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फैज आलम सफलता की कहानी I mau news

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मऊ जनपद के बंदी कला निवासी फैज आलम ने संघर्ष के दम पर सफलता की मिसाल कायम की. नौकरी न मिलने पर उन्होंने 2003 में ₹50 हजार की लागत से बच्चों के कपड़ों की छोटी दुकान शुरू की. भाई और दोस्त के सहयोग से उन्होंने मेहनत जारी रखी और ग्राहकों का विश्वास जीता। आज वह आठ दुकानों के मालिक हैं और 8 से 10 लोगों को रोजगार दे रहे हैं, साथ ही गुणवत्ता और वैरायटी के कारण दूर-दूर से ग्राहक उनके यहां खरीदारी करने आते हैं.

मऊ. कहते हैं हर संघर्ष की एक कहानी होती है उसी का उदाहरण है मऊ जनपद के बंदी कला के रहने वाले फैज आलम की, जो कभी खुद नौकरी की तलाश कर रहे थे लेकिन बड़े भाई के सपोर्ट से उन्होंने एक छोटी सी दुकान की शुरुआत की और आज धीरे-धीरे आठ दुकान के मालिक हैं और 8 से 10 लोगों को रोजगार दे रहे हैं. लोकल 18 से बात करते हुए फैज आलम ने बताया कि उनका जन्म 2 जनवरी 1984 को कमरुद्दीन के घर हुआ और उन्होंने एमए तक पढ़ाई की. पढ़ाई के दौरान ही वह नौकरी की तलाश करने लगे. लेकिन नौकरी नहीं मिली फिर बड़े भाई महताब आलम ने आगे हाथ बढ़ाया और साहस दिया और मदद की अपना रोजगार शुरू करने के लिए. हालांकि यह समझ नहीं आ रहा था कि रोजगार किस चीज का करूं फिर एक मित्र अरविंद यादव ने आईडिया दिया और फिर छोटे बच्चों के कपड़ों की दुकान ₹50000 की लागत से मुहम्मदाबाद गोहना के न्यू मार्केट में अरीबा क्लॉथ स्टोर नाम से 2003 में शुरू की. धीरे-धीरे आज आठ दुकान के मालिक हो गए हैं और 8 से 10 लोगों को रोजगार दे रहे हैं.

छोटी सी दुकान से आज आठ दुकान के मालिक हैं फैज आलम
जब 2003 में छोटे बच्चों के कपड़ों की दुकान की शुरुआत की तो उन्हें यह उम्मीद नहीं थी कि आज वह आठ दुकान के मालिक बनेंगे. लेकिन वह प्रोडक्ट लेकर आए और मार्केट में विश्वास बनाते गए और धीरे-धीरे आज लेडिस और जेन्स दोनों लोगों के हर प्रकार के कपड़े उपलब्ध है. उनके यहां सभी ब्रांड के कपड़े उपलब्ध है यही वजह है कि उनके यहां कपड़े लेने लोग दूर-दराज से आते हैं. क्योंकि कपड़ों के क्वालिटी के मामले में वह कभी समझौता नहीं करते और उनके यहां स्पार्कि, डेनिम, ब्लैकबेरी, किलर जैसे सभी ब्रांड के कपड़े उपलब्ध हैं. यही वजह है कि उनके हाथ दूर-दूर से लोग कपड़े लेने आते हैं और लोगों के बीच में उनकी लोकप्रियता बनी हुई है क्योंकि वह कपड़ों में वैरायटी से कोई समझौता नहीं करते हैं.

आगे बढ़ाने में दोस्त का मिला सबसे बड़ा सहयोग
फैज आलम बताते हैं कि 50000 से जब वह बड़े भाई से पैसे लेकर दुकान की शुरूआत की तो उनके एक मित्र अरविंद यादव ने काफी सपोर्ट किया और जब भी पैसे की जरूरत पड़ी वह देते रहे और काफी कस्टमर भेजते रहे. धीरे-धीरे हर 2 साल में वह एक नई दुकान डालते गए और लोगों को रोजगार देते गए. हालांकि उनके यहां काम करने वाले कई कर्मी विदेश जाकर कर काम कर रहे हैं विदेश भेजने में उनका काफी सहयोग किया.

About the Author

Monali Paul

नमस्ते मेरा नाम मोनाली है, पेशे से पत्रकार हूं, ख़बरें लिखने का काम है. लेकिन कैमरे पर समाचार पढ़ना बेहद पसंद है. 2016 में पत्रकारिता में मास्टर्स करने के बाद पांच साल कैमरे पर न्यूज़ पढ़ने के साथ डेस्क पर खबरे…और पढ़ें



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