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Sultanpur Bhar Dynasty History: उत्तर प्रदेश का सुल्तानपुर जिला मध्यकाल का एक ऐसा गौरवशाली इतिहास समेटे हुए है, जिसकी गूंज आज भी यहां के पुराने टीलों और खंडहरों में सुनाई देती है. यह वह दौर था जब इस पूरे इलाके पर साहसी ‘भर’ राजवंश का राज हुआ करता था. कन्नौज के पतन के बाद अवध की कमान संभालने वाले इन भर राजाओं ने अल्देमऊ से लेकर कूड़ेभार तक अपनी ऐसी मजबूत गढ़ियां बनाई थीं, जिन्हें आज भी लोग भरों की गढ़ी के नाम से जानते हैं. लेकिन अपनी ही सेना में शामिल साथियों और बाहरी आक्रमणकारियों के कारण इस शक्तिशाली साम्राज्य का अंत हो गया. आइए जानते हैं अल्दे और मल्दे जैसे प्रतापी भाइयों और ‘भाले सुल्तान’ खिताब के पीछे छिपी सुल्तानपुर के भरों की कहानी, जो वक्त के साथ कहीं धुंधली पड़ गई है.
सुल्तानपुर: उत्तर प्रदेश का सुल्तानपुर जिला ऐतिहासिक रूप से बहुत ही खास माना जाता है. मध्यकाल के दौरान यह पूरा इलाका ‘भर’ (Bhar Dynasty) राजाओं के शासन का मुख्य केंद्र था. इनका साम्राज्य सुल्तानपुर के दूर-दराज के गांवों तक फैला हुआ था. आज भी जब आप सुल्तानपुर के देहाती इलाकों में जाएंगे, तो आपको वहां कई ऊंचे मिट्टी के टीले और पुरानी ईंटों के ढेर मिलेंगे. ये कोई मामूली टीले नहीं हैं, बल्कि ये उस दौर के गवाह हैं जब यहां भर राजाओं का बोलबाला था.
सुल्तानपुर जिले के वरिष्ठ पत्रकार विक्रम बृजेंद्र सिंह बताते हैं कि सुल्तानपुर के गांवों में जहां भी बड़े टीले या ‘डीह’ दिखाई देते हैं, वहां के बुजुर्ग उन्हें आज भी भरों की गढ़ी या ‘कोट’ कहकर बुलाते हैं. कन्नौज के साम्राज्य का जब अंत हुआ, तब अवध के इस हिस्से में भर जाति एक मजबूत शासक के रूप में उभरकर सामने आई थी. जिले के चारों तरफ आज भी इस प्राचीन सभ्यता और संस्कृति के निशान मिल जाते हैं.
अल्दे और मल्दे, दो भाइयों ने बसाया था अपना साम्राज्य
भर राजवंश के इतिहास में अल्दे और मल्दे नाम के दो भाइयों का जिक्र प्रमुखता से आता है. अल्दे ने गोमती नदी के उत्तर में अपने नाम पर ‘अल्देमऊ’ नगर बसाया था और वहीं अपनी गढ़ी (छोटा किला) तैयार की थी. उन्हीं के नाम पर आज भी ‘परगना अल्देमऊ’ का नाम चला आ रहा है. इसी तरह कूड़े भर ने ‘कूड़ेभार’ को अपना केंद्र बनाया और ईश नाम के राजा ने ‘इसौली’ से अपना शासन चलाया. सुल्तानपुर के कई गांवों के नाम जैसे सरैंया भरथी (बरौसा परगना), भरखरे और भेरौरा (चांदा परगना), भरथुआ अल्देमऊ परगना के राजस्व ग्राम शामिल है जो आज भी इन राजाओं की याद दिलाते हैं.
शिव भक्त थे ये राजा, कहलाते थे ‘भारशिव’
इतिहास बताता है कि कटघर के भर राजा का नाम नन्द कुंवर था और प्रसिद्ध धोपाप क्षेत्र पर राजा हेल का राज था. ये सभी भर शासक भगवान शिव के बहुत बड़े भक्त थे. शिव की भक्ति के कारण ही इन्हें इतिहास में भारशिव के नाम से भी पुकारा गया है. इनके बनाए हुए ऊंचे कोट और किले आज भी सुल्तानपुर की पहचान बने हुए हैं.
कैसे खत्म हुई भरों की सत्ता?
सुल्तानपुर में भरों का राज तब कमजोर होने लगा जब पश्चिम की तरफ से राजपूतों का आना शुरू हुआ. शुरुआत में इन राजपूतों ने भर राजाओं के यहां सेना और प्रशासन में नौकरियां कीं, लेकिन धीरे-धीरे उन्होंने अपनी ताकत बढ़ाई और भरों को हटाकर सत्ता पर अपना कब्जा जमा लिया. इसके साथ ही दिल्ली के मुस्लिम सुल्तानों ने भी इन पर कई हमले किए. जिसके बाद इस सत्ता का पतन हो गया.
अलाउद्दीन खिलजी और ‘भाले सुल्तान’ की दिलचस्प कहानी
भर राजाओं के पतन की एक बड़ी कहानी अलाउद्दीन खिलजी से जुड़ी है. इसौली के भर राजा को हराने के लिए खिलजी ने बैस राजपूतों को भेजा था. उन राजपूतों ने बड़ी बहादुरी से भर राजा को युद्ध में पराजित कर दिया. उनकी इस बहादुरी से खुश होकर खिलजी ने उन्हें ‘भाले सुल्तान’ का खिताब भी दिया. इसी वजह से आज भी सुल्तानपुर के पश्चिमी हिस्से में रहने वाले राजपूतों को भाले सुल्तान के नाम से जाना जाता है.
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सीमा नाथ 6 साल से मीडिया के क्षेत्र में काम कर रही हैं. उन्होंने अपने करियर की शुरुआत शाह टाइम्स में रिपोर्टिंग के साथ की जिसके बाद कुछ समय उत्तरांचल दीप, न्यूज अपडेट भारत के साथ ही लोकल 18 (नेटवर्क18) में काम …और पढ़ें


