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सुप्रीम कोर्ट में स्पेशल सुनवाई: ममता की वो 10 दलीलें जिन पर पश्चिम बंगाल में काउंटिंग से पहले होगा फैसला

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नई दिल्ली/कोलकाता: 2026 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के रण का सबसे बड़ा और नाटकीय मोड़ अब देश की सबसे बड़ी अदालत की दहलीज पर खड़ा है. एक तरफ मतगणना की तारीख नजदीक आ रही है तो दूसरी तरफ काउंटिंग टेबल पर वर्चस्व को लेकर कानूनी तलवारें खिंच चुकी हैं. ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस ने चुनाव आयोग के उस फैसले को सीधे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है जिसने बंगाल की चुनावी बिसात पर एक नया प्रशासनिक तूफान खड़ा कर दिया है. यह केवल एक याचिका नहीं बल्कि ममता बनर्जी बनाम चुनाव आयोग के बीच की वह आर-पार की जंग है जो 4 मई की मतगणना से पहले लोकतंत्र के लेवल प्लेइंग फील्ड पर बड़े सवालिया निशान खड़े करती है. क्या केंद्रीय कर्मचारियों की टेबल पर तैनाती निष्पक्षता का कवच है या फिर यह राज्य की मशीनरी पर अविश्वास का संकेत? शनिवार, 2 मई की सुबह जब जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच इस पर सुनवाई करेगी तो पूरे देश की नजरें इस बात पर टिकी होंगी कि लोकतंत्र के इस महापर्व में न्याय का पलड़ा किस ओर झुकता है.

निष्पक्षता बनाम प्रशासनिक नियंत्रण

TMC की याचिका का मुख्य केंद्र संरचनात्मक पक्षपात (Structural Bias) है. पार्टी का तर्क है कि चुनाव केवल प्रक्रियात्मक ही नहीं बल्कि दिखने में भी निष्पक्ष होने चाहिए. दूसरी ओर कलकत्ता हाईकोर्ट ने इसे चुनाव आयोग का विशेषाधिकार माना है और कहा है कि CCTV और माइक्रो-ऑब्जर्वर की उपस्थिति में धांधली की आशंका निराधार है. यह कानूनी लड़ाई अब इस बिंदु पर टिकी है कि क्या चुनाव आयोग का यह फैसला स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव की मूल भावना के खिलाफ है.

ममता बनर्जी की याचिका में 10 प्रमुख दलीलें

तृणमूल कांग्रेस ने चुनाव आयोग (ECI) के 13 अप्रैल 2026 के निर्देश को इन आधारों पर चुनौती दी है:

1. क्षेत्राधिकार का अभाव: याचिका के अनुसार अतिरिक्त मुख्य निर्वाचन अधिकारी के पास चुनाव के दौरान नीतिगत बदलाव करने का संवैधानिक अधिकार नहीं है.

2. भेदभावपूर्ण रवैया: यह प्रक्रिया बदलाव केवल पश्चिम बंगाल के लिए लागू किया गया जबकि अन्य चुनावी राज्यों (असम, केरल, पुडुचेरी) में ऐसा नहीं हुआ.

3. संस्थागत पक्षपात: केंद्र में सत्तारूढ़ भाजपा का केंद्रीय कर्मचारियों पर प्रशासनिक नियंत्रण है, जिससे निष्पक्षता प्रभावित होने की आशंका है.

4. असंतुलित प्रतिनिधित्व: काउंटिंग टेबल्स पर केवल केंद्रीय कर्मियों की अनिवार्य नियुक्ति से राज्य कर्मियों का प्रतिनिधित्व खत्म हो जाएगा.

5. मनमाना निर्णय: चुनाव आयोग ने इस बदलाव के पीछे कोई ठोस आधार या साक्ष्य पेश नहीं किया है.

6. पारदर्शिता का अभाव: यह निर्देश राजनीतिक दलों से बिना किसी परामर्श के गुप्त रूप से जिला निर्वाचन अधिकारियों को जारी किया गया.

7. लेवल प्लेइंग फील्ड का उल्लंघन: विपक्षी दल का नियंत्रण होने के कारण केंद्रीय कर्मियों की नियुक्ति से चुनावी समानता का सिद्धांत बाधित होता है.

8. मौजूदा ढांचे की पर्याप्तता: पहले से ही माइक्रो-ऑब्जर्वर के रूप में केंद्रीय कर्मी तैनात हैं तो सुपरवाइजर स्तर पर भी उनकी अनिवार्यता अनावश्यक है.

9. भय का वातावरण: बड़ी संख्या में केंद्रीय कर्मियों की उपस्थिति से अन्य गणना कर्मियों और एजेंटों के बीच भय या दबाव की स्थिति बन सकती है.

10. हाईकोर्ट की त्रुटि: याचिका में तर्क दिया गया कि हाईकोर्ट ने इस गंभीर विषय को अविश्वास योग्य बताकर खारिज करने में गलती की है.

प्रमुख प्‍वाइंट्स

· याचिका संख्या: SLP (C) D. NO. 26799 OF 2026.

· मुख्य मांग: 13.04.2026 के उस निर्देश पर रोक जिसमें हर टेबल पर एक केंद्रीय कर्मचारी अनिवार्य किया गया है.

· सुनवाई तिथि: शनिवार, 2 मई 2026.

· प्रतिवादी: केंद्रीय चुनाव आयोग (ECI) एवं अन्य.

सवाल-जवाब
TMC ने याचिका में मुख्य रूप से किसे चुनौती दी है?

TMC ने पश्चिम बंगाल के अतिरिक्त मुख्य निर्वाचन अधिकारी द्वारा जारी उस निर्देश को चुनौती दी है जिसमें मतगणना टेबल पर कम से कम एक गणना पर्यवेक्षक या सहायक का केंद्रीय कर्मचारी होना अनिवार्य किया गया है.

कलकत्ता हाईकोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए क्या टिप्पणी की?

हाईकोर्ट ने कहा कि चुनाव आयोग के पास केंद्रीय या राज्य कर्मियों को नियुक्त करने का विशेषाधिकार है और केवल आशंका के आधार पर इस प्रक्रिया में हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता.

सुप्रीम कोर्ट से अंतरिम राहत के रूप में क्या मांगा गया है?

याचिका में 4 मई की मतगणना से पहले इस निर्देश पर रोक लगाने या वैकल्पिक रूप से केंद्रीय और राज्य दोनों कर्मियों की संयुक्त तैनाती सुनिश्चित करने की मांग की गई है.



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