नई दिल्ली. दुनिया में कुछ खेल ऐसे है जिनमें कप्तान का रोल बहुत निर्णायक होता है क्रिकेट भी उन्हीं खेलों में से एक है. भारतीय क्रिकेट के इतिहास में कई महान कप्तान हुए, कुछ ने अपनी बल्लेबाज़ी से देश को गौरवान्वित किया, तो कुछ ने नेतृत्व से इतिहास रचा. लेकिन एक नाम ऐसा भी है, जिसे लोग उसकी उपलब्धियों से ज़्यादा विवादों के लिए याद करते हैं.
एक ऐसा कप्तान, जिसने मैदान पर कम और सत्ता, रुतबे तथा पैसे के दम पर ज़्यादा सुर्खियाँ बटोरीं.
वो खिलाड़ी, जिसकी बल्लेबाज़ी औसत सिर्फ 8 रहा, जिसने महज़ 3 टेस्ट खेले फिर भी भारतीय टीम की कप्तानी की. यह कहानी है सर विजयनगरम यानी “विज्जी” की भारत के क्रिकेट इतिहास के सबसे विवादित चेहरों में से एक.
जब क्रिकेट में टैलेंट से ज़्यादा चलता था रुतबा
1930 के दशक का भारतीय क्रिकेट आज जैसा प्रोफेशनल नहीं था. उस दौर में टीम चयन पर राजघरानों और अमीर लोगों का गहरा प्रभाव होता था विज्जी भी एक शाही परिवार से आते थे और उनके पास बेहिसाब दौलत तथा राजनीतिक पहुंच थी. कहा जाता है कि उन्होंने अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर 1936 के इंग्लैंड दौरे के लिए भारतीय टीम की कप्तानी हासिल की. क्रिकेट विशेषज्ञों का मानना था कि उस टीम में उनसे कहीं बेहतर खिलाड़ी मौजूद थे, लेकिन कप्तानी विज्जी को मिली. यहीं से शुरू हुआ भारतीय क्रिकेट का सबसे विवादास्पद अध्याय.
टीम के अंदर बंटवारा और विवाद
इंग्लैंड दौरे के दौरान टीम दो गुटों में बंट गई एक तरफ थे विज्जी के करीबी खिलाड़ी, और दूसरी ओर वे क्रिकेटर जो योग्यता के आधार पर सम्मान चाहते थे. लाला अमरनाथ जैसे दिग्गज खिलाड़ी से उनका विवाद इतना बढ़ा कि उन्हें बीच दौरे से ही वापस भारत भेज दिया गया. कई क्रिकेट इतिहासकार मानते हैं कि यह फैसला व्यक्तिगत दुश्मनी से प्रेरित था. इतना ही नहीं, उस दौर के मशहूर खिलाड़ियों सी के नायडू और वजीर अली के साथ भी उनके संबंध खराब रहे।
सोने की घड़ी वाला विवाद
विज्जी से जुड़ा सबसे चर्चित आरोप उस समय सामने आया, जब कहा गया कि उन्होंने इंग्लैंड के बल्लेबाज़ मुश्ताक अली को रन आउट कराने के लिए एक खिलाड़ी को सोने की घड़ी देने की पेशकश की थी. हालांकि इस घटना के पुख्ता प्रमाण आज भी विवादित हैं, लेकिन यह किस्सा क्रिकेट इतिहास में लंबे समय तक चर्चा का विषय बना रहा.
मैदान पर पूरी तरह फ्लॉप
जहां कप्तानी को लेकर इतना विवाद था, वहीं प्रदर्शन भी बेहद खराब रहा. विज्जी ने अपने टेस्ट करियर में सिर्फ 3 मैच खेले और उनका बल्लेबाज़ी औसत लगभग 8 रहा. ना कोई बड़ी पारी, ना कोई यादगार कप्तानी,
ना कोई क्रिकेटिंग विरासत. यही वजह है कि उन्हें अक्सर भारत के सबसे असफल टेस्ट कप्तानों में गिना जाता है.
फिर भी मिला ‘नाइटहुड’
दिलचस्प बात यह है कि इतने खराब दौरे और विवादों के बावजूद उन्हें ब्रिटिश शासन द्वारा “Sir” की उपाधि दी गईवे नाइटहुड पाने वाले चुनिंदा भारतीय क्रिकेटरों में शामिल हो गए लेकिन आज़ादी के बाद उन्होंने यह उपाधि त्याग दी उनका मानना था कि एक स्वतंत्र भारत में ब्रिटिश सम्मान का कोई महत्व नहीं होना चाहिए.
विज्जी की कहानी भारतीय क्रिकेट का वह अध्याय है, जहां राजनीति, अहंकार, शक्ति और क्रिकेट आपस में टकराते दिखाई देते हैं.


