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ताजमहल जैसी नायाब इमारत का निर्माण सहारनपुर में कराने वाले मुगल बादशाह शाहजहां ने अपने स्थापत्य प्रेम के पंख सहारनपुर तक फैलाए थे. उन्होंने यहां पर शाही शिकारगाह का निर्माण कराया. जब वे शिकार के लिए दिल्ली से यहां पर आते थे तो इन्हीं शाही शिकारगाहों में शिकार करते थे. इन शिकारगाहों को बादशाही बाग और बादशाही महल के नाम से जाना जाता है.
ताजमहल जैसी नायाब इमारत का निर्माण सहारनपुर में कराने वाले मुगल बादशाह शाहजहां ने अपने स्थापत्य प्रेम के पंख सहारनपुर तक फैलाए थे. उन्होंने यहां पर शाही शिकारगाह का निर्माण कराया. जब वे शिकार के लिए दिल्ली से यहां पर आते थे तो इन्हीं शाही शिकारगाहों में शिकार करते थे. इन शिकारगाहों को बादशाही बाग और बादशाही महल के नाम से जाना जाता है.

मुगल बादशाह शाहजहां को कला, संस्कृति और स्थापात्य से काफी लगाव रहा है. इसका उदाहरण यहां पर बनाए गए शाही शिकारगाहों से मिलता है. अपने शासन काल में शाहजहां ने सहारनपुर के सिद्ध फकीर बाबा लालदास की ख्याति सुनी तो वह दिल्ली से यहां पर दौड़े चले आए. बाबा लालदास के दर्शन करने के बाद शाहजहां शिवालिक पर्वत मालाओं का भ्रमण करने के लिए निकले तो यहां के मनोरम दृष्य उनके दिल को छू गए.

सहारनपुर जनपद अपनी पुरानी विरासत को आज भी संजोए हुए है. यहां पर आज भी हजारों साल पुरानी इमारतें मौजूद हैं जो की खंडहर में तब्दील हो चुकी हैं. उन्हीं में से एक है भूल भुलैया के नाम से जाने जाने वाली लगभग 500 साल पुरानी इमारत. जो कि सहारनपुर के कस्बा गंगोह से 5 किलोमीटर दूर लखनौती में स्थित है.
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इस भूल भुलैया को देखने और यहां पर अपने नाम के तौर पर निशानी छोड़ना लोग काफी पसंद करते हैं. यह स्थान मुगल क़ालीन भूल भुलैया है. पहले इस भूलभुलैया में एक कुआं था. मगर, वक़्त की मार के कारण कुआं अब बंद हो गया है. यह स्थान लखनौती से 5 किलोमीटर की दूरी पर शकरपुर में स्थित है. पहले यह इलाक़े की सुंदर इमारता म सँ एक थी. पहले इसमें ऊपर इमारत में जाने के लिए अंदर ही अंदर चार सीढ़ीदार रास्ते थे, जिनको लोग अक्सर भूल जाया करते थे.

सहारनपुर जनपद के मुजफ्फरनगर स्टेट हाईवे पर बसे गांव कोटा की स्थापना करीब 500 वर्ष पूर्व लाला चरणदास ने की थी. मिर्च के कारोबारी चरणदास का परिवार मुफलिसी में राजस्थान के कोटा शहर से रोजी-रोटी की तलाश में यहां आया था. बताते हैं कि बुरे वक्त में कोई साधु रोटी मांगने लाला के घर पहुंचा तो उस वक्त घर में खाने को कुछ नहीं था. लाला की माता ने पड़ोस से मांग कर उन्हें रोटी दी थी.

सैकड़ों गांवों में जमींदारा होने के साथ ही अदालत तक उनके यहां लगती थी. बताया जाता है कि लाला चरणदास पर माया (लक्ष्मी) मेहरबान हुई और उनको इतनी संपत्ति से भर दिया कि यहां से लेकर हरिद्वार तक 552 गांव उनके हुआ करते थे. कहते हैं कि आज तक उनके वचन का माया (लक्ष्मी) पालन करते हुए उनका इंतजार रही हैं. आधे से ज्यादा हवेलियां खंडहर में तब्दील हो चुकी हैं. उस समय में कोठी से तालाब तक महिलाओं के स्नान करने जाने के लिए बाकायदा सुरंग तक बनाई गई थीदेहरादून हाईवे पर स्थित सहारनपुर की जिला कारागार अब इतिहास के एक नए चैप्टर की तरफ बढ़ रही है. आज जहां कैदियों की सलाखें हैं, वहां कभी रोहिल्ला राजाओं का राजमहल और गढ़ था. करीब 200 साल पुराना यह किला न सिर्फ सहारनपुर की पहचान रहा है बल्कि रोहिल्ला वंश की सत्ता का केंद्र भी.

यह भव्य किला कभी रोहिल्ला शासकों की सत्ता का केंद्र था. 1789 में गुलाम कादिर की मौत के साथ ही रोहिल्ला साम्राज्य का अंत हो गया और सहारनपुर मराठों के आधिपत्य में आ गया. अंग्रेजों के शासनकाल में इस किले की संरचना का उपयोग जेल के रूप में करना शुरू किया गया. करीब 150 साल पहले भारतीय पुरातत्व विभाग ने इस किले को संरक्षित इमारत घोषित कर दिया था, लेकिन ब्रिटिश सरकार ने इसे कारागार में तब्दील कर दिया.


