Last Updated:
Allahabad Highcourt Order: अक्सर ट्रेन-बस या फिर शादी समारोह स्थल पर किन्नर पहुंचकर लोगों से उपहार के रूप में पैसे मांगते हैं. अब किन्नरों की ओर से बधाई उपहार के नाम पर की गई अवैध वसूली को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि किन्नरों को ऐसे उपहार या पारंपरिक भेंट (नजराना) लेने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है.
किन्नरों की अवैध वसूली को लेकर HC का फैसला
प्रयागराज: अक्सर आपने देखा होगा कि जब भी आपके घर में नई बहू आती है या घर में किलकारी गूंजती है, तो किन्नर बधाई उपहार लेने के लिए आ जाते हैं और आपसे जबरन तगड़ी रकम ऐंठ लेते हैं. कभी-कभी तो कुछ मामलों में गाली-गलौज भी हो जाती है. लेकिन अब इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इस पर एक अहम फैसला सुनाया है. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि किन्नरों को ऐसे उपहार या पारंपरिक भेंट (नजराना) लेने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है.
दरअसल इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रेखा देवी बनाम उत्तर प्रदेश सरकार के बीच 15 अप्रैल को दिए गए अहम फैसले में किन्नरों की ओर से कथित रूप से अपने ‘क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र’ के अतिक्रमण के खिलाफ सुरक्षा की मांग वाली याचिका को खारिज कर दिया. कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा कि इस तरह की भेंट लेने का कोई कानूनी अधिकार किन्नरों को नहीं दिया गया है.
‘अवैध वसूली का कानून में कोई अधिकार नहीं’
वेबसाइट ‘बार एंड बेंच’ की एक रिपोर्ट के अनुसार, याचिकाकर्ता ने कोर्ट में अपनी बात रखते हुए कहा कि इस प्रकार की वसूली सालों से चली आ रही है और यह प्रथागत अधिकार है. याचिकाकर्ता की बात सुन न्यायधिश बेंच ने कहा, ‘किसी भी शख्स को किसी अन्य व्यक्ति से किसी भी प्रकार का धन, कर, शुल्क या उपकर वसूलने की अनुमति देने वाला कोई वैध या कानूनी आधार नहीं है. याचिकाकर्ता की ओर से मांगे गए ऐसे अधिकार कानून की ओर से मान्यता प्राप्त नहीं हैं और इसलिए भारत के संविधान के अनुच्छेद-226 के तहत कोर्ट अपनी शक्ति का प्रयोग करते हुए कानून के समर्थन के बिना याचिकाकर्ता की मांग को वैध नहीं ठहरा सकता है’.
भारतीय न्याय संहिता के तहत अपराध
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने आगे कहा कि एक व्यक्ति किसी नागरिक को केवल उतनी ही कर, उपकर या शुल्क का भुगतान करने का निर्देश दिया जा सकता है, जो सिर्फ कानून में वैध हो. कोर्ट ने याचिकाकर्ता की मांग को ठुकराते हुए इस प्रकार के धन की वसूली को अवैध करार दिया. कोर्ट ने सख्त रूख अपनाते हुए कहा, ‘यदि याचिकाकर्ता के प्रति किसी प्रकार की नरमी दिखाई जाती है, तो कई अन्य व्यक्ति या गिरोह सक्रिय हो सकते हैं, जो आम जनता से अवैध वसूली कर रहे हों. इस तरह की अवैध वसूली को इस देश में कानून की ओर से कभी भी मान्यता नहीं दी गई है और इस तरह की वसूली भारतीय न्याय संहिता के तहत एक अपराध है’.
आम जनता के लिए संरक्षण प्रदान
वहीं इस वसूली के नाम पर डर दिखाने और जबरन वसूली करने वालों को लेकर कोर्ट ने बताया कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 के तहत इससे आम जनता का संरक्षण किया जा सकता है यानि उन्हें डरने की कोई जरूरत नहीं है. कोर्ट ने कहा, ‘हमने पाया है कि ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के अधिकार संरक्षण अधिनियम, 2019 के प्रावधानों के अनुसार भी ऐसे किसी अधिकार की रक्षा करने का प्रयास नहीं किया गया है, जबकि उक्त अधिनियम में ट्रांसजेंडर व्यक्ति को अपना लिंग निर्धारित करने का अधिकार दिया गया है. भारत की संसद में 2026 का एक नया विधेयक विचाराधीन है, जो किसी व्यक्ति के लिंग निर्धारण के संबंध में 2019 के अधिनियम से काफी भिन्न है’.
About the Author

आर्यन ने नई दिल्ली के जामिया मिलिया इस्लामिया से पत्रकारिता की पढ़ाई की और एबीपी में काम किया. उसके बाद नेटवर्क 18 के Local 18 से जुड़ गए.


