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वर्तमान समय में शादियों में लाखों रुपए खर्च होते हैं. यहां तक कि एक दूल्हे को तैयार करने में ही लाखों रुपए के कपड़े, जूते और अन्य सामान मिलते हैं, लेकिन शायद आपको पता नहीं होगा कि आज के लगभग 50 साल पहले गांव में शादियां ऐसी व्यवस्थाओं में होती थी. जिस समय लोगों के पास कपड़े का भी जतन नहीं होता था.
सुल्तानपुरः वर्तमान समय में शादियों में लाखों रुपए खर्च होते हैं. यहां तक कि एक दूल्हे को तैयार करने में ही लाखों रुपए के कपड़े, जूते और अन्य सामान मिलते हैं, लेकिन शायद आपको पता नहीं होगा कि आज के लगभग 50 साल पहले गांव में शादियां ऐसी व्यवस्थाओं में होती थी. जिस समय लोगों के पास कपड़े का भी जतन नहीं होता था. आज हम एक बुजुर्ग से जानेंगे कि उस समय दूल्हे को कौन-कौन सी पोशाक पहनाए जाते थे और जिन लोगों के पास वह पोशाक उपलब्ध नहीं होता था. वह कैसे उसका इंतजाम करते थे.
धोती कुर्ता था पारंपरिक ड्रेस
ग्रामीण व बुजुर्ग माता प्रसाद मिश्रा लोकल 18 से बताते हैं कि उस दौर में दूल्हे को आमतौर पर धोती-कुर्ता पहनाया जाता था. कई जगहों पर सफेद और हल्के रंग की धोती के साथ लंबा कुर्ता और सिर पर साफा पगड़ी बांधी जाती थी. कुछ परिवारों में शेरवानी का चलन था, लेकिन वह बहुत कम लोगों के पास होती थी. पैरों में चमड़े के जूते मोची के यहां से किराये पर लाया जाता था. कई लोगों को जब यह नहीं मिलता था तो हुए जूते की की जगह साधारण चप्पल और देसी जूती पहनाई जाती थी. दूल्हे के हाथ में रूमाल और सिर पर फूलों का सेहरा लगाया जाता था, जो गांव के लोग मिलकर तैयार करते थे. इसके साथ ही लोगों को शेरवानी की जगह जामा पहनाया जाता था.
पूरा गांव मिलकर मनाता था जश्न
आज के 50-60 साल पहले शादियां केवल एक परिवार का नहीं बल्कि पूरे गांव का आयोजन होती थीं. गांव की महिलाएं एक साथ मिलकर खाना बनाती थीं और पुरुष बारात की तैयारी में जुट जाते थे. दूल्हे को तैयार कराने में भी गांव के बुजुर्ग और रिश्तेदार मदद करते थे. यदि किसी के पास साफा बांधने का हुनर होता था तो वह यह जिम्मेदारी निभाता था. लोगों के यहां आर्थिक कमी सबके एकता और सहयोग के पीछे छिप जाती थी. माता प्रसाद अपने बचपन की शादियों को याद करते हैं बताते हैं कि समय के साथ अब विवाह का कलर बदल गया है रस्में भी अब अलग-अलग तरह से निभाई जाती हैं.
मांग कर होता था काम
पहले जब किसी के यहां शादी विवाह होता था तो सिर्फ उसी गांव के ही नहीं बल्कि आसपास अन्य गांव के लोगों के यहां चारपाई और बिस्तर इकट्ठा किया जाता था ताकि बारातियों को किसी प्रकार की कोई दिक्कत न होने पाए और उस कार्यक्रम में गांव के लोग सबका सहयोग भी करते थे.
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मैं रजनीश कुमार यादव, 2019 से पत्रकारिता से जुड़ा हूं. तीन वर्ष अमर उजाला में बतौर सिटी रिपोर्टर काम किया. तीन वर्षों से न्यूज18 डिजिटल (लोकल18) से जुड़ा हूं. ढाई वर्षों तक लोकल18 का रिपोर्टर रहा. महाकुंभ 2025 …और पढ़ें


