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Womans Success Story: समाज के तानों से लेकर 20,000 फीट की बर्फीली चोटियों को फतह करने तक, भोजपुर की शिक्षिका आराधना की कहानी रोंगटे खड़े कर देने वाली है. दिव्यांगता को अपनी सबसे बड़ी ताकत बनाकर आसमान में पैराग्लाइडिंग करने वाली आराधना आज बिहार की आयरन लेडी बन चुकी हैं. एक मां, एक टीचर और एक जांबाज खिलाड़ी के रूप में उनकी यह दास्तां हर उस व्यक्ति के लिए मिसाल है जो हालातों के आगे घुटने टेक देता है. जानिए कैसे एक साधारण गांव की लड़की ने अपनी जिद से नामुमकिन को मुमकिन कर दिखाया.
भोजपुर: हौसले अगर बुलंद हों तो शारीरिक अक्षमता कभी बाधा नहीं बनती. बिहार के भोजपुर जिले की एक दिव्यांग शिक्षिका ने इस बात को सच कर दिखाया है. पीरो प्रखंड के एक छोटे से गांव से निकलकर आसमान की ऊंचाइयों और पहाड़ों की चोटियों तक पहुंचने वाली आराधना की कहानी आज लाखों लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन गई है.
तानों से मिली चोट को बनाया अपनी ताकत
जितौरा पंचायत के बसावन राय टोला की रहने वाली आराधना एक साधारण परिवार से आती हैं.उनके पिता अयोध्या प्रसाद एक पूर्व सैनिक हैं. बचपन में दिव्यांगता के कारण उन्हें समाज के तीखे तानों का सामना करना पड़ा. लोग अक्सर कहते थे इससे कुछ नहीं होगा, इसकी शादी कैसे होगी? ये बातें आराधना के मन को कचोटती थीं. लेकिन उन्होंने हार मानने के बजाय कुछ ऐसा करने की ठानी जो एक सामान्य इंसान के लिए भी चुनौतीपूर्ण हो.
पहाड़ों की चोटी से पैराग्लाइडिंग तक का सफर
आराधना की जिंदगी में नया मोड़ साल 2016 में आया. जब उन्होंने एडवेंचर स्पोर्ट्स की दुनिया में कदम रखा. उन्होंने देश के प्रतिष्ठित संस्थानों से कड़ी ट्रेनिंग ली. 2018 में जवाहरलाल पर्वतारोहण संस्थान (पहलगाम) और माउंट आबू से बेसिक व एडवांस रॉक क्लाइंबिंग कोर्स. 2019 में नेहरू इंस्टीट्यूट ऑफ माउंटेनियरिंग (उत्तरकाशी) से विशेष प्रशिक्षण.
आराधना ने हिमाचल की माउंट फ्रेंडशिप, नाग टिब्बा, केदारकंठ और लद्दाख की युनाम चोटी (20,049 फीट) को फतह कर तिरंगा लहराया. सिर्फ पहाड़ ही नहीं आराधना ने आसमान में भी अपनी धाक जमाई. उन्होंने हिमाचल के बीर बिलिंग में पैराग्लाइडिंग पायलट की ट्रेनिंग ली. 12 हजार फीट की ऊंचाई तक उड़ान भरकर सुरक्षित लैंडिंग करने वाली बिहार की पहली दिव्यांग महिला बनीं.
मां, शिक्षिका और खिलाड़ी, तीनों जिम्मेदारियों का संगम
वर्तमान में आराधना गड़हनी ब्लॉक के उत्क्रमित माध्यमिक विद्यालय, हदियाबाद में शिक्षिका के रूप में कार्यरत हैं. उनके जीवन में एक नया अध्याय तब जुड़ा जब वे एक बेटी की मां बनीं. आज उनकी बेटी करीब डेढ़ साल की है. आराधना बताती हैं कि वे स्कूल, घर और खेल, इन तीनों जिम्मेदारियों को बखूबी निभा रही हैं. जो लोग कभी ताने देते थे. आज वही उन्हें अपना रोल मॉडल मानते हैं. इस सफर में उन्हें अपनी पंचायत की मुखिया अपर्णा सिन्हा का भी भरपूर सहयोग मिला.
अगला लक्ष्य माउंट एवरेस्ट और सेवन समिट्स
आराधना का सपना अभी थमा नहीं है. वे दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट फतह करना चाहती हैं. सातों महाद्वीपों की सबसे ऊंची चोटियों पर भारत का नाम रोशन करना चाहती हैं. हालांकि यह सफर काफी खर्चीला है. इसके लिए उन्हें प्रायोजकों की तलाश है. उनका संदेश स्पष्ट है विकलांगता शरीर में नहीं, बल्कि सोच में होती है. अगर इंसान ठान ले तो कोई भी ऊंचाई मुश्किल नहीं होती.
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