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बचपन में झेला मां का विछोह, पीठ पर ढोया खाद का बोरा, नस्लवाद के दंश और तंगहाली को पछाड़कर बना ‘रन मशीन’, बना डाले 37000 रन

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बचपन में झेला मां का विछोह, पीठ पर ढोया खाद का बोरा, बना दुनिया का महान बैटर

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Gordan Greenidge ki sangharsh bhari kahani: 8 साल की उम्र में मां का बिछोह, बचपन में पीठ पर खाद का बोरा ढोने की मजबूरी और स्कूल में नस्लवाद का दंश. गॉर्डन ग्रीनिज का जीवन किसी फिल्म से कम नहीं है. गरीबी की गलियों से निकलकर लॉर्ड्स के मैदान पर ऐतिहासिक दोहरा शतक जड़ने वाले ग्रीनिज दुनिया के एकमात्र बल्लेबाज हैं, जिन्होंने अपने 100वें टेस्ट और वनडे दोनों में शतक जड़ा. यह कहानी एक मजदूर से क्रिकेट जगत का बेताज बादशाह बनने के उनके अदम्य साहस और संघर्ष की है.

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गॉर्डन ग्रीनिज ने क्रिकेट के मैदान पर कई बड़े रिकॉर्ड बनाए.

नई दिल्ली. क्रिकेट की दुनिया में जब भी खौफनाक और विस्फोटक ओपनर का जिक्र होता है, तो वेस्टइंडीज के महान दिग्गज गॉर्डन ग्रीनिज का नाम सबसे ऊपर आता है. लेकिन क्रिकेट के इस ‘कैरेबियन किंग’ की चमक के पीछे संघर्ष, नस्लवाद और गरीबी की एक ऐसी कहानी छिपी है, जो किसी भी इंसान की आंखों में आंसू ला सकती है. ग्रीनिज की कहानी महज रनों और शतकों का आंकड़ा नहीं है, बल्कि एक बच्चे के उस हौसले की दास्तां है जिसने नानी के घर मजदूरी करने से लेकर लॉर्ड्स के मैदान पर दोहरा शतक जड़ने तक का सफर तय किया.

बारबाडोस की मिट्टी में जन्मे गॉर्डन का बचपन किसी त्रासदी से कम नहीं था. महज 8 साल की उम्र में उन पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा. उनकी मां बेहतर भविष्य और नौकरी की तलाश में उन्हें पीछे छोड़कर सात समंदर पार लंदन चली गईं. नन्हे गॉर्डन ग्रीनिज (Gordan Greenidge) को अपनी नानी के पास रहना पड़ा. वह दौर इतना कठिन था कि घर का खर्च चलाने के लिए उन्हें अपनी नाजुक पीठ पर खाद के भारी बोरे ढोने पड़े. बचपन के वे दिन खेल-कूद के बजाय हाड़तोड़ मजदूरी में बीते.

गॉर्डन ग्रीनिज ने क्रिकेट के मैदान पर कई बड़े रिकॉर्ड बनाए.

नस्लवाद का दंश और करियर की चुनौती
अपनी आत्मकथा ‘गॉर्डन ग्रीनिज द मैन इन मिडिल’ में उन्होंने इस अकेलेपन और संघर्ष को साझा किया है. उन्होंने लिखा है कि उनकी मां ने लंदन में शादी कर ली, जिसके बाद उन्हें अपना वर्तमान सरनाम ‘ग्रीनिज’ मिला. 14 साल की उम्र में वे आखिरकार लंदन पहुंचे, लेकिन वहां उनके संघर्षों का स्वरूप बदल गया. इंग्लैंड के रीडिंग शहर में पढ़ाई के दौरान गॉर्डन को नस्लवाद का सामना करना पड़ा. अश्वेत होने की वजह से स्कूल में सहपाठी उन्हें ‘ब्लैक बास्टर्ड’ कहकर अपमानित करते थे. इन कड़वे अनुभवों ने उनके स्वभाव में एक कठोरता भर दी, जो बाद में उनकी बल्लेबाजी में भी नजर आई. क्रिकेट का सफर भी आसान नहीं था. 1969 के आसपास जब वे इंग्लिश क्लब ‘हैम्पशायर’ के साथ थे, तो दो साल तक लगातार असफल रहे. ऐसा वक्त आ गया था जब क्लब उनके साथ करार खत्म करने वाला था. लेकिन ग्रीनिज ने हार नहीं मानी। उन्होंने जबरदस्त वापसी की और दक्षिण अफ्रीका के महान बल्लेबाज बैरी रिचर्ड्स के साथ मिलकर दुनिया की सबसे खतरनाक सलामी जोड़ियों में से एक बनाई.

