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Supreme court on namaz right to women in mosque: सभी नमाज पढ़ने मस्जिद जाएंगे तो बच्चों को कौन देखेगा? महिलाओं को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने की टिप्पणी

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सभी नमाज पढ़ने मस्जिद जाएंगे तो बच्चों को कौन देखेगा? SC की अहम ट‍िप्‍पणी

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Supreme court on Women Namaz right: महिलाओं के मस्जिद में नमाज पढ़ने के अधिकार मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अहम ट‍िप्‍पणी की है. न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह ने कहा क‍ि अगर पर‍िवार के सभी लोग मस्‍जि‍द में नमाज पढ़ने चले जाएंगे तो घर में बच्‍चों की देखभाल कौन करेगा?

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सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंड‍िया ने मह‍िलाओं के मस्‍ज‍िद में नमाज अदा करने को लेकर अहम ट‍िप्‍पणी की है.

Supreme Court on Women Namaz rights: सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं के घर में नमाज पढ़ने के मुद्दे पर बेहद अहम टिप्पणी की है. सर्वोच्च न्यायालय की नौ-न्यायाधीशों की पीठ में गुरुवार को महिलाओं के मस्जिद में नमाज पढ़ने के अधिकार और उससे जुड़ी धार्मिक प्रथाओं को लेकर बहस हो रही थी, तभी न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह ने नमाज को लेकर यह बड़ी बात कही.

महिलाओं के मस्जिद में नमाज पढ़ने के मामले में सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह ने कहा कि इस्लाम के प्रारंभिक काल से ही महिलाओं के मस्जिद में प्रवेश पर कोई प्रतिबंध नहीं रहा है, हालांकि नमाज अदा करने को लेकर कुछ परंपराएं और प्रक्रियाएं अवश्य विकसित हुई हैं.

इस दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता एमआर शमशाद ने दलील दी कि महिलाओं के लिए अलग स्थान निर्धारित करने की परंपरा को अदालत द्वारा चुनौती नहीं दी जानी चाहिए. उन्होंने कहा कि भले ही महिलाओं के मस्जिद में नमाज पढ़ने पर कोई रोक नहीं है, लेकिन घर पर नमाज अदा करना अधिक उपयुक्त माना गया है.

इस पर न्यायमूर्ति अमानुल्लाह ने टिप्पणी करते हुए कहा कि अगर परिवार के सभी वयस्क सदस्य मस्जिद चले जाएंगे, तो बच्चों की देखभाल कौन करेगा. यह भी एक व्यावहारिक कारण हो सकता है कि महिलाओं के लिए घर पर नमाज को प्राथमिकता दी गई.

सुनवाई के दौरान शमशाद ने वर्ष 1994 के इस्माइल फारुकी केस के फैसले को भी चुनौती देने की मांग की. उस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि नमाज पढ़ने के लिए मस्जिद अनिवार्य नहीं है, क्योंकि इसे खुले स्थान पर भी अदा किया जा सकता है. शमशाद ने इसे अतार्किक बताते हुए कहा कि मस्जिद इस्लाम का मूल तत्व है और सभी धार्मिक प्रथाएं इससे जुड़ी होती हैं.

उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि महिलाओं को मस्जिद में समान स्थान या अग्रिम पंक्ति में नमाज पढ़ने की मांग कुरान में वर्णित नहीं है. साथ ही उन्होंने कहा कि मस्जिद में गर्भगृह जैसी कोई अवधारणा नहीं होती.

इस पर न्यायमूर्ति अमानुल्लाह ने कहा कि महिलाओं के नमाज पढ़ने की व्यवस्था चाहे वह अलग स्थान हो या पंक्ति में खड़े होने का क्रम लगभग 1200 वर्षों से चली आ रही परंपराओं पर आधारित है.

यह मामला धार्मिक स्वतंत्रता, लैंगिक समानता और परंपराओं के बीच संतुलन का महत्वपूर्ण उदाहरण बनता जा रहा है. सुप्रीम कोर्ट की यह सुनवाई आने वाले समय में इस विषय पर एक स्पष्ट संवैधानिक दृष्टिकोण तय कर सकती है.

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प्रिया गौतमSenior Correspondent

Priya Gautam is an accomplished journalist currently working with Hindi.News18.com with over 14 years of extensive field reporting experience. Previously worked with Hindustan times group (Hindustan Hindi) and …और पढ़ें



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