Last Updated:
Kanpur News : डंपिंग साइट्स का कूड़ा जब सड़ता है तो उससे एक गाढ़ा काले रंग का जहरीला तरल निकलता है, जिसे लीचेट कहते हैं. यही लीचेट धीरे-धीरे जमीन के अंदर जाता है और भूजल को दूषित कर देता है. बारिश के मौसम में लीचेट ज्यादा मात्रा में निकलता है, जिससे परेशानी और बढ़ जाती है. अगर यह तकनीक देशभर के डंपिंग स्थलों पर लागू होती है तो जमीन के नीचे का पानी काफी हद तक सुरक्षित रह सकेगा. कानपुर से निकला यह शोध अब पूरे देश के लिए उम्मीद बन सकता है.
कानपुर. शहरों के बाहर बने कूड़ा स्थलों से निकलने वाला काला जहरीला तरल अब बड़ी समस्या नहीं रहेगा. हरकोर्ट बटलर तकनीकी विश्वविद्यालय (Harcourt Butler Technical University) के वैज्ञानिकों ने ऐसा देसी समाधान तैयार किया है, जो डंपिंग साइट्स के नीचे भूजल को सुरक्षित रखने में मदद करेगा. इसमें महंगे विदेशी मैटीरियल की जगह काली मिट्टी का इस्तेमाल किया गया है. इस शोध का नेतृत्व कानपुर के प्रो. दीपेश सिंह और उनके शोधार्थी डॉ. अभिषेक ने किया. कई सालों की मेहनत के बाद उन्हें शानदार परिणाम मिले हैं. इस तकनीक को 20 साल का पेटेंट भी मिला है. अगर इसे बड़े स्तर पर अपनाया गया तो देशभर के कूड़ा स्थलों के आसपास रहने वाले लाखों लोगों को राहत मिल सकती है.
क्या दिक्कत
प्रो. दीपेश सिंह बताते हैं कि डंपिंग साइट्स पर रोजाना टनों में गीला और सूखा कूड़ा फेंका जाता है. जब यह कूड़ा सड़ता है तो उससे एक गाढ़ा काले रंग का जहरीला तरल निकलता है, जिसे लीचेट कहा जाता है. यही लीचेट धीरे-धीरे जमीन के अंदर जाता है और भूजल को दूषित कर देता है. कई जगहों पर यही पानी हैंडपंप, बोरिंग और कुओं तक पहुंच जाता है. इससे लोगों की सेहत पर बुरा असर पड़ता है. त्वचा रोग, पेट की दिक्कतें और कई गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है.
पनकी-भौंती में प्रयोग
कानपुर के पनकी-भौंती डंपिंग साइट इलाके में इस समस्या को देखते हुए शोध शुरू किया गया. टीम ने वहां के लोगों से बात की और हालात समझे. बारिश के मौसम में लीचेट ज्यादा मात्रा में निकलता था, जिससे परेशानी और बढ़ जाती थी. वैज्ञानिकों ने बुंदेलखंड क्षेत्र की काली कपास मिट्टी का इस्तेमाल किया. इस मिट्टी की खासियत यह है कि यह पानी और जहरीले तत्वों को नीचे जाने से रोकने में कारगर साबित हुई. इसे तकनीकी तरीके से तैयार कर एक नई सुरक्षात्मक परत बनाई गई, जिसे डंपिंग साइट्स के नीचे बिछाया जा सकता है.
अब तक महंगा विकल्प
अब तक कई जगह जियोसिंथेटिक क्ले लाइनर नाम का महंगा मैटीरियल इस्तेमाल होता था. इसमें कई परतें लगाई जाती थीं और इसकी लागत भी ज्यादा होती थी. लेकिन एचबीटीयू की टीम ने इसका आसान और कम खर्च वाला विकल्प तैयार कर दिया. काली मिट्टी देश के कई हिस्सों में आसानी से मिल जाती है. ऐसे में नगर निगम और स्थानीय निकाय इसे कम लागत में अपना सकते हैं. इससे कूड़ा प्रबंधन सस्ता और असरदार बन सकता है.
बन जाएगा वरदान
अगर यह तकनीक देशभर के डंपिंग स्थलों पर लागू होती है तो जमीन के नीचे का पानी काफी हद तक सुरक्षित रह सकेगा. आसपास रहने वाले लोगों को बदबू, गंदगी और दूषित पानी से राहत मिलेगी. कानपुर से निकला यह शोध अब पूरे देश के लिए उम्मीद बन सकता है. कूड़े की समस्या के बीच यह काली मिट्टी सच में वरदान साबित हो सकती है.
About the Author
Priyanshu has more than 10 years of experience in journalism. Before News 18 (Network 18 Group), he had worked with Rajsthan Patrika and Amar Ujala. He has Studied Journalism from Indian Institute of Mass Commu…और पढ़ें