भारत के खिलाफ धमाकेदार आगाज
गॉर्डन ग्रीनिज के पास इंग्लैंड की टीम से खेलने का मौका था, लेकिन उन्होंने अपनी जड़ों को चुना और वेस्टइंडीज का प्रतिनिधित्व करने का फैसला किया. उनका इंटरनेशनल डेब्यू 1974 में भारत के खिलाफ बेंगलुरु के चिन्नास्वामी स्टेडियम में हुआ. अपने पहले ही मैच में उन्होंने भारतीय गेंदबाजों की धज्जियां उड़ा दीं. पहली पारी में 93 और दूसरी पारी में 107 रन बनाकर उन्होंने दुनिया को बता दिया कि एक नया सितारा आ चुका है. वेस्टइंडीज ने वह मैच 267 रनों के बड़े अंतर से जीता था.

लॉर्ड्स की वो ऐतिहासिक पारी और अद्भुत रिकॉर्ड
ग्रीनिज की बल्लेबाजी की सबसे बड़ी खासियत उनका ‘डिस्ट्रक्टिव’ अंदाज था. 1984 का वह लॉर्ड्स टेस्ट आज भी क्रिकेट प्रेमियों के जेहन में ताजा है. इंग्लैंड ने वेस्टइंडीज के सामने 342 रनों का विशाल लक्ष्य रखा था. मैच के पांचवें दिन किसी भी टीम के लिए यह स्कोर नामुमकिन सा था. लेकिन ग्रीनिज अलग ही मिट्टी के बने थे। उन्होंने मात्र 242 गेंदों पर नाबाद 214 रन ठोक दिए और अपनी टीम को एक अविश्वसनीय जीत दिलाई.

गॉर्डन ग्रीनिज के नाम दर्ज हैं कई रिकॉर्ड
गॉर्डन ग्रीनिज दुनिया के इकलौते ऐसे क्रिकेटर हैं जिन्होंने अपने 100वें टेस्ट और 100वें वनडे दोनों में शतक जड़ा. उन्होंने प्रथम श्रेणी क्रिकेट में 92 शतकों की मदद से 37,354 रन बनाए. 108 टेस्ट मैचों में 45 की औसत से 7,558 रन बनाए, जिसमें 19 शतक शामिल थे. 128 वनडे मैचों में 5,134 रन बनाए और दो बार वर्ल्ड कप जीतने वाली टीम का हिस्सा रहे.

एक महान गुरु के रूप में योगदान
क्रिकेट से संन्यास लेने के बाद भी ग्रीनिज का इस खेल के प्रति लगाव कम नहीं हुआ. उन्होंने बतौर कोच बांग्लादेश क्रिकेट टीम को निखारने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई. 1997 की आईसीसी ट्रॉफी में बांग्लादेश की जीत और 1999 के विश्व कप के लिए क्वालिफाई कराने के पीछे ग्रीनिज की ही रणनीति थी. आज बांग्लादेशी क्रिकेट जिस मुकाम पर है, उसकी नींव रखने में गॉर्डन ग्रीनिज का बड़ा हाथ माना जाता है.

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Kamlesh Raiचीफ सब एडिटर

कमलेश राय वर्तमान में News18 इंडिया में बतौर चीफ सब-एडिटर कार्यरत हैं. 17 वर्षों से अधिक के अपने सुदीर्घ पत्रकारीय सफर में उन्होंने डिजिटल मीडिया की बारीकियों और खबरों की गहरी समझ के साथ एक विशिष्ट पहचान बनाई ह…और पढ़ें



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