नई दिल्ली: पिछले एक दशक से पूरी दुनिया ने देखा कि कैसे अमेरिका और भारत के रिश्ते मजबूती की नई ऊंचाइयों को छू रहे थे. क्वॉड (QUAD) से लेकर डिफेंस डील्स तक, हर जगह भारत को अमेरिका का सबसे भरोसेमंद साथी बताया गया. लेकिन साल 2025 के अंत और 2026 की शुरुआत ने इन दावों की पोल खोल दी है. ट्रंप प्रशासन के आने के बाद वॉशिंगटन की भाषा पूरी तरह बदल गई है. अब वहां गलियारों में भारत को एक ‘रणनीतिक पार्टनर’ नहीं, बल्कि एक ‘इकोनॉमिक राइवल’ यानी आर्थिक प्रतिद्वंदी कहा जा रहा है. यह बदलाव अचानक नहीं आया. इसके पीछे अमेरिका की अपनी गिरती अर्थव्यवस्था और भारत का तेजी से बढ़ता बाजार है. ट्रंप प्रशासन के डिप्टी सेक्रेटरी ऑफ स्टेट ने हाल ही में भारतीय जमीन पर खड़े होकर जो कहा, उसने पूरी दुनिया को चौंका दिया. उन्होंने साफ शब्दों में चेतावनी दी कि अमेरिका अब भारत के बाजार को इतना बड़ा नहीं होने देगा कि वह भविष्य में अमेरिकी कंपनियों को चुनौती दे सके.
यह बयान भारत की विकास दर पर लगाम लगाने की कोशिश है. जब कोई देश अपने सबसे करीबी दोस्त के घर जाकर उसे बढ़ने से रोकने की बात करे, तो समझ लेना चाहिए कि दोस्ती अब सिर्फ कागजों पर बची है.
ट्रंप के अपमानजनक बयान साफ बता रहे चल क्या रहा
डिप्लोमेसी में शब्दों का बहुत महत्व होता है, लेकिन ट्रंप की डिक्शनरी शायद थोड़ी अलग है. 15 अक्टूबर 2025 को ट्रंप ने प्रधानमंत्री मोदी के बारे में जो कहा, वह किसी भी संप्रभु राष्ट्र के लिए अपमानजनक हो सकता है. ट्रंप ने दावा किया कि वह मोदी के राजनीतिक करियर को खत्म कर सकते हैं, लेकिन वह ऐसा करना नहीं चाहते. यह एक तरह की संरक्षणवादी और अहंकारी सोच को दर्शाता है. अमेरिका अब भारत को बराबरी का दर्जा देने के बजाय उसे अपने एक क्लाइंट स्टेट की तरह ट्रीट करने की कोशिश कर रहा है.
रूस से तेल खरीद और अमेरिका का बढ़ता दखल
भारत की एनर्जी सिक्योरिटी हमेशा से उसकी विदेश नीति का एक स्वायत्त हिस्सा रही है. रूस-यूक्रेन संघर्ष के बाद से भारत ने अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए रूस से सस्ता तेल खरीदा, जो देश की अर्थव्यवस्था के लिए संजीवनी साबित हुआ. लेकिन ट्रंप प्रशासन को भारत की यह आजादी खटक रही है. फरवरी से अब तक भारत सरकार को रूस से तेल खरीदने के लिए तीन बार ‘वेवर’ यानी छूट की रिक्वेस्ट भेजनी पड़ी है.
अमेरिका अब इस छूट को एक हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहा है. वॉशिंगटन चाहता है कि भारत अपनी एनर्जी इंपोर्ट पॉलिसी को अमेरिकी हितों के हिसाब से ढाले. वे भारत की तेल खरीद पर अपनी निगरानी बढ़ाना चाहते हैं.
यह भारत की संप्रभुता में दखल है. ट्रंप का दबाव है कि भारत या तो रूस से पूरी तरह नाता तोड़े या फिर अमेरिका से महंगी गैस और तेल खरीदे. इस खींचतान ने दिल्ली और वॉशिंगटन के बीच अविश्वास की खाई को और गहरा कर दिया है.
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