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स्ट्रेट ऑफ होर्मुज खुलने और वैश्विक गैस कीमतों में 50% तक की भारी गिरावट से भारत में LPG सिलेंडर की किल्लत खत्म होने की राह आसान हो गई है. गेल और बीपीसीएल जैसी कंपनियों ने $16 प्रति BTU की दर पर सस्ती गैस की खरीदारी शुरू कर दी है. हालांकि, भारत की 60% आयात निर्भरता अब भी एक बड़ी चुनौती है. विश्लेषण के अनुसार अमेरिका-ईरान के बीच कूटनीतिक स्थिरता ही भारत की भविष्य की ऊर्जा सुरक्षा और घरेलू गैस कीमतों में राहत सुनिश्चित करेगी.
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज वैश्विक एलएनजी और एलपीजी व्यापार का सबसे महत्वपूर्ण मार्ग है. ईरान और अमेरिका के बीच तनाव के कारण यह मार्ग बाधित होने से भारत जैसे देशों में आपूर्ति की भारी कमी हो गई थी. अब इसके पूरी तरह खुलने से खाड़ी देशों से आने वाले जहाजों का रास्ता साफ हो गया है. इससे घरेलू बाजार में एलपीजी सिलेंडर की उपलब्धता बढ़ेगी और जो वेटिंग पीरियड या किल्लत दिख रही थी, वह जल्द ही खत्म होने की उम्मीद है.

तनाव कम होने और सप्लाई रूट खुलने का असर अंतरराष्ट्रीय कीमतों पर साफ दिख रहा है. एलएनजी की कीमतें $25 प्रति मिलियन BTU से गिरकर लगभग $16 पर आ गई हैं. चूंकि भारत अपनी गैस जरूरत का लगभग 60% हिस्सा आयात करता है इसलिए वैश्विक कीमतों में 50% तक की यह गिरावट भारतीय तेल कंपनियों को सस्ता माल खरीदने का मौका देगी. इसका सीधा लाभ भविष्य में घरेलू एलपीजी और पीएनजी की कीमतों में स्थिरता के रूप में मिल सकता है.

कीमतें कम होते ही गेल (GAIL), बीपीसीएल (BPCL) और जीएसपीसी (GSPC) जैसी प्रमुख भारतीय कंपनियों ने अंतरराष्ट्रीय स्पॉट मार्केट से भारी मात्रा में खरीदारी शुरू कर दी है. कंपनियों ने अप्रैल-जून की डिलीवरी के लिए $16 प्रति BTU की दर से सौदे सुरक्षित कर लिए हैं. यह सक्रियता सुनिश्चित करती है कि आने वाले महीनों में देश के पास गैस का पर्याप्त भंडार होगा, जिससे औद्योगिक और घरेलू उपभोक्ताओं को गैस की कमी का सामना नहीं करना पड़ेगा.
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पिछले कुछ महीनों में सप्लाई चेन बाधित होने से भारत के एलएनजी आयात में करीब 14% की गिरावट आई थी. अब रास्ता खुलने के बाद भारत अपनी ‘एनर्जी सिक्योरिटी’ को फिर से मजबूत कर रहा है. सरकार और कंपनियां अब केवल तात्कालिक जरूरत नहीं बल्कि लॉन्ग टर्म स्टॉक मैनेज करने पर ध्यान दे रही हैं. जहाजों की बिना रोक-टोक आवाजाही से पोर्ट्स पर गैस टर्मिनलों की क्षमता का पूरा उपयोग हो सकेगा, जो सीधे तौर पर किल्लत को खत्म करेगा.

जियोपॉलिटिकल नजरिए से देखें तो अमेरिका और ईरान के बीच वार्ता का सफल होना बाजार के लिए एक बड़ा ‘सेंटिमेंट बूस्टर’ है. डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ईरान के साथ समझौते के संकेत देना यह दर्शाता है कि यह स्थिरता केवल अस्थायी नहीं है. जब तक यह कूटनीतिक संतुलन बना रहेगा, होर्मुज जैसा संवेदनशील मार्ग सुरक्षित रहेगा. भारत के लिए यह सबसे बड़ी राहत है क्योंकि हमारे पश्चिम एशियाई देशों के साथ मजबूत व्यापारिक संबंध हैं.

भले ही रास्ता खुलने से तात्कालिक किल्लत खत्म हो जाए, लेकिन भारत अब भी अपनी 60% जरूरत के लिए बाहरी दुनिया पर निर्भर है. वैश्विक बाजार की अस्थिरता हमेशा एक जोखिम बनी रहेगी. विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को होर्मुज जैसे मार्गों पर निर्भरता कम करने के लिए घरेलू गैस उत्पादन बढ़ाना होगा और वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों पर ध्यान देना होगा, ताकि भविष्य में किसी भी विदेशी तनाव का असर सीधा हमारे किचन तक न पहुंचे.

आर्थिक दृष्टिकोण से, गैस आयात बिल में कमी आने से भारत का विदेशी मुद्रा भंडार बचेगा और राजकोषीय घाटे पर दबाव कम होगा. $25 के मुकाबले $16 पर गैस मिलना भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए ऑक्सीजन की तरह है. यदि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यही ट्रेंड जारी रहता है और होर्मुज मार्ग खुला रहता है, तो गैस की किल्लत केवल इतिहास बन जाएगी. हालांकि, यह पूरी तरह से ग्लोबल पॉलिटिक्स की स्थिरता और भारतीय कंपनियों की खरीद रणनीति पर टिका रहेगा.


