अयोध्या: अयोध्या में 500 वर्ष के लंबे संघर्ष के बाद प्रभु राम का भव्य मंदिर बनकर तैयार हो चुका है. राम मंदिर के संघर्ष की कहानी लगभग 500 वर्ष पुरानी है, जिसमें से एक अध्याय प्रभु राम के प्रकट होने का है. 22-23 दिसंबर 1949 की रात अयोध्या के विवादित परिसर में हुई घटना भारतीय इतिहास के सबसे चर्चित और संवेदनशील प्रसंगों में से एक मानी जाती है. इस घटना के संदर्भ में कई कथाएँ और दृष्टिकोण प्रचलित हैं. इन्हीं में एक विवरण उस समय फैजाबाद जिले के कलेक्टर के. के. नायर का है, जिन्हें परिस्थितियों के बीच अत्यंत कठिन निर्णय लेने पड़े.
एक ओर धार्मिक भावनाएँ, तो दूसरी ओर प्रशासनिक जिम्मेदारियाँ
बताया जाता है कि उस रात परिसर के भीतर रामलला प्रकट हुए थे. इस घटना के बाद क्षेत्र में तनाव बढ़ने की आशंका थी, क्योंकि यह स्थल लंबे समय से हिंदू और मुस्लिम समुदायों के बीच विवाद का केंद्र रहा था. प्रशासन के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी कानून-व्यवस्था बनाए रखना और किसी भी प्रकार के सांप्रदायिक टकराव को रोकना. मौजूदा कलेक्टर के. के. नायर पर उस समय विभिन्न पक्षों से दबाव था. एक ओर धार्मिक भावनाएँ थीं, तो दूसरी ओर प्रशासनिक जिम्मेदारियाँ.
उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, नायर ने तत्काल स्थिति का आकलन करते हुए यह निर्णय लिया कि मूर्तियों को तत्काल हटाने से हालात बिगड़ सकते हैं और दंगा भड़क सकता है. इसलिए उन्होंने यथास्थिति बनाए रखने का विकल्प चुना और परिसर को सील कर दिया गया. इसके बाद बाहरी हिस्से में पूजा-पाठ और भजन-कीर्तन की अनुमति दी गई.
क्या है पूरी कहानी
विश्व हिंदू परिषद और राम मंदिर आंदोलन के जानकार शरद शर्मा ने बताया कि राम मंदिर से जुड़ी यह बहुत ही अद्भुत और रोचक घटना है. 22 और 23 दिसंबर 1949 को जब विवादित परिसर में प्रभु राम प्रकट हुए, उस दौरान फैजाबाद जिले के कलेक्टर के. के. नायर थे. कलेक्टर के. के. नायर के पास फैसले लेने पर कई तरह के दबाव आ रहे थे. समाज के प्रति, धर्म के प्रति, के. के. नायर काफी निष्ठावान भी थे. जब प्रभु राम प्रकट हुए, तब उस दौरान काफी विवाद बढ़ गया था. हिंदू-मुस्लिम में कोई दंगा न हो और अपनी कर्तव्यनिष्ठा का पालन करते हुए मूर्ति वहीं स्थित रहे, इधर-उधर न हो, इसको लेकर आदेश भी दिया.
इसके बाद उस दौरान देश के प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू को जब इस बात की जानकारी प्राप्त हुई, तो उन्होंने वहां से मूर्ति हटाने के लिए मौजूदा कलेक्टर को आदेश जारी किया और यह आदेश कई बार जारी किया. उन्होंने मौजूदा कलेक्टर के. के. नायर को पत्र लिखा और पत्र में कहा कि तत्काल प्रभाव से इस मूर्ति को वहां से हटाया जाए.
के. के. नायर ने नेहरू के आदेश को मानने से किया इनकार
इसके बाद के. के. नायर ने पंडित जवाहरलाल नेहरू के आदेश को मानने से इनकार कर दिया. के. के. नायर ने जवाब दिया कि अगर ऐसा होता है, तो यहां पर दंगा होगा, विवाद होगा. हम इस प्रकार ऐसा नहीं कर सकते. इसके बाद वहां पर ताला लगाया गया. बाहर पूजा-पाठ और भजन-कीर्तन शुरू हुआ. अगर उस दौरान मूर्ति वहां से हटा दी जाती, तो आज अयोध्या में भव्य राम मंदिर का सपना साकार नहीं होता. लंबे संघर्ष के बाद आज लाखों की संख्या में श्रद्धालु प्रभु राम के दर्शन-पूजन कर रहे हैं.


