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Dhoni or Ponting who is great captain: क्रिकेट इतिहास में कप्तानी एक ऐसी कला है जिसे कई दिग्गजों ने आजमाया, लेकिन सफलता के उस शिखर तक बहुत कम लोग पहुंच पाए जहां बड़े-बड़ों के हौसले पस्त हो जाते हैं. जब भी विश्व क्रिकेट के सबसे महान, चतुर और प्रभावशाली कप्तानों का जिक्र होगा, तो ऑस्ट्रेलिया के रिकी पोंटिंग और भारत के महेंद्र सिंह धोनी का नाम सबसे पहले जेहन में आएगा. इन दोनों कप्तानों ने न सिर्फ अपनी टीमों को जीतना सिखाया, बल्कि अपनी आक्रामक रणनीति, शातिर दिमाग और करिश्माई नेतृत्व के दम पर पूरी दुनिया में अपनी सफलता के झंडे गाड़े. एक तरफ पोंटिंग की अपराजेय कंगारू सेना थी, जिससे टकराने से दुनिया की बड़ी से बड़ी टीमें कतराती थीं, तो दूसरी तरफ धोनी का शांत और जादुई दिमाग था, जो हारी हुई बाजी को पलटने में माहिर था.
रिकी पोंटिंग (Ricky Ponting) और महेंद्र सिंह धोनी (MS Dhoni) की कप्तानी की शैली एक-दूसरे से बिल्कुल जुदा थी, लेकिन दोनों का मकसद सिर्फ और सिर्फ अपनी टीम को दुनिया में नंबर वन बनाना था. पोंटिंग जहां अपनी आक्रामकता, फ्रंट से लीड करने के जज्बे और मैदान पर विरोधी टीम पर मानसिक दबाव बनाने के लिए जाने जाते थे, वहीं धोनी को उनके ‘कैप्टन कूल’ वाले अंदाज के लिए पहचाना गया. धोनी का शांत स्वभाव और दबाव के क्षणों में भी सही फैसले लेने की क्षमता भारतीय क्रिकेट के लिए एक नया वरदान साबित हुई. इन दोनों कप्तानों ने अपनी-अपनी शैली से यह साबित किया कि कप्तानी करने का कोई एक तय फॉर्मूला नहीं होता, बल्कि आप अपनी ताकत के दम पर दुनिया पर राज कर सकते हैं.

महेंद्र सिंह धोनी (MS Dhoni) के नाम वर्ल्ड क्रिकेट का एक ऐसा अद्भुत और इकलौता रिकॉर्ड दर्ज है, जिसे छूना रिकी पोंटिंग जैसे महान कप्तान के लिए भी मुमकिन नहीं हो सका. धोनी दुनिया के एकमात्र ऐसे कप्तान हैं जिन्होंने आईसीसी की तीनों बड़ी सफेद गेंद की ट्रॉफियां अपने नाम की हैं. इस मामले में धोनी का कद पोंटिंग से भी थोड़ा ऊंचा नजर आता है. जहां पोंटिंग ने वनडे क्रिकेट में अपना दबदबा बनाया, वहीं धोनी ने क्रिकेट के तीनों प्रारूपों में आईसीसी के सबसे बड़े खिताबों पर भारत का नाम दर्ज कराकर इतिहास के पन्नों में अपना नाम अमर कर लिया. यह एक ऐसा कीर्तिमान है जो धोनी को क्रिकेट के सर्वकालिक महान कप्तानों की कतार में सबसे आगे खड़ा करता है.

