Bareilly Market Crisis: कभी अपनी चहल-पहल और रौनक के लिए मशहूर ‘झुमका सिटी’ बरेली के बाजार आज एक अजीब सी खामोशी की चादर ओढ़े हुए हैं. यह सन्नाटा किसी त्योहार की आहट का नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर उपजे तनाव और आर्थिक अनिश्चितता का परिणाम है. अंतरराष्ट्रीय पटल पर, विशेषकर अमेरिका की नीतियों और विभिन्न देशों के बीच बढ़ते युद्ध के हालातों ने सीधे तौर पर बरेली के आम आदमी की जेब और व्यापारियों की उम्मीदों पर प्रहार किया है. आज आलम यह है कि शोर-शराबे से भरे रहने वाले बाजारों में दुकानदार ग्राहकों की राह तकते-तकते शाम कर देते हैं, लेकिन रौनक नहीं लौट रही.
बरेली के प्रतिष्ठित समाजसेवी सोनू ठाकुर बताते हैं कि जब भी दुनिया के किसी कोने में युद्ध की चिंगारी भड़कती है, उसकी तपिश सबसे पहले स्थानीय व्यापार तक पहुंचती है. सोनू ठाकुर के अनुसार, ‘हमारा पूरा अस्तित्व ग्राहकों पर टिका है, लेकिन अब बाजार में पैर रखने की जगह होने के बावजूद ग्राहकों की कमी है. हम सुबह दुकान खोलते हैं, लेकिन पूरा दिन गिनती के लोगों के इंतजार में गुजर जाता है. यह सिर्फ व्यापार का नुकसान नहीं, बल्कि एक मध्यमवर्गीय समाज की उम्मीदों का टूटना है.’
महंगाई का कहर: बाजारों से गायब हुई भीड़
बाजार की बदलती सूरत पर मनोज मौर्य की पीड़ा भी साफ झलकती है. वे बताते हैं कि पहले जहां पैर रखने की जगह नहीं मिलती थी, वहां अब सन्नाटा पसरा है. बढ़ती महंगाई और भविष्य के डर ने लोगों को घरों में कैद होने पर मजबूर कर दिया है. मनोज कहते हैं, ‘लोग अब केवल बहुत जरूरी सामान ही खरीद रहे हैं. विलासिता तो दूर, बुनियादी चीजों की बिक्री में भी भारी गिरावट आई है. कई बार तो बोहनी (पहली बिक्री) होना भी दूभर हो जाता है.’
रसोई गैस का संकट और सरकार से गुहार
वहीं, व्यापारी गुड्डू कश्यप ने सरकार की नीतियों और जमीनी समस्याओं पर प्रहार किया है. उनका कहना है कि व्यापार तभी चलेगा जब आम आदमी के पास बचत होगी. गुड्डू बताते हैं, ‘आज रसोई गैस जैसी बुनियादी चीजें आसानी से उपलब्ध नहीं हैं. जब एक आम आदमी के लिए घर का चूल्हा जलाना ही चुनौती बन जाए, तो वह बाजार में खरीदारी के लिए कैसे आएगा? सरकार को समझना होगा कि सूक्ष्म स्तर पर अर्थव्यवस्था दम तोड़ रही है.’
परिवहन और रेहड़ी-पटरी वालों का संघर्ष
आर्थिक मंदी की यह मार केवल बड़ी दुकानों तक सीमित नहीं है. ई-रिक्शा चालक जीतू बताते हैं कि सवारी मिलना अब किस्मत की बात हो गई है. ‘महंगाई की वजह से अगर हम थोड़ा किराया बढ़ाते हैं, तो सवारी बैठती नहीं और पुराने किराए पर घर का खर्च नहीं चलता.’
इसी तरह, ठेले पर खाना बेचने वाले अरुणनाथ की कहानी भी संघर्षपूर्ण है. गैस की किल्लत और ऊंचे दामों के कारण उन्हें अब पुरानी ‘अंगीठी’ का सहारा लेना पड़ रहा है. अंगीठी पर काम धीमा होता है, जिससे वे ग्राहकों को समय पर खाना नहीं दे पाते और उनकी दैनिक कमाई भी घट गई है.
भविष्य की चिंता: रोजगार पर मंडराता खतरा
स्थानीय नागरिक अनिरुद्ध का मानना है कि यदि यही स्थिति बनी रही, तो बेरोजगारी का संकट विकराल रूप ले लेगा. वे सरकार से अपील करते हैं कि इस कठिन समय में गरीब और मध्यम वर्ग को राहत देने के लिए ठोस कदम उठाए जाएं और रोजगार के नए अवसर सृजित किए जाएं.
समाधान की प्रतीक्षा में ‘नाथ नगरी’
बरेली का बाजार आज महज आर्थिक गिरावट का गवाह नहीं है, बल्कि यह उन हजारों परिवारों की बेबसी की कहानी कह रहा है जिनका जीवन रोज की कमाई पर टिका है. अंतरराष्ट्रीय तनाव और महंगाई के इस दोहरे वार ने ‘नाथ नगरी’ के व्यापारियों की मुस्कान छीन ली है. अब हर आंख में एक ही सवाल है कि क्या बरेली के बाजारों में फिर से वही पुरानी रौनक लौटेगी?


