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पहाड़ी इलाकों में आज भी भोटिया समुदाय के लोग इस जानवर को पालते हैं. उनके लिए ये सिर्फ एक पशु नहीं, बल्कि परंपरा और जीवनशैली का हिस्सा है. झुप्पू का दूध भी बहुत शुद्ध और फायदेमंद माना जाता है, जो आम गाय के दूध से अलग होता है. अब बात करते हैं चंवर की पूंछ की खासियत की. पहाड़ों में मान्यता है कि इसे घर में रखने से सकारात्मक ऊर्जा आती है.
पिथौरागढ़ः चंवर में लहराती ये खूबसूरत, मुलायम सी पूंछ आपने कभी न कभी मंदिरों या किसी के घर में जरूर देखी होगी. देखने में ये जितनी आकर्षक लगती है, उतनी ही दिलचस्प है इसकी कहानी. अक्सर लोग सोचते हैं कि ये किसी आम गाय की पूंछ होती है, लेकिन असल में ऐसा नहीं है. पहाड़ों में इसे चंवर गाय की पूंछ कहा जाता है, लेकिन ये एक खास तरह के जानवर से जुड़ी होती है जिसे स्थानीय भाषा में झुप्पू कहा जाता है. झुप्पू देखने में बिल्कुल सामान्य गाय जैसा नहीं होता, बल्कि काफी हद तक याक जैसा लगता है. इसके लंबे-घने बाल, मजबूत सींग और खासकर इसकी घनी, झबरीली पूंछ इसे सबसे अलग बनाती है.
बुरी नजर से करती है बचाव
पहाड़ी इलाकों में आज भी भोटिया समुदाय के लोग इस जानवर को पालते हैं. उनके लिए ये सिर्फ एक पशु नहीं, बल्कि परंपरा और जीवनशैली का हिस्सा है. झुप्पू का दूध भी बहुत शुद्ध और फायदेमंद माना जाता है, जो आम गाय के दूध से अलग होता है. अब बात करते हैं चंवर की पूंछ की खासियत की. पहाड़ों में मान्यता है कि इसे घर में रखने से सकारात्मक ऊर्जा आती है. लोग इसे शुभ मानते हैं और कहते हैं कि इससे घर में सुख-समृद्धि बनी रहती है. इसके साथ ही ये बुरी नजर और नकारात्मक ऊर्जा से भी बचाव करती है. यही वजह है कि इसे खास मौकों पर, पूजा-पाठ में या घर की सजावट में रखा जाता है.
तिब्बती प्रजाति की होती है गाय
भोटिया समुदाय की महिला राधा बनग्याल भी इस परंपरा को बहुत करीब से जानती हैं. उनका कहना है हमारे यहां झुप्पू को पालना पुरानी परंपरा है. ये तिब्बतन जात की गाय है इसका दूध 100 से 150 रूपये लीटर तक बिकता है और घी लगभग 1500 रूपये प्रति किलो. इसकी पूंछ को भी हम बहुत शुभ मानते हैं. इसे घर में रखने से अच्छा माहौल बना रहता है और नकारात्मक चीजें दूर रहती हैं. ये सिर्फ एक चीज नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति का हिस्सा है. उनकी बातों से साफ है कि ये सिर्फ एक मान्यता नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चला आ रहा विश्वास है, जिसे आज भी लोग पूरी श्रद्धा के साथ निभा रहे हैं. अगली बार जब आप चंवर की ये लहराती पूंछ देखें, तो इसे सिर्फ एक सजावटी चीज समझने की गलती मत कीजिए. इसके पीछे छिपी है पहाड़ों की संस्कृति, परंपरा और एक गहरा विश्वास, जो आज भी लोगों के दिलों में जिंदा है.
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मैं रजनीश कुमार यादव, 2019 से पत्रकारिता से जुड़ा हूं. तीन वर्ष अमर उजाला में बतौर सिटी रिपोर्टर काम किया. तीन वर्षों से न्यूज18 डिजिटल (लोकल18) से जुड़ा हूं. ढाई वर्षों तक लोकल18 का रिपोर्टर रहा. महाकुंभ 2025 …और पढ़ें


