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पहले दी एक कान से सुनने की अक्षमता को मात, फिर बन गया भारतीय क्रिकेट का ‘वॉशिंगटन’, गिल का सबसे बड़ा ‘गेम चेंजर’

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नई दिल्ली. भारतीय क्रिकेट इतिहास कुछ ऐसे विरले  खिलाड़ियों से भरा पड़ा है जो विपरीत हालात में ना सिर्फ मैदान पर उतरे साथ ही अपनी एक अलग पहचान भी बनाई. एक आंख से क्रिकेट खेलने वाले क्रिकेटर्स की कहानी तो बहुत है आज एक ऐसे खिलाड़ी की बात करते है जो एक कान से सुन नहीं सकता था पर उसके खेल की गूंज हर कोई सुन रहा है.

भारतीय क्रिकेट में जब भी संयम, तकनीक और विषम परिस्थितियों में लड़ने वाले खिलाड़ी की बात होती है, तो वॉशिंगटन सुंदर का नाम प्रमुखता से उभरता है.  पंजाब के खिलाफ हालिया मैच में जिस तरह वॉशिंगटन सुंदर अपनी जादुई बल्लेबाजी से हारी हुई बाजी पलट दी, उसने एक बार फिर साबित कर दिया कि यह खिलाड़ी दबाव में बिखरता नहीं, बल्कि निखरता है लेकिन क्या आप जानते हैं कि जिस खिलाड़ी की टाइमिंग के पीछे पूरी दुनिया दीवानी है, वह एक कान से बिल्कुल सुन नहीं सकते.

एक कान से सुनाई न देना: बाधा नहीं, बनी ताकत

वॉशिंगटन सुंदर जब महज चार साल के थे, तब एक गंभीर बीमारी के कारण उनके बाएं कान की सुनने की शक्ति पूरी तरह चली गई थी.  खेल के मैदान पर जहाँ दर्शकों का शोर और साथी खिलाड़ियों के संकेतों का बड़ा महत्व होता है, सुंदर के लिए यह एक बड़ी चुनौती थी.  हालांकि, उन्होंने कभी इसे अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया.  सुंदर ने अपनी एकाग्रता को इतना मजबूत किया कि मैदान पर वह सिर्फ गेंद और बल्ले के संपर्क को महसूस कर खेल की बारीकियों को समझते हैं.  उनकी यह जीवटता आज के युवाओं के लिए एक बड़ी मिसाल है.

नाम के साथ वॉशिंगटन जुड़ने की कहानी

सुंदर के नाम के साथ ‘वॉशिंगटन’ जुड़ने की कहानी बेहद भावुक और सम्मान से भरी है. उनके पिता, एम. सुंदर, खुद एक क्रिकेटर थे. उनके शुरुआती दिनों में पी.डी. वॉशिंगटन नाम के एक सज्जन ने उनकी बहुत मदद की थी.  उन्होंने न केवल सुंदर के पिता को क्रिकेट किट दिलाई, बल्कि स्कूल की फीस भरने से लेकर खेल की बारीकियों तक में साथ दिया.  जब एम. सुंदर के घर बेटा पैदा हुआ, तो उन्होंने अपने उस गॉडफादर (पी.डी. वॉशिंगटन) को श्रद्धांजलि देने के लिए अपने बेटे का नाम ‘वॉशिंगटन सुंदर’ रख दिया.

तीनों फॉर्मेट के उभरते सितारे

सुंदर केवल टी-20 के विशेषज्ञ नहीं हैं, बल्कि टेस्ट और वनडे में भी उनकी अहमियत लगातार बढ़ रही है.  गाबा की ऐतिहासिक जीत हो या घरेलू मैदान पर स्पिन का जलवा, सुंदर ने हर जगह अपनी उपयोगिता सिद्ध की है. वह एक ऐसे ऑलराउंडर हैं जो नई गेंद से पावरप्ले में गेंदबाजी कर सकते हैं और जरूरत पड़ने पर नंबर 5 या 6 पर आकर मैच फिनिशर की भूमिका भी निभा सकते हैं. उनकी शांत मानसिकता उन्हें तीनों फॉर्मेट में टीम इंडिया का ‘ट्रम्प कार्ड’ बनाती है.

शुभमन गिल और गुजरात टाइटंस के ‘गेम चेंजर’

इंडियन प्रीमियर लीग (IPL) में गुजरात टाइटंस के लिए वॉशिंगटन सुंदर एक महत्वपूर्ण कड़ी बनकर उभरे हैं.  कप्तान शुभमन गिल उन पर अटूट भरोसा जताते हैं.  गिल जानते हैं कि सुंदर एक ऐसे खिलाड़ी हैं जो मुश्किल ओवरों में रन रोक सकते हैं और बल्लेबाजी में गहराई प्रदान करते हैं.  पंजाब के खिलाफ उनकी मैच विनिंग पारी ने गुजरात के खेमे में उनकी जगह और भी पुख्ता कर दी है.  गिल के नेतृत्व में सुंदर न केवल एक गेंदबाज बल्कि एक शुद्ध बल्लेबाज के रूप में भी अपनी पहचान बना चुके हैं.

वॉशिंगटन सुंदर का सफर यह सिखाता है कि सफलता के लिए शारीरिक पूर्णता से अधिक मानसिक दृढ़ता जरूरी है.  एक कान से न सुन पाना उनके करियर की बाधा हो सकती थी, लेकिन उन्होंने इसे अपनी एकाग्रता का जरिया बना लिया.  आज वह सिर्फ अपने पिता के गॉडफादर का नाम रोशन नहीं कर रहे, बल्कि पूरे भारत के लिए एक ‘सुंदर’ भविष्य की उम्मीद बन गए हैं.



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