धोनी के इस सुनहरे सफर की शुरुआत साल 2007 में हुई थी, जब भारतीय क्रिकेट एक बेहद नाजुक दौर से गुजर रहा था. सीनियर खिलाड़ियों की अनुपस्थिति में युवा महेंद्र सिंह धोनी को पहली बार भारतीय टीम की कमान सौंपी गई और वह भी क्रिकेट के सबसे नए नवेले फॉर्मेट यानी टी-20 वर्ल्ड कप में. धोनी ने अपनी चतुर रणनीति और युवाओं पर भरोसा जताते हुए दक्षिण अफ्रीका की धरती पर भारत को पहला टी-20 विश्व कप जिताया. फाइनल मुकाबले में पाकिस्तान के खिलाफ उनका आखिरी ओवर जोगिंदर शर्मा से कराना उनके शातिर दिमाग का एक ऐसा उदाहरण था, जिसने भारतीय क्रिकेट की दिशा और दशा हमेशा के लिए बदल दी और यहीं से ‘धोनी एरा’ की शुरुआत हुई.
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टी-20 की सफलता के बाद धोनी का असली इम्तिहान साल 2011 के घरेलू वनडे वर्ल्ड कप में था. पूरे देश की उम्मीदों का दबाव अपने कंधों पर लिए धोनी ने भारतीय टीम को एक सूत्र में पिरोया. पोंटिंग की मजबूत ऑस्ट्रेलियाई टीम को नॉकआउट में बाहर का रास्ता दिखाने के बाद, फाइनल में श्रीलंका के खिलाफ धोनी ने खुद को बैटिंग ऑर्डर में ऊपर प्रमोट किया. वानखेड़े स्टेडियम में श्रीलंका के खिलाफ लगाया गया उनका वो ऐतिहासिक विजयी छक्का आज भी हर भारतीय के दिल में बसा हुआ है. पोंटिंग की कप्तानी में ऑस्ट्रेलिया का जो वर्ल्ड कप पर एकाधिकार था, उसे तोड़ते हुए धोनी ने भारत को 28 साल बाद फिर से वनडे क्रिकेट का विश्व विजेता बना दिया.

धोनी की कप्तानी का करिश्मा यहीं नहीं रुका. साल 2013 में इंग्लैंड की उछालभरी और तेज पिचों पर चैंपियंस ट्रॉफी का आयोजन हुआ. इस टूर्नामेंट में धोनी ने एक बिल्कुल नई और युवा टीम इंडिया को मैदान पर उतारा, जिसमें शिखर धवन और रोहित शर्मा की नई ओपनिंग जोड़ी शामिल थी. बारिश से बाधित फाइनल मुकाबले में मेजबान इंग्लैंड के खिलाफ धोनी ने अपनी शातिर फील्डिंग सजावट और गेंदबाजों के बेहतरीन इस्तेमाल के दम पर भारत को चैंपियंस ट्रॉफी का खिताब भी दिला दिया. इस जीत के साथ ही धोनी ने आईसीसी की तीनों बड़ी ट्रॉफियों को जीतने की अपनी ऐतिहासिक हैट्रिक पूरी की, जिसने पोंटिंग के रिकॉर्ड को भी पीछे छोड़ दिया.

सफेद गेंद के अलावा लाल गेंद की क्रिकेट में भी धोनी ने भारतीय टीम को एक नई ऊंचाई दी. धोनी की ही कप्तानी का दौर था जब साल 2009 में भारतीय टीम इतिहास में पहली बार आईसीसी टेस्ट रैंकिंग में नंबर 1 के पायदान पर पहुंची थी. हालांकि, टेस्ट मैचों में धोनी का सफर वनडे जितना शानदार नहीं रहा. उन्होंने कुल 60 टेस्ट मैचों में भारतीय टीम का नेतृत्व किया, जिसमें से टीम इंडिया को 27 मैचों में जीत हासिल हुई. लेकिन इसके साथ ही उनके कप्तानी करियर में कुछ ऐसे काले पन्ने भी जुड़े, जब भारतीय टीम को इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया के दौरों पर 0-4 के शर्मनाक अंतर से क्लीन स्वीप का सामना करना पड़ा. विदेशी सरजमीं पर टेस्ट में मिली इन हारों ने धोनी की टेस्ट कप्तानी की सफलता को थोड़ा सीमित जरूर किया.

