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गाजीपुर का फूलनपुर केवल एक गांव नहीं, बल्कि खुशबू और परंपरा की ऐसी जीवंत कहानी है जो सदियों से अपनी पहचान को संजोए हुए है. इस इलाके की हवा में गुलाब, बेला और कुंद की महक आज भी उसी तरह घुली हुई है जैसे सैकड़ों साल पहले हुआ करती थी. स्थानीय लोगों का मानना है कि यहां फूलों की खेती की परंपरा 200 से 300 साल पुरानी है, जो पीढ़ी दर पीढ़ी माली परिवारों के हाथों में आगे बढ़ती रही है.
गाजीपुर. इस जिले के इतिहास की पहचान अक्सर यहां के क्रांतिकारियों और स्वतंत्रता सेनानियों के फौलादी इरादों से होती है, लेकिन इसी शहर की मिट्टी में एक ऐसी कोमल महक भी रची-बसी है जो सदियों पुरानी है. यह महक आती है फूलनपुर से, एक ऐसा इलाका जहां की हवाओं में आज भी गुलाब और बेला की खुशबू घुली हुई है. हम यहां बात कर रहे सदियों पुराने गाजीपुर के फूलनपुर जिसका नाम और पहचान में फूलों की खुशबू घुली है. फूलनपुर में फूलों की खेती कब शुरू हुई, इसका सटीक अनुमान लगाना तो मुश्किल है, लेकिन स्थानीय निवासी इसे 200 से 300 साल पुरानी परंपरा मानते हैं. हमारी मुलाकात 70 वर्षीय चंद्रजीत माली से हुई, जिनकी झुर्रियों में इस पेशे का गहरा अनुभव छिपा है. वे बताते हैं की, मेरे दादा-परदादा इसी मिट्टी में फूल उगाते थे, आज मैं उसी विरासत को आगे बढ़ा रहा हूं. चंद्रजीत आज भी करीब 20 बिस्वा जमीन पर बेला, कुंद और चांदनी जैसे फूलों की खेती कर रहे हैं.
देसी गुलाब की रुखसती और अंग्रेजी का दौर
वक्त के साथ फूलनपुर की फिजाएं बदल गई हैं, चंद्रजीत बड़े भारी मन से बताते हैं कि पहले यहां देसी गुलाब और चमेली की खेती बड़े पैमाने पर होती थी, लेकिन अब ये किस्में धीरे-धीरे खत्म हो रही हैं. इनकी जगह अब अंग्रेजी गुलाब ने अपने पैर पसार लिए हैं. खेती का रकबा भी पहले के मुकाबले काफी सिमट गया है, फिर भी करीब 50 परिवार आज भी इस खुशबूदार विरासत को जिंदा रखे हुए हैं.
हाथों का हुनर फूल भी उगाते हैं और माला भी पिरोते हैं
चंद्रजीत माली का दिन सूरज की पहली किरण के साथ शुरू होता है. वे बताते हैं, हम सुबह-सुबह फूल चुनते हैं और फिर फूलनपुर की मुख्य सड़क पर अपनी दुकान सजाते हैं. यहां के माली सिर्फ फूल उगाते ही नहीं, बल्कि उन्हें बड़ी खूबसूरती से मालाओं में पिरोते भी हैं. कोई शादी-ब्याह के लिए ले जाता है, तो कोई पूजा-पाठ के लिए.
मौसम का चक्र और बाजार की मांग
चंद्रजीत के अनुसार, फूलों का भी अपना एक अनुशासन है. जाड़े के दिनों में कुंद की सफेदी बिखरती है, तो गर्मी के छह महीनों में बेला अपनी खुशबू से इलाका महकाता है. वे कहते हैं कि मांग के हिसाब से वे कभी-कभी गेंदा भी लगा लेते हैं, ताकि गुजर-बसर ठीक से हो सके.
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नमस्ते मेरा नाम मोनाली है, पेशे से पत्रकार हूं, ख़बरें लिखने का काम है. लेकिन कैमरे पर समाचार पढ़ना बेहद पसंद है. 2016 में पत्रकारिता में मास्टर्स करने के बाद पांच साल कैमरे पर न्यूज़ पढ़ने के साथ डेस्क पर खबरे…और पढ़ें


