नई दिल्ली. यह सिर्फ दो खिलाडी , दो बल्लेबाज ,और दो आलराउंडर ही नहीं थे, यह दोनों अपने देश का गौरव थे, अपने देशवासियो का घमंड थे , जब दुनिया मैं ऑस्ट्रेलिया , साउथ अफ्रीका, जैसी टीमों का दबदबा था , तब इन दोनों ने अपनी टीम को एक पहचान दी. दुनिया की मज़्बूत से मज़्बूत टीमों से अपनी टीम को लड़ना सिखाया बात हो रही है दो खिलाडि़यों की जो रिश्ते में थे भाई पर दोनों थे तबाही. जीतना सिखाया , आँखों मैं आँखे डाल कर भिडना सिखाया ..
एंडी फ्लावर और ग्रांट फ्लावर की जिसने ज़िम्बब्वे को अंतरराष्ट्रीय पटल पर एक नई पहचान दिलाई. क्रिकेट में कुछ कहानियाँ आँकड़ों से बड़ी होती हैं। कुछ खिलाड़ी सिर्फ रन नहीं बनाते वो उम्मीद दिलाते हैं, कि मैं हूँ ना और ज़िम्बाब्वे के लिए वो नाम थे एंडी फ्लावर और ग्रांट फ्लावर . एक ऐसा मुल्क जहाँ क्रिकेट के लिए ना पैसों की रेलमपेल थी,ना सुविधाएँ, ना विशाल स्टेडियम्स, बस कुछ जज़्बाती लड़के, जिनके दिल में आग थी.
और उस आग का सबसे बड़ा शोला बन कर सामने आए फ्लावर बंधु.
फ्लावर नहीं फायर थे एंडी
1992 में जब ज़िम्बाब्वे को टेस्ट का दर्जा मिला,तो सबको लगा ये टीम तो बस खानापूर्ति करेगी क्योकि उस वक़्त तक ज़िम्बाब्वे बहुत कमज़ोर टीम मानी जाती थी लेकिन 1992 के उसी साल एक बल्लेबाज़ ने डेब्यू किया,जिसने दुनिया को बताया कि ज़िम्बाब्वे भी अब झुकेगा नहीं. पहला टेस्ट यानि डेब्यू मैच अक्टूबर 1992, भारत के खिलाफ हारारे मेंऔर पहले ही मैच में शतक ठोक दिया.यहीं से कहानी शुरू हुई उस खिलाड़ी की .जो आने वाले दशक तक पूरी टीम की रीढ़ बना
करियर आँकड़े:
टेस्ट – 63 मैच, 4794 रन, औसत 51.54
12 शतक, 27 अर्धशतक, बेस्ट 232*
वनडे 213 मैच, 6786 रन, औसत 35.34
4 शतक, 55 फिफ्टीज़, बेस्ट 145 रन
एंबेसडर थे एंडी फ्लावर
विकेटकीपर होते हुए भी इतने रन ये कोई मामूली बात नहीं थी. वो अपने दौर के टॉप-5 बल्लेबाज़ों में शुमार थे,सचिन, लारा, पॉ और ड्राविड जैसे नामों के बीचज़िम्बाब्वे का एक “Flower” भी खिलता था. लेकिन असली कहानी सिर्फ रिकॉर्ड्स की नहीं,बल्कि उस संघर्ष की है जब ये टीम बार-बार टूटी और फिर उठी. कभी राजनीति ने टीम को तोड़ा, कभी पैसे की कमी ने हौसले छीन लिए. पर एंडी फ्लावर हर बार अपने बल्ले से जवाब देते रहे. 2001 में जब उन्होंने टीममेट हेनरी ओलोंगा के साथ Black Armband Protest” किया तो पूरी दुनिया ने देखा कि क्रिकेट सिर्फ खेल नहीं एक आवाज़ भी हो सकता है. उन्होंने और ओलोंगा ने मैदान पर काली पट्टी बाँधकर ज़िम्बाब्वे में हो रहे अन्याय के खिलाफ़ विरोध जताया. उसके बाद करियर तो खत्म हुआ पर नाम अमर हो गया.
ग्रांट फ्लावर का योगदान
उनके छोटे भाई ग्रांट फ्लावर जो ज़मीन से जुड़ा बल्लेबाज़, जिसने कई बार टीम को सँभाला जब एंडी आउट हो चुके होते थे. ग्रांट के नाम 67 टेस्ट में 3457 रन, 6 शतक,और 221 ODI में 6571 रन हैं. दोनों भाइयों ने मिलकर ज़िम्बाब्वे की नींव रखी. उसके बल्ले में तकनीक की धार थी,पर आँखों में संघर्ष का शौर्य वो हर पारी के साथ कहता था. दोनों भाईयों ने इंग्लैंड में ऐसेक्स के लिए काउंटी क्रिकेट भी साथ खेला और खूब धमाल किया. ज़िम्बाब्वे छोटा देश है, पर हौसला बड़ा है. फ्लावर भाईयों के बाद वो ज़माना धीरे-धीरे ढल गया,टीम बिखर गई, खिलाड़ी प्रवासी बन गए,पर ज़िम्बाब्वे की क्रिकेट आत्मा अब भी उनके जैसे खिलाड़ियों से सांस लेती है.