अब बात करते हैं ऑस्ट्रेलिया के उस दिग्गज की जिसकी कप्तानी में ऑस्ट्रेलियाई टीम को हराना लगभग नामुमकिन माना जाता था. रिकी पोंटिंग ने जब ऑस्ट्रेलियाई टीम की कमान संभाली, तो उनके पास दिग्गजों से सजी एक ऐसी टीम थी जो मैदान पर उतरते ही विपक्षी टीम का मनोबल तोड़ देती थी. पोंटिंग की कप्तानी में ऑस्ट्रेलिया ने लगातार दो बार यानी साल 2003 और साल 2007 में वनडे वर्ल्ड कप का खिताब अपने नाम किया. विशेष रूप से 2003 के वर्ल्ड कप फाइनल में भारत के खिलाफ खेली गई पोंटिंग की वो शतकीय पारी आज भी फैंस को याद है. पोंटिंग की कप्तानी का खौफ ऐसा था कि उनकी टीम सिर्फ मैच जीतती नहीं थी, बल्कि विरोधी टीम को पूरी तरह से नेस्तनाबूद कर देती थी.

अगर आंकड़ों के लिहाज से वनडे क्रिकेट के सबसे सफल कप्तान की बात की जाए, तो रिकी पोंटिंग का कोई सानी नहीं है. पोंटिंग ने साल 2002 से 2012 के बीच एक दशक से भी ज्यादा समय तक कुल 230 वनडे मैचों में ऑस्ट्रेलियाई टीम की कप्तानी की. इस दौरान उन्होंने अपनी टीम को रिकॉर्ड 165 मैचों में शानदार जीत दिलाई, जबकि सिर्फ 51 मैचों में उन्हें हार का सामना करना पड़ा. सबसे ज्यादा वनडे मैच जीतने वाले कप्तान के रूप में पोंटिंग का यह रिकॉर्ड आज भी अटूट है. वहीं दूसरी तरफ, धोनी ने भी भारत के लिए 200 वनडे मैचों में कप्तानी की जिम्मेदारी संभाली, जिसमें से भारतीय टीम 110 मैचों में जीत दर्ज करने में सफल रही, जो भारतीय क्रिकेट के लिहाज से एक बेहद शानदार आंकड़ा है.

धोनी जहां टेस्ट क्रिकेट में विदेशी सरजमीं पर संघर्ष करते नजर आए, वहीं रिकी पोंटिंग ने टेस्ट कप्तानी में एक बेहद मजबूत और अमिट छाप छोड़ी. पोंटिंग ने कप्तान के तौर पर कुल 77 टेस्ट मैच खेले. इन 77 मैचों में से ऑस्ट्रेलिया ने 48 मैचों में एकतरफा जीत हासिल की, जो उनकी कप्तानी की सफलता की दर को साफ बयां करता है. पोंटिंग की कप्तानी में ऑस्ट्रेलिया ने घरेलू मैदानों पर तो राज किया ही, साथ ही साथ विदेशी दौरों पर भी अपनी बादशाहत कायम रखी. टेस्ट क्रिकेट में पोंटिंग की यह अविश्वसनीय सफलता दर उन्हें धोनी के मुकाबले टेस्ट प्रारूप का एक अधिक प्रभावी और सफल कप्तान साबित करती है.

महेंद्र सिंह धोनी और रिकी पोंटिंग के कप्तानी के दौर की तुलना किसी एक पैमाने पर नहीं की जा सकती. पोंटिंग के पास जहां लगातार मैच जीतने और टेस्ट में दबदबा बनाने का अद्भुत रिकॉर्ड था, तो वहीं धोनी के पास आईसीसी की सभी बड़ी ट्रॉफियों को अपनी कैबिनेट में सजाने की वो जादुई कला थी जो इतिहास में किसी और के पास नहीं है. पोंटिंग ने 200 वनडे जीतों के साथ कप्तानी छोड़ी और धोनी ने 200 वनडे में कप्तानी कर भारत को हर बड़े मंच पर विजेता बनाया. इन दोनों कप्तानों ने विश्व क्रिकेट को सिखाया कि महानता सिर्फ रनों या शतकों से नहीं, बल्कि टीम को संकट से उबारने और उसे चैंपियन बनाने की सोच से तय होती है. ये दोनों जब भी मैदान से हटे, अपने पीछे एक ऐसा शून्य छोड़ गए जिसे भरना आज भी दोनों देशों के लिए एक बड़ी चुनौती है.


