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बरेली शहर को क्यों कहा जाता है ‘बॉस बरेली’? इतिहास के पन्नों में छिपी दिलचस्प कहानी

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बरेली: उत्तर प्रदेश का बरेली शहर आज एक विकसित और तेजी से आगे बढ़ता हुआ नगर बन चुका है. ‘झुमका सिटी’ के नाम से मशहूर यह शहर अपनी आधुनिक पहचान के साथ, एक समृद्ध ऐतिहासिक विरासत भी अपने भीतर समेटे हुए है, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि कभी यही बरेली ‘बांस बरेली’ के नाम से जाना जाता था. उस समय यह क्षेत्र आज जितना प्रसिद्ध और विकसित नहीं था.

बरेली शहर की नींव राजा जगत सिंह कठेरिया ने 1537 ईस्वी में रखी थी. राजा जगत सिंह ने सबसे पहले जगतपुर नामक गांव बसाया था, जो आज भी बरेली का एक मुख्य आवासीय क्षेत्र है. कुछ ऐतिहासिक स्रोतों के अनुसार, ‘आधुनिक बरेली’ का विकास 1657 ईस्वी में मुगल गवर्नर मुकंद राय के समय में हुआ था.

बरेली की बदली पहचान
अगर हम इतिहास के पन्नों को पलटें, तो पता चलता है कि उस दौर में आंवला क्षेत्र ज्यादा प्रमुख और प्रसिद्ध माना जाता था. यह इलाका पंचाल क्षेत्र का हिस्सा था और जैन धर्म का एक महत्वपूर्ण केंद्र भी रहा है, जहां धार्मिक और सांस्कृतिक गतिविधियां अधिक होती थीं. बरेली के वरिष्ठ इतिहासकार डॉ. राजेश शर्मा बताते हैं कि पहले बरेली इतना प्रसिद्ध नहीं था. आंवला क्षेत्र ज्यादा महत्वपूर्ण था, क्योंकि वह पंचाल क्षेत्र का हिस्सा था और जैन धर्म का एक बड़ा केंद्र माना जाता था. धीरे-धीरे समय के साथ बरेली का विकास शुरू हुआ और इसकी पहचान बनने लगी.

इसलिए ‘बांस बरेली’ पड़ा नाम
इतिहासकार के अनुसार, बरेली का प्राचीन क्षेत्र ‘कठेर’ क्षेत्र के नाम से जाना जाता था. यहां पहले बांस के घने जंगल हुआ करते थे. इन बांसों से केन का फर्नीचर बनाया जाता था, जो उस समय काफी उपयोगी और लोकप्रिय था. उस दौर में एक परंपरा यह भी थी कि किसी स्थान का नाम वहां पाई जाने वाली प्रमुख वस्तु या विशेषता के आधार पर रखा जाता था. डॉ. राजेश शर्मा के अनुसार, यहां बांस बहुत अधिक मात्रा में पाया जाता था, इसलिए इसे ‘बांस बरेली’ कहा जाने लगा. राजा जगत सिंह ने इस क्षेत्र को बसाया और धीरे-धीरे यह इलाका विकसित होने लगा. उसी समय से यह नाम इतिहास में दर्ज हो गया.

समय के साथ बरेली का विस्तार धीरे-धीरे बढ़ने लगा. शुरुआत में यह क्षेत्र सीमित था, लेकिन फिर जामा मस्जिद की दिशा से बड़ा बाज़ार फैलना शुरू हुआ और होते-होते यह विस्तार पूरे शहर में फैल गया. व्यापारिक गतिविधियां बढ़ीं, लोगों की आवाजाही बढ़ी और शहर का स्वरूप भी बदलता चला गया.

पारंपरिक उद्योगों और उत्पादों के लिए फेमस
मराठों के आगमन ने भी बरेली के विकास में अहम भूमिका निभाई. उनके प्रभाव से यहां की संरचना, बाजार और प्रशासनिक व्यवस्था में बदलाव आए, जिससे बरेली एक महत्वपूर्ण नगर के रूप में उभरकर सामने आया. बरेली केवल ‘झुमका सिटी’ तक सीमित नहीं है, बल्कि यह अपने पारंपरिक उद्योगों और उत्पादों के लिए भी पूरे देश में जाना जाता रहा है. यहां का केन फर्नीचर, मांझा, पतंग, सुरमा और मसूर जैसी चीजें न सिर्फ स्थानीय स्तर पर, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी मशहूर रही हैं. इन उद्योगों ने बरेली की अर्थव्यवस्था और पहचान दोनों को मजबूत किया.

बरेली का लगातार हो रहा विकास
समय के साथ शहर के कई इलाकों के नाम भी बदलते गए, जो इस बात का संकेत हैं कि बरेली लगातार विकास और परिवर्तन की राह पर आगे बढ़ता रहा. इज्जतनगर और श्यामगंज जैसे इलाके आज नए नामों के साथ जाने जाते हैं और शहर के विस्तार की कहानी को दर्शाते हैं. आज का बरेली आधुनिक सुविधाओं, शिक्षा संस्थानों, व्यापारिक केंद्रों और तेजी से बढ़ते इन्फ्रास्ट्रक्चर के साथ एक नए युग में प्रवेश कर चुका है.

इसके साथ ही यह शहर अपने अतीत को भी संजोए हुए है, जो इसकी असली पहचान है. बांस के घने जंगलों से लेकर एक विकसित और आधुनिक शहर बनने तक बरेली का यह सफर केवल विकास की कहानी नहीं है, बल्कि यह इतिहास, संस्कृति और परंपरा का भी एक अनोखा संगम है.



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