटर करते हुए हिंदू पक्षकार एडवोकेट महेंद्र प्रताप सिंह ने बताया कि हिंदू पक्ष की आस्था का केंद्र भगवान श्रीकृष्ण हैं और उनकी जन्मभूमि करोड़ों हिंदुओं की आस्था का केंद्र है. उन्होंने यह भी कहा कि शाही ईदगाह पक्ष द्वारा दाखिल आवेदन में न तो अधिकृत हस्ताक्षरकर्ता के हस्ताक्षर थे और न ही वह विधिवत प्रमाणित किया गया था.

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सुनवाई के बाद इस संशोधन अर्जी को खारिज कर दिया. जस्टिस अवनीश सक्सेना की एकल पीठ ने अपने आदेश में कहा कि मस्जिद पक्ष के लिखित कथन में गंभीर तकनीकी खामियां हैं और सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के आदेश 6 नियम 14 और 15 के तहत आवश्यक सत्यापन की प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया है. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मूल लिखित कथन ही कानून के अनुरूप नहीं है, ऐसे में उसमें संशोधन की मांग करना विचारहीन है.

कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि इससे पहले मस्जिद पक्ष द्वारा आदेश 7 नियम 11 के तहत सिविल वादों की पोषणीयता को चुनौती देने वाली अर्जी भी खारिज की जा चुकी है. दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने उस अर्जी को भी अस्वीकार कर दिया था. इसके बावजूद मस्जिद पक्ष ने दोबारा संशोधन प्रार्थना पत्र दाखिल किया, जिसे अब फिर से खारिज कर दिया गया है.

एडवोकेट महेंद्र प्रताप सिंह के अनुसार, शाही ईदगाह पक्ष का उद्देश्य इस मामले की सुनवाई को लंबा खींचना है. उन्होंने अयोध्या प्रकरण का हवाला देते हुए कहा कि वहां भी लंबे समय तक इसी तरह की रणनीति अपनाकर मामले को टालने की कोशिश की गई थी और अब वही रणनीति मथुरा विवाद में भी अपनाई जा रही है.

उन्होंने कहा कि जब आदेश 7 नियम 11 के तहत दाखिल अर्जी पहले ही खारिज हो चुकी थी, तो इस नए संशोधन प्रार्थना पत्र का कोई औचित्य नहीं बनता था. इसके बावजूद न्यायालय से वादों को निरस्त करने की अपील की गई, जिसे अदालत ने अपूर्ण और प्रक्रियागत रूप से त्रुटिपूर्ण मानते हुए खारिज कर दिया. कोर्ट ने मस्जिद पक्ष को तकनीकी त्रुटियों को दूर करने के लिए बाद में दाखिल एक अन्य अर्जी पर सुनवाई हेतु 15 मई की तारीख तय की है. 15 मई को दोपहर 2 बजे इलाहाबाद हाईकोर्ट में इस मामले की अगली सुनवाई होगी.

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Sandeep KumarSenior Assistant Editor

Senior Assistant Editor in News18 Hindi with the responsibility of Regional Head (Uttar Pradesh, Uttarakhand, Bihar, Jharkhand, Rajasthan, Madhya Pradesh, Chhattisgarh, Himachal Pradesh, Haryana). Active in jou…और पढ़ें





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