13.7 C
Munich

‘श्रमिकों की मांगें अपनी जगह सही, लेकिन…’, न्यूनतम मजदूरी बढ़ते ही ग्रेटर नोएडा के उद्योगों पर आफत, बिगड़ा संतुलन

Must read


Last Updated:

Greater Noida News : नोएडा में श्रमिकों के उग्र प्रदर्शन के बाद योगी सरकार ने प्रदेशभर में न्यूनतम मजदूरी बढ़ा दी है. गौतमबुद्धनगर और गाजियाबाद प्रथम श्रेणी में और दूसरे जिलों को दो वर्गों में विभाजित किया गया है. यहां अकुशल श्रमिकों के लिए 13,690 रुपये, अर्द्धकुशल के लिए 15,059 और कुशल श्रमिकों के लिए 16,868 रुपये मासिक न्यूनतम मजदूरी तय की गई है. छोटे और मझोले उद्योगों का कहना है कि अचानक बढ़ी मजदूरी और कच्चे माल की महंगाई ने उनकी चिंता बढ़ा दी है. उद्योग जगत का कहना है कि इस अप्रत्याशित बदलाव ने उनका पूरा आर्थिक संतुलन बिगाड़ दिया है और कई इकाइयां अब नुकसान की कगार पर पहुंच रही हैं.

ग्रेटर नोएडा. दिवाली में अभी काफी समय है, लेकिन ये लंबा पीरियड आमतौर पर छोटे और मझोले उद्योगों के लिए सबसे व्यस्त और मुनाफे वाला माना जाता है. हालांकि इस बार हालात इसके उलट नजर आ रहे हैं. अचानक बढ़ी मजदूरी, कच्चे माल की महंगाई और बढ़ती उत्पादन लागत ने उद्यमियों की चिंता बढ़ा दी है. उद्योग जगत का कहना है कि इस अप्रत्याशित बदलाव ने उनका पूरा आर्थिक संतुलन बिगाड़ दिया है और कई इकाइयां अब नुकसान की कगार पर पहुंच रही हैं. इंडस्ट्रियल एरिया एसोसिएशन (IEA) के अध्यक्ष संजीव शर्मा के अनुसार, श्रमिकों की तनख्वाह में हुई अचानक बढ़ोतरी से उद्योगों की लागत में बड़ा उछाल आया है. उद्यमियों ने अपने उत्पादन और मुनाफे का जो कैलकुलेशन पहले से तय किया था, वह पूरी तरह गड़बड़ा गया है. कच्चे माल के दामों में भी लगातार वृद्धि हो रही है, जिससे स्थिति और गंभीर हो गई है.

वैकल्पिक रास्ते तलाशने शुरू

लोकल 18 से संजीव कहते हैं कि दिवाली से पहले का समय ऑर्डर पूरा करने और अधिक उत्पादन का होता है, लेकिन इस समय लागत बढ़ने से मुनाफे पर सीधा असर पड़ रहा है. कई उद्योगों को अब यह डर सता रहा है कि वे इस सीजन में लाभ कमाने के बजाय नुकसान में चले जाएंगे. कुछ उद्यमियों ने तो वैकल्पिक रास्ते तलाशने शुरू कर दिए हैं, जिनमें उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों से सस्ती सप्लाई लेने की योजना शामिल है.

उद्यमी बीके तिवारी इस स्थिति को पहले भी सामने आ चुकी समस्या से जोड़ते हुए कहते हैं कि वर्ष 2014 में भी इसी तरह की परिस्थितियां बनी थीं, जब हड़ताल के कारण उद्योगों को भारी नुकसान उठाना पड़ा था. श्रमिकों की मांगें अपनी जगह सही हो सकती हैं, लेकिन सरकार को किसी भी नई व्यवस्था को लागू करने से पहले उद्योग प्रतिनिधियों के साथ संवाद करना चाहिए. यदि पहले चर्चा हो जाती, तो इसके प्रभावों का बेहतर आकलन