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कभी ममता बनर्जी के दाहिने हाथ माने जाते थे शुवेंदु, क्यों हुई अनबन, फिर डाला उन्हीं की जड़ों में मट्ठा

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एक समय था जब शुवेंदु अधिकारी को ममता बनर्जी का “दाहिना हाथ” माना जाता था. वह दीदी के सबसे करीबी और सबसे विश्वस्त सलाहकार थे. पार्टी में वह नंबर दो नेता माने जाने लगे थे. ये कहा जाता था कि ममता बगैर उनसे पूछे कोई काम नहीं करतीं. फिर ऐसा क्या हो गया कि उनकी और दीदी की अनबन हुई कि वो ममता से ऐसी नाराज हुए कि कभी पलटकर उनकी ओर देखा ही नहीं बल्कि उन्हीं की जड़ों में ऐसा मट्ठा डाला कि 15 सालों से बंगाल में चल रही तृणमूल की सत्ता जड़ से ही उखड़ गई.

बंगाल की राजनीति को जानने वाले करीब 20 साल के पहले नंदीग्राम आंदोलन को याद करते हैं, जबकि शुवेंदु का जबरदस्त उदय हुआ था. देखते ही देखते वह नंदीग्राम आंदोलन के ‘कमांडर’ ही नहीं बने बल्कि ममता के भरोसेमंद बन गए.

नंदीग्राम आंदोलन के कमांडर

ये वर्ष 2007 की बात है. तत्कालीन मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने टाटा ग्रुप को नैनो कार की फैक्ट्री लगाने के लिए नंदीग्राम आमंत्रित किया. वहां किसानों की जमीनों का अधिग्रहण करके टाटा को फैक्ट्री लगाने के लिए जरूरी जमीन दी जाने वाली थी. इसी दौरान ममता ने इसके विरोध में उतरकर नंदीग्राम आंदोलन छेड़ दिया ताकि किसानों की जमीन नहीं ली जा सके.

शुवेंदु अधिकारी एक जमाने में तृणमूल के दूसरे ताकतवर नेता थे लेकिन तृणमूल में अभिषेक बनर्जी के उदय के बाद उन्हें लगने लगा कि वो पार्टी में किनारे लगाए जा रहे हैं.

ये आंदोलन बड़ा होता गया. जब ममता बनर्जी कोलकाता में विरोध प्रदर्शन कर रही थीं, तब शुवेंदु अधिकारी जमीन पर रहकर वामपंथी सरकार के खिलाफ मोर्चा संभाले हुए थे. उन्होंने नंदीग्राम के घर-घर जाकर लोगों को जोड़ा, जिससे ममता बनर्जी का भरोसा उन पर अटूट हो गया. ममता बनर्जी उन पर इतना विश्वास करती थीं कि उन्होंने उन्हें पार्टी में असीमित शक्तियां दे रखी थीं.

उन्हें केवल उनके गृह जिले पूर्व मेदिनीपुर तक ही सीमित नहीं रखा गया, बल्कि जंगलमहल, पुरुलिया और बांकुरा जैसे कठिन क्षेत्रों में पार्टी को जिताने की जिम्मेदारी भी दे दी गई. ममता के बाद वह इकलौते ऐसे नेता थे जिनकी पूरे राज्य में अपनी एक अलग पहचान और जनाधार था.

महत्वपूर्ण महकमे सौंपे गए

2011 में जब तृणमूल सत्ता में आई, तो ममता ने उन्हें महत्वपूर्ण परिवहन मंत्रालय सौंपा. बाद में उन्हें सिंचाई और जल संसाधन जैसे भारी-भरकम विभाग भी दिए गए. वह सरकार और पार्टी दोनों में ममता बनर्जी के सबसे प्रभावशाली सिपहसालार थे.

पूरा अधिकारी परिवार ही था बहुत खास

ममता बनर्जी ने न केवल शुवेंदु, बल्कि उनके पूरे परिवार पर विश्वास जताया था. उनके पिता शिशिर अधिकारी और भाई दिब्येंदु अधिकारी को भी पार्टी में ऊंचे पद और टिकट दिए गए. एक समय ऐसा था जब मेदिनीपुर क्षेत्र में ममता बनर्जी का मतलब ही ‘अधिकारी परिवार’ होता था.

पिछले चुनावों में भी शुवेंदु अधिकारी ने ममता बनर्जी को नंदीग्राम में हराया था. (फाइल फोटो/ANI)

शुवेंदु का कद पार्टी में इतना बड़ा था कि उन्हें ममता बनर्जी का स्वाभाविक उत्तराधिकारी माना जाने लगा था. यही कारण है कि जब उन्होंने पार्टी छोड़ी, तो इसे ममता बनर्जी के लिए सबसे बड़ा व्यक्तिगत और राजनीतिक झटका माना गया.

क्यों आ गई दरार

सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर क्यों उन्होंने उस पार्टी को छोड़ दिया, जिसे उन्होंने ममता के साथ मिलकर खड़ा किया था. दोनों के बीच दरार रातों-रात नहीं आई थी, बल्कि ये लंबे समय से चल रही राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं और संगठनात्मक मतभेदों का परिणाम थी.

अभिषेक और प्रशांत किशोर से हुए असहज

सबसे बड़ा कारण तृणमूल कांग्रेस के भीतर शक्ति संतुलन का बदलना माना जाता है. ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी का कद पार्टी में तेजी से बढ़ा, जिससे शुवेंदु को लगा कि उन्हें और अन्य पुराने नेताओं को किनारे किया जा रहा है. शुवेंदु खुद को ममता के बाद दूसरे सबसे बड़े नेता के रूप में देखते थे, लेकिन अभिषेक की बढ़ती सक्रियता ने एक “उत्तराधिकार की जंग” जैसी स्थिति पैदा कर दी.

