फरीदाबाद: खेत की मेड़ों पर उड़ती राख… पौधों की पत्तियों पर सफेद परत… और बिना किसी महंगी खाद के लहलहाती फसल. फरीदाबाद के किसान आज भी अपने बुजुर्गों के उस देसी नुस्खे को जिंदा रखे हुए हैं जिसे आधुनिक खेती के दौर में लोग लगभग भूल चुके हैं. लकड़ी और गोबर के कंडों से निकली राख अब किसानों के लिए नेचुरल पोटाश बन गई है. यह राख न सिर्फ फसल के दानों को भर रही है बल्कि फलों का वजन बढ़ाने और कीटों से बचाव का भी सस्ता और असरदार हथियार साबित हो रही है. रासायनिक खादों और कीटनाशकों के बढ़ते दाम के बीच किसान फिर से देसी खेती की ओर लौट रहे हैं.
फरीदाबाद के किसान महेंद्र सैनी ने Local18 से बातचीत में बताते हैं मैं पिछले 35 सालों से खेती कर रहा हूं और आज भी राख डालकर खेती करता हूं. आजकल लोग डीएपी, यूरिया और अंग्रेजी दवाइयां डालते हैं लेकिन कहीं ना कहीं वो हमारी सेहत के लिए नुकसानदायक हैं. हमारे बुजुर्ग भी राख का इस्तेमाल करते थे. राख को फसलों और पेड़ों पर छिड़क दो तो कीड़ा नहीं लगता और पौधों को कोई नुकसान भी नहीं होता.
लकड़ी और गोबर की राख बनी नेचुरल पोटाश
महेंद्र बताते हैं लकड़ी और गोबर के कंडे जलने के बाद जो राख बचती है उसमें पोटाश भरपूर मात्रा में होता है. इसके अलावा कैल्शियम, मैग्नीशियम और फास्फोरस जैसे कई सूक्ष्म पोषक तत्व भी पाए जाते हैं. यही वजह है कि राख डालने से फसल के दाने चमकदार होते हैं और फल का वजन बढ़ता है. किसान इसे सब्जियों में टमाटर, बैंगन, मिर्च और आलू में इस्तेमाल करते हैं. वहीं धान, आम, नींबू और अमरूद जैसी फसलों में भी यह काफी फायदेमंद मानी जाती है.
कीटों से बचाव में असरदार है देसी तरीका
महेंद्र बताते हैं पहले एक टीडीसी पाउडर आता था उसे राख में मिलाकर डालते थे तो कोई भी कीट हो खत्म हो जाता था. उसका असर 15 से 20 दिन तक रहता था. अब भी हम राख डालते हैं तो फसल कहीं ना कहीं ऑर्गेनिक हो जाती है. शरीर को भी कोई नुकसान नहीं होता. राख का छिड़काव तब किया जाता है जब पौधा थोड़ा बड़ा हो जाए. हर 15 दिन में इसे डालना पड़ता है और अगर बारिश हो जाए तो उससे पहले ही दोबारा छिड़काव कर दिया जाता है. गोबर की खाद खेत की जुताई के समय डाली जाती है.
नीम, गुड़ और छाछ से तैयार होता है ऑर्गेनिक स्प्रे
इसके अलावा मैं नीम के पत्तों, गुड़ और छाछ से भी ऑर्गेनिक स्प्रे तैयार करता हूं. महेंद्र बताते हैं एक ड्रम में नीम के पत्ते डाल दिए उसमें थोड़ा गुड़ और छाछ मिला दिया फिर उसका स्प्रे पौधों पर कर दिया. इससे कीटनाशक खत्म हो जाते हैं. अगर किसान ऐसे ऑर्गेनिक तरीके अपनाएं तो शरीर को भी नुकसान नहीं होगा और फसल भी अच्छी होगी.
रासायनिक खाद छोड़ किसान अपना रहे प्राकृतिक खेती
महेंद्र बताते हैं आजकल लोगों को तुरंत आराम चाहिए. जैसे कोई बीमार हो जाए तो अंग्रेजी दवाई जल्दी असर करती है लेकिन देसी दवाई थोड़ा समय लेती है. वैसे ही डीएपी और यूरिया से फसल जल्दी बड़ी हो जाती है लेकिन नुकसान भी करती है. ऑर्गेनिक तरीके में थोड़ा समय लगता है पर वो सेहत के लिए फायदेमंद होती है और खाने में भी स्वादिष्ट लगती है.
ऑर्गेनिक खेती की ओर लौट रहे हरियाणा के किसान
किसान का मानना है कि राख सिर्फ एक घरेलू अवशेष नहीं बल्कि मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने वाला प्राकृतिक खजाना है. यही वजह है कि महंगी रासायनिक खादों के दौर में भी फरीदाबाद के कई किसान पुराने देसी तरीकों को अपनाकर खेती को फिर से प्राकृतिक बनाने में जुटे हुए हैं.


