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Bundelkhand Water Crisis: बुंदेलखंड का पाठा क्षेत्र अक्सर अपनी पथरीली जमीन और भीषण जल संकट के लिए सुर्खियों में रहता है. जहां गर्मी की आहट मिलते ही हैंडपंप जवाब दे जाते हैं और जलस्रोत दम तोड़ देते हैं, वहीं चित्रकूट के मानिकपुर ब्लॉक का जारोमाफी गांव एक सुखद अपवाद बना हुआ है. इस गांव में स्थित सन 1947 यानी आजादी के समय का एक ऐतिहासिक कुआं आज भी ग्रामीणों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है. हैरान करने वाली बात यह है कि रिकॉर्ड तोड़ गर्मी में भी इस कुएं की जलधारा कभी कम नहीं होती, बल्कि यह पूरे साल लबालब भरा रहता है.
बुंदेलखंड के पाठा क्षेत्र में भौगोलिक विषमताओं के कारण पानी का संकट काफी गहरा है. पथरीली जमीन होने की वजह से भूजल स्तर काफी नीचे चला जाता है, जिससे अधिकांश कुएं और हैंडपंप गर्मियों में सूख जाते हैं. लेकिन जारोमाफी गांव का यह पुराना कुआं पूरे साल पानी से लबालब भरा रहता है.

गांव के लोगों का कहना है कि यह कुआं दो-तीन पीढ़ियों से उनकी प्यास बुझा रहा है. जब आसपास के सभी स्रोत सूख जाते हैं, तब जारोमाफी और आसपास के लोग इसी कुएं पर आश्रित रहते हैं.गांव के बुजुर्ग नथू के अनुसार, यह कुआं उनके जन्म से भी पहले का है. पहले यह कच्चा हुआ करता था, लेकिन इसकी जलधारा हमेशा सक्रिय रही.

इस कुएं की सबसे बड़ी विशेषता इसका प्राकृतिक तापमान है. ग्रामीण इसे किसी चमत्कार से कम नहीं मानते कि भीषण गर्मी के मौसम में इस कुएं का पानी फ्रिज जैसा ठंडा रहता है, जबकि कड़ाके की ठंड में पानी हल्का गर्म महसूस होता है. इतना ही नहीं, खेतों की सिंचाई के लिए भारी मात्रा में पानी निकालने के बावजूद इसका जलस्तर टस से मस नहीं होता.
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जारोमाफी के ग्राम प्रधान विपिन मिश्रा बताते हैं कि यह कुआं केवल एक जलस्रोत नहीं, बल्कि गांव की जीवनरेखा है. संकट के समय में यह कुआं अकेले करीब 2000 लोगों की प्यास बुझाता है. इसकी महत्ता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि क्षेत्र में कहीं भी बारात आती है, तो टैंकरों के माध्यम से इसी कुएं का पानी सप्लाई किया जाता है.

कुएं के महत्व को देखते हुए पंचायत द्वारा इसके आसपास पक्की सड़क और बारात घर का निर्माण भी कराया गया है ताकि पानी भरने आने वालों को सुविधा हो सके. कुएं की जलधारा इतनी प्रबल है कि इसकी सफाई करना एक बड़ी चुनौती बन जाता है. प्रधान के मुताबिक, जब कभी कुएं की सफाई की योजना बनती है.

इसके पानी के स्रोत को रोकना नामुमकिन सा हो जाता है. पानी निकालने के लिए बड़ी मशीनों का सहारा लेना पड़ता है, फिर भी इसकी कोख खाली नहीं होती. आधुनिक समय में गहरे बोरवेल और नए कुएं जहां कुछ ही सालों में सूख रहे हैं, वहीं 1947 का यह ऐतिहासिक ढांचा आज भी अपनी सार्थकता सिद्ध कर रहा है.


