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Varieties Of Mango: बरेली और पूरे उत्तर भारत में आम सिर्फ एक फल नहीं, बल्कि गर्मियों की सबसे मीठी पहचान है. दशहरी, चौसा, लंगड़ा और तोतापुरी जैसी देसी किस्मों से लेकर महाराष्ट्र के हापुस (अल्फांसो) तक हर आम अपने अनोखे स्वाद, खुशबू और बनावट के लिए जाना जाता है. कहीं मीठा और रसीला स्वाद दिल जीत लेता है तो कहीं खट्टेपन का हल्का सा तड़का स्वाद को खास बना देता है. गर्मियों के मौसम में बागों से लेकर बाजारों तक आमों की यह रंगीन दुनिया लोगों की पसंद और परंपरा दोनों को जोड़ देती है.
दशहरी भारत की सबसे प्रसिद्ध आम की किस्मों में से एक है. यह अपने मीठे स्वाद, खुशबू और कम रेशेदार गूदे के लिए बहुत पसंद किया जाता है. इसके लिए दोमट मिट्टी सबसे अच्छी होती है, इसे अच्छी धूप चाहिए होती है. पानी नियमित लेकिन ज्यादा जलभराव नहीं होना चाहिए. बरेली के लोग इस आम को खाना बहुत पसंद करते हैं और सीजन में हर जगह यह आम आसानी से लोगों को उपलब्ध हो जाता है. मार्केट में 100 से 150 रुपए किलो दशहरे आम मिलता है.

देसी अमिया जिसे हम आम भाषा में आम के रूप में देखते हैं, वह पकने से पहले तोड़ ली जाती है. इसकी घर में कई प्रकार की सब्जियां बनाई जाती है, ये अचार डालने के काम भी आता है. साथ ही साथ महिलाओं को अमिया खाने में काफी पसंद आती है. इसका टेस्ट बिल्कुल खट्टा होता है, काले नमक के साथ खाने से पेट का हाजमा भी सही रहता है.

बरेली के लोगों को चौसा आम खाना काफी पसंद है. आम की यह वैरायटी बरेली में ऑर्गेनिक तरीके से भी उगाई जा रही है. देसी तरीके से भी बरेली के वातावरण में यह आम आराम से उग जाता है. चौसा आम भारत की सबसे लोकप्रिय और स्वादिष्ट आम की किस्मों में से एक है. यह अपने बहुत मीठे, रसदार और सुगंधित स्वाद के लिए जाना जाता है. यहां आम यह देर से पकने वाली किस्म है.
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बरेली शहर के, लोगों को आम खाना काफी पसंद है, लंगड़ा आम भारत की सबसे मशहूर और पसंदीदा आम की किस्मों में से एक है. सबसे ज्यादा बनारस का लंगड़ा आम प्रसिद्ध है. बरेली और पूरे उत्तर प्रदेश में भी इसकी खेती होती है. लंगड़ा आम खाने के कई सारे फायदे हैं. यह आम देसी भाषा में देसी आम कहा जाता है. बरेली के वातावरण में आराम से उग जाता है, इसका साइज भी दिखने में अच्छा होता है. कलर भी बेहतरीन होता है और मार्केट में डेढ़ सौ से ₹200 किलो मिल जाता है. और खाने में बेहद मीठा होता है.

बरेली शहर में तोतापुरी आम की मांग बढ़ती जा रही है. इस आम का निचला हिस्सा तोते की चोंच की तरह मुड़ा हुआ होता है. इसी कारण इसका नाम ‘तोतापुरी’ या ‘तोतापरी’ पड़ा है. इसका छिलका मोटा होता है, जो पकने पर हल्के हरे और पीले रंग का मिश्रण दिखता है. इसके अंदर का गूदा गहरा पीला या नारंगी होता है और इसमें रेशे नहीं होते हैं. बरेली में कुछ किसान जैविक खेती कर इस तरह के आम की वैरायटी को उगा कर 300 से ₹500 किलो तक बेच रहे हैं.

अल्फांसो, जिसे महाराष्ट्र में हापुस के नाम से जाना जाता है. इसको भारत में “आमों का राजा” कहा जाता है. बेहद मीठा, मलाईदार स्वाद और एक अनोखी, मनमोहक खुशबू, इसमें रेशा बिल्कुल नहीं होता. इसका गूदा गाढ़ा और चमकीले पीले-नारंगी रंग का होता है. इसका आकार अंडाकार होता है और पकने पर छिलका सुनहरा पीला हो जाता है. जिस पर हल्का लाल रंग का शेड आ जाता है.

बरेली के वातावरण में यह आम ऑर्गेनिक तरीके से अब उगाया जा रहा है. बरेली के लोगों को अलग-अलग प्रदेश के सीजन में होने वाले आम खाना काफी पसंद है. उत्तर भारत में इसे सफेदा, आंध्र प्रदेश में बंगनपल्ली या बेनिशान, तमिलनाडु में चपटाई और कर्नाटक, राजस्थान में कुछ जगहों पर बादामी कहा जाता है. यह आम बहुत ज्यादा अत्यधिक मीठा नहीं होता, बल्कि इसका स्वाद हल्का खट्टा-मीठा और बहुत सुगंधित होता है. इसका टोटल सॉल्युबल सॉलिड्स, स्तर लगभग 15 से 17 होता है.

गर्मियों के सीजन में आम से अचारी भी डाली जाती है. अचारी का सीजन आते ही बरेली के लोगों को इस आम की काफी जरूरत घर में आम की अलग-अलग वैरायटी के अचार डालने के लिए पड़ती है. उत्तर भारत विशेषकर उत्तर प्रदेश की एक बेहद प्रसिद्ध और पारंपरिक आम की किस्म है. जिसे मुख्य रूप से “अचारी आम” के नाम से जाना जाता है. इसका गूदा बहुत कड़ा और सख्त होता है, जिससे नमक और मसालों में मिलने के बाद भी इसकी फांकें गलती नहीं हैं और लंबे समय तक साबुत रहती हैं.