2019 के लोकसभा चुनावों के बाद पार्टी में सुधार के लिए रणनीतिकार प्रशांत किशोर को लाया गया. उनके हस्तक्षेप और काम करने के तरीके से सुवेंदु असहज थे. पार्टी के जिला स्तर के निर्णयों में शुवेंदु का जो एकाधिकार था, उसे चुनौती मिलने लगी थी.

शुवेंदु को हालांकि ममता बनर्जी ने पार्टी छोड़कर जाने से रोकने के लिए बहुत कोशिश की लेकिन तब तक वो मन बना चुके थे.

कद छोटा करने की कोशिश हुई

शुवेंदु अधिकारी के पास कई महत्वपूर्ण मंत्रालय और जिलों का प्रभार था. धीरे-धीरे उनसे कुछ जिलों की जिम्मेदारी वापस ले ली गई. पार्टी के भीतर उनके प्रभाव को सीमित करने की कोशिशें हुईं. उन्हें लगा कि पार्टी अब उनकी जमीनी पकड़ का सम्मान नहीं कर रही है.

दिसंबर 2020 में इस्तीफा देने से पहले शुवेंदु ने कई मौकों पर बिना नाम लिए “अहंकार” और “वंशवाद” पर निशाना साधा था. उन्हें लगने लगा कि टीएमसी में उनका भविष्य अब सुरक्षित नहीं है. वह अपनी अलग पहचान बनाना चाहते थे.

नवंबर 2020 – उन्होंने राज्य मंत्रिमंडल से इस्तीफा दिया.
दिसंबर 2020 – उन्होंने तृणमूल की प्राथमिक सदस्यता और विधायक पद छोड़ा.
19 दिसंबर2020 – मेदिनीपुर में अमित शाह की मौजूदगी में वह औपचारिक रूप से भाजपा में शामिल हो गए.

और फिर रिश्ते कड़वे हो गए

इसका चरम बिंदु 2021 का विधानसभा चुनाव था, जहां शुवेंदु ने नंदीग्राम सीट पर ममता बनर्जी को सीधे चुनौती दी. कड़े मुकाबले में उन्हें हरा दिया, जिससे यह राजनीतिक लड़ाई पूरी तरह व्यक्तिगत और बेहद कड़वी हो गई.

वैसे मनाने की कोशिश भी खूब हुई

वैसे ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व ने शुवेंदु अधिकारी को मनाने की बहुत कोशिश तो की थी कि वो पार्टी में रुके रहें, बागी रुख नहीं अपनाएं लेकिन कोई भी तरीका कारगर नहीं हो सका. उन्हें पार्टी में रोकने के लिए कई दौर की बातचीत भी हुई.

इस्तीफा देने से ठीक पहले कोलकाता में एक महत्वपूर्ण बैठक हुई थी जिसमें सौगत राय, अभिषेक बनर्जी और चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर शामिल थे। बताया जाता है कि इस बैठक के दौरान ममता बनर्जी ने खुद फोन पर शुवेंदु से बात की थी ताकि उनके गिले-शिकवे दूर किए जा सकें. बैठक के बाद सौगत राय ने मीडिया से कहा भी था कि “सब कुछ ठीक हो गया है,” लेकिन शुवेंदु अगले ही दिन अपने रुख पर वापस लौट आए.

ममता बनर्जी ने अपने सबसे अनुभवी सांसद सौगत राय और वरिष्ठ नेता सुदीप बंदोपाध्याय को विशेष रूप से शुवेंदु को समझाने की जिम्मेदारी दी थी. इन नेताओं ने सुवेंदु के साथ कई बंद कमरे में बैठकें कीं. पार्टी उन्हें यह अहसास दिलाना चाहती थी कि वह अब भी परिवार का हिस्सा हैं.

ममता को लगता था कि शुवेंदु मान जाएंगे

शुरुआती दिनों में जब शुवेंदु ने बिना नाम लिए पार्टी पर हमले शुरू किए थे, तब भी ममता बनर्जी ने उन पर सीधा हमला करने से परहेज किया. उन्होंने जनसभाओं में इशारों-इशारों में पुराने साथियों को साथ रहने का संदेश दिया. टीएमसी नेतृत्व को उम्मीद थी कि शुवेंदु आखिरकार मान जाएंगे, क्योंकि उनका और उनके परिवार का पूरा राजनीतिक इतिहास ममता बनर्जी से जुड़ा था.

शुवेंदु की मुख्य शिकायत प्रशांत किशोर की कार्यशैली और अभिषेक बनर्जी के बढ़ते दखल को लेकर थी. चर्चाएं थीं कि पार्टी नेतृत्व ने उन्हें संगठन में अधिक स्वायत्तता देने का प्रस्ताव भी दिया लेकिन सुवेंदु को लगा कि अब स्थिति “पॉइंट ऑफ नो रिटर्न” पर पहुंच चुकी है. शुवेंदु को लगा कि ये कोशिशें केवल चुनाव तक उन्हें शांत रखने के लिए हैं. वह चाहते थे कि पार्टी में नंबर 2 की स्थिति स्पष्ट रहे, जिस पर सहमति नहीं बन पाई.

तब तक बंगाल में बीजेपी एक मजबूत विकल्प के रूप में उभर चुकी थी, जिसने शुवेंदु को एक बड़ा मंच और भविष्य की सुरक्षा का आश्वासन दिया. जब शुवेंदु ने गृह मंत्री अमित शाह के साथ मंच साझा किया, तब ममता बनर्जी ने भी रुख कड़ा कर लिया. मनाने की सारी कोशिशें आधिकारिक तौर पर बंद कर दी गईं.



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