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रामपुर की जरी जरदोजी, नवाबी दौर से चली आ रही कढ़ाई कला, 40 हजार को रोजगार, अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंची स्थानीय पहचान, जाने

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रामपुरः रामपुर की तंग गलियों में आज भी ऐसा नजारा दिख जाता है जो सीधे नवाबों के दौर की याद दिला देता है. यहां हर गली में दुकान, घर के आंगन में लकड़ी का बड़ा अड्डा रखा है. उस पर कसकर तना कपड़ा, और उसके चारों ओर बैठी कारीगरों की उंगलियां जो सुई-धागे, मोती, सितारे और जरी से साधारण कपड़े को शाही लिबास में बदल देती हैं. यही रामपुर की जरी-जरदोजी है, जो वक्त के साथ बदली जरूर लेकिन खत्म नहीं हुई.

इस कारीगरी की जड़ें रामपुर के नवाबी दौर से जुड़ी हैं. तब शाही परिवारों के कपड़ों पर हाथ से कढ़ाई की जाती थी. कहा जाता है कि उस दौर में कपड़ों पर सोने के बारीक तार, मोती और कीमती सजावट जड़ी जाती थी. शाही पोशाकों की चमक महलों तक सीमित थी, लेकिन समय बदला तो यही हुनर गलियों और घरों तक पहुंच गया आज वही कारीगरी आम लोगों की मेहनत और रोजी का सहारा बन चुकी है.

40 हजार लोगों के लिए रोजगार का जरिया

रामपुर में जरी-जरदोजी सिर्फ एक कारोबार नहीं बल्कि कई परिवारों की पीढ़ियों से चली आ रही पहचान है. शहर के मोहल्लों से लेकर गांवों तक यह काम फैला है शाहबाद गेट, शुतरखाना, पक्काबाग, राजद्वारा, अजीतपुर, अंगूरीबाग जैसे इलाकों में घर-घर यह काम होता है. स्वार, टांडा, बिलासपुर, सैदनगर और चमरौआ जैसे कस्बों में भी बड़ी संख्या में लोग इससे जुड़े हैं. जिले में करीब 35 से 40 हजार कारीगर इस काम से रोजी कमाते हैं.

इस हुनर की सबसे खास बात यह है कि मशीनों के दौर में भी यहां काम हाथों से होता है. कारोबारी कपड़ा देकर जाते हैं और कारीगर कई दिनों तक उस पर बारीक कढ़ाई करते हैं. लकड़ी के अड्डे पर कपड़ा कसने के बाद उस पर सितारे, मोती, नग और दबका कोरा टांका जाता है कई जगह कपड़ों की छोटी-छोटी कतरनों को जोड़कर नए डिजाइन तैयार किए जाते हैं, जो जरी पैचवर्क की अलग पहचान बन चुके हैं.

दिल्ली मुंबई से आते हैं कढ़ाई के ऑर्डर

रामपुर के कई घरों में महिलाएं घरेलू काम के साथ जरी जरदोजी करती हैं. सुबह घर के काम निपटाने के बाद अड्डे के पास बैठकर घंटों कढ़ाई करती हैं. इससे घर बैठे आमदनी होती है और परिवार की मदद भी यही वजह है कि यह कला सिर्फ बाजार की चीज नहीं बल्कि घरों की अर्थव्यवस्था का हिस्सा भी है. रामपुर के कारीगर शाजिद खा बताते है कि यहां से तैयार सूट, साड़ी, लहंगे और शरारे दिल्ली, मुंबई, जयपुर और चंडीगढ़ तक जाते हैं. कई कारोबारी इन्हें दिल्ली के बायिंग सेंटर के जरिए खाड़ी देशों, स्पेन, अमेरिका और इंग्लैंड तक भेजते हैं. खासकर कुवैत में रामपुर के जरी वाले सूटों की अच्छी मांग बताई जाती है स्थानीय कारीगरों का काम अंतरराष्ट्रीय बाजार तक है.

रामपुर कारीगर मोहम्मद जावेद खा बताते है वह पिछले 25 सालों से इस काम में जुड़े हुए हैं और आज उनकी उम्र 45 साल की है. बचपन से ही इस काम में जुड़ गए क्योंकि उनके बुजुर्ग भी यही काम करते थे. वे बताते हैं कि लेकिन इस चमक के पीछे संघर्ष भी है. पहले इस काम में बेहतर कमाई होती थी, लेकिन अब मेहनत के मुकाबले आमदनी कम है. नई पीढ़ी दूसरी नौकरियों की ओर जा रही है. फिर भी कुछ परिवार आज भी इस विरासत को थामे हुए हैं. उनके लिए यह सिर्फ रोजगार नहीं बल्कि पुरखों से मिला हुनर है.



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