Aviation & Nanocomposite: रक्षा और एयरोस्पेस क्षेत्र में भारत ने बड़ी और ऐतिहासिक छलांग लगाई है. भारतीय वैज्ञानिकों ने एयरक्राफ्ट्स के लैंडिंग गियर के लिए एक ऐसा हल्का और अत्यधिक मजबूत नैनोकॉम्पोजिट तैयार किया है, जो अमेरिका जैसे दुनिया के ताकतवर देशों के माथे पर पसीना ला सकता है. यह नया मटेरियल न केवल एयरक्राफ्ट्स को लैंडिंग के समय अतिरिक्त सुरक्षा प्रदान करेगा. साथ ही, इसकी कॉस्ट मौजूदा विकल्पों के मुकाबले 60 प्रतिशत से भी कम है.
दरअसल, किसी भी एयरक्राफ्ट का लैंडिंग गियर बेहद पार्ट होता है. एयरक्राफ्ट को जब आसमान से जमीन पर उतरना होता है, तो लैंडिंग गियर को भारी दबाव और घिसाव का सामना करना पड़ता है. रनवे पर उतरते समय एयरक्राफ्ट का सारा वजन इन्हीं पहियों और गियर पर पड़ता है. मौजूदा समय में लैंडिंग गियर बनाने के लिए अल्ट्रा-हाई-स्ट्रेंथ स्टील, टाइटेनियम और एल्युमिनियम का इस्तेमाल किया जाता है.
हालांकि एल्युमिनियम वजन में हल्का होता है, लेकिन अधिक दबाव पड़ने पर इसका टिकना मुश्किल हो जाता है. वहीं, दूसरी ओर स्टील और टाइटेनियम भारी होने के साथ-साथ काफी महंगे भी होते हैं. इससे एयरक्राफ्ट का कुल वजन तो बढ़ता ही है, साथ ही फ्यूल की खपत भी ज्यादा होती है.
एनआईटी राउरकेला की पहल से चौंकी दुनिया
- इस समस्या का हल निकालने के लिए एनआईटी राउरकेला के मेटलर्जिकल और मैटेरियल्स इंजीनियरिंग विभाग के वैज्ञानिकों ने एक खास तरह का नया मैटेरियल तैयार किया है.
- इसे हाइब्रिड नैनोकॉम्पोजिट कहा जाता है. यह नैनोकॉम्पोजिट इंसान के बाल से करीब 1 लाख गुना ज्यादा पतला होता है. इसके बावजूद यह बहुत मजबूत है और आसानी से घिसता नहीं है.
- इस खास सामग्री का वजन भी बहुत कम है, इसलिए इसे फाइटर प्लेन और ड्रोन (यूएवी) जैसे एयरक्राफ्ट्स के साथ-साथ सिविल एविएशन के एयरक्राफ्ट्स में इस्तेमाल करने के लिए बेहद अच्छा माना जा रहा है.
- हल्का होने के कारण यह एयरक्राफ्ट की परफॉर्मेंस को नकेवल बेहतर करेगा, बल्कि फ्लूल की खपत भी कम होगी. इस नैनोकॉम्पोजिट को बनाने के लिए वैज्ञानिकों ने कई आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल किया.
- इसमें कार्बन नैनोट्यूब्स का उपयोग किया गया, जिससे यह ज्यादा दबाव सहने और वजन को बराबर बांटने में सक्षम है. इसके साथ ही ग्रेफाइट नैनोप्लेटलेट्स मिलाए गए, जिससे इसकी मजबूती और बढ़ जाती है.
हाइब्रिड नैनोकॉम्पोजिट को ज्यादा टैंपरेचर में स्थिर रखने के लिए क्या किया गया?
हाइब्रिड नैनोकॉम्पोजिट को ज्यादा टैंपरेचर में भी स्थिर बनाए रखने के लिए हेक्सागोनल बोरॉन नाइट्राइड का इस्तेमाल किया गया है. यह एक खास तरह का मैटेरियल है, जो गर्मी को सहने की क्षमता बढ़ाता है और मैटेरियल को खराब होने से बचाता है. इसके कारण यह नैनोकॉम्पोजिट हाई टैंपरेचर में भी मजबूत बना रहता है. यही वजह है कि इसे एयरोस्पेस जैसे सेक्टर में उपयोग के लिए सबसे बेहतर माना जा रहा है.
इस नैनोकॉम्पोजिट के सभी कंपोनेंट्स को एक समान कैसे मिलाया गया?
इस नैनोकॉम्पोजिट के सभी कंपोनेंट्स को एल्युमिनियम के साथ अच्छी तरह मिलाने के लिए हाई-फ्रीक्वेंसी साउंड वेव्स यानी तेज ध्वनि तरंगों का इस्तेमाल किया गया. इन वेव्स की मदद से सभी छोटे-छोटे कंपोनेंट पूरे मिक्सचर में बराबर फैल जाते हैं. इससे यह भी सुनिश्चित होता है कि मैटेरियल के हर हिस्से में एक जैसी मजबूती बनी रहें.
इस मैटेरियल को मजबूत बनाने के लिए आगे कौन-सी प्रक्रिया अपनाई गई?
सभी कंपोनेंट्स को मिलाने के बाद इस मिक्सचर को बिना ऑक्सीजन वाले इंवायमेंट में रखा गया. फिर इसे ज्यादा टैंपरेचर और प्रेशर पर गर्म करके दबाया गया. इस प्रक्रिया से कंपोनेंट आपस में मजबूती से जुड़ गए और एक मजबूत मैटेरियल तैयार हुआ. ऑक्सीजन न होने से मैटेरियल में किसी तरह का ऑक्सीनाइजेशन नहीं हुआ, जिससे इसकी गुणवत्ता बनी रही.
इस शोध को किन वैज्ञानिकों ने पूरा किया और इसका नेतृत्व किसने किया?
इस रसिर्च का नेतृत्व प्रोफेसर सैयद नसीमुल आलम ने किया. उनके साथ डॉ. अर्का घोष, डॉ. आशुतोष दास, डॉ. पंकज श्रीवास्तव, नित्यानंद साहू और पार्थ पटेल जैसे कई शोधकर्ता शामिल थे. इसके अलावा दक्षिण अफ्रीका के एक वैज्ञानिक ने भी इस प्रोजेक्ट में अपना योगदान दिया. यह एक ऐसा टीम वर्क है, जिसमें अलग-अलग विशेषज्ञों ने मिलकर इस बेहतरीन तकनीक को तैयार किया है.
इस नए मैटेरियल की खासियतें क्या हैं और यह कैसे घिसाव को कम करता है?
प्रोफेसर आलम के अनुसार, यह नया मैटेरियल घिसाव को काफी हद तक कम करता है. इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसकी सतह पर एक पतली सुरक्षात्मक परत बन जाती है, जो इसे जल्दी खराब होने से बचाती है. इसके अलावा इसका अंदरूनी ढांचा बहुत मजबूत होता है, जिससे यह भार को सही तरीके से संभाल सकता है. यही गुण इसे लंबे समय तक टिकाऊ और भरोसेमंद बनाते हैं, खासकर उन जगहों पर जहां लगातार घर्षण होता है.


