नई दिल्ली. क्रिकेट को अनिश्चितताओं का खेल कहा जाता है, लेकिन जब अनिश्चितता अंपायर के फैसलों से पैदा हो, तो खेल का रोमांच विवाद की शक्ल ले लेता है. कल रात अरुण जेटली स्टेडियम में कुछ ऐसा ही हुआ, जहाँ दिल्ली कैपिटल्स और गुजरात टाइटंस के बीच खेला गया मुकाबला किसी सस्पेंस थ्रिलर से कम नहीं था. लेकिन इस फिल्म का विलेन कोई गेंदबाज या बल्लेबाज नहीं, बल्कि अंपायरिंग का एक ऐसा फैसला बना जिसने दिल्ली के हाथ से जीत छीन ली.
अरुण जेटली स्टेडियम में मामला जीत हार से ज्यादा उस नियम का हो गया है जिसमें बॉल डेड दिए जाने दिल्ली उस एक रन से महरूम रह गई जो टीम को हार से बचा सकती था. कई क्रिकेट जानकार तो ये भी कहने लगे है कि अगर बल्लेबाज आउट नहीं है तो उसके बनाए रन उसके खाते में जाने जाहिए और डेड बॉल के रूल पर बहुत गंभीरता से विचार करने की जरूरत है.
9.2 ओवर का वो ‘गुनाह’
दिल्ली की पारी के 9.2 ओवर में जब नितिश राणा राशिद खान की फिरकी को रिवर्स स्वीप करने की कोशिश कर रहे थे, तब गेंद उनके पैड से टकराई. मैदान पर अंपायरिंग कर रहे नितिन मेनन और अनिल सहस्त्रबुद्धे ने कुछ पलों की खामोशी के बाद उंगली खड़ी कर दी. उधर, बल्लेबाज एक रन के लिए दौड़ चुके थे. राणा ने तुरंत रिव्यू (DRS) लिया, और रिप्ले में साफ दिखा कि गेंद ने बैट का किनारा लिया था. फैसला पलटा, राणा ‘नॉट आउट’ करार दिए गए, लेकिन दिल्ली की हार की इबारत वहीं लिखी जा चुकी थी.
नियमों की बलि चढ़ी दिल्ली
आईसीसी के नियमों के अनुसार, जैसे ही ऑन-फील्ड अंपायर आउट का इशारा करता है, गेंद तुरंत ‘डेड’ मान ली जाती है. इसका मतलब है कि उसके बाद बल्लेबाज चाहे दुनिया के दस चक्कर लगा ले, वो रन स्कोरबोर्ड में नहीं जुड़ेंगे. राणा ने रन तो पूरा किया, लेकिन अंपायर की उस ‘गलत’ उंगली ने उस बेशकीमती रन को रद्द करवा दिया.
एक रन का फासला और मायूसी
मैच के अंत में जब दिल्ली कैपिटल्स महज 1 रन से हारी, तब डगआउट में सन्नाटा पसर गया. फैंस सोशल मीडिया पर उबल पड़े अगर अंपायर ने फैसला देने में जल्दबाजी न की होती या सही फैसला लिया होता, तो वो एक रन आज दिल्ली की किस्मत बदल देता. दिग्गज कमेंटेटरों का भी मानना है कि जब तकनीक मौजूद है, तो अंपायरों को फैसले में थोड़ी देरी करनी चाहिए ताकि रन पूरा होने के बाद ही ‘डेड बॉल’ का नियम लागू हो.
दिल्ली के लिए यह हार किसी गहरे जख्म से कम नहीं है, जहाँ वो मैदान पर तो नहीं हारे, लेकिन नियमों के चक्रव्यूह में फंसकर मात खा गए. क्या बीसीसीआई और आीसीसी इन नियमों पर दोबारा विचार करेगा, या अंपायरिंग की ये गलतियाँ ऐसे ही मैच का पासा पलटती रहेंगी.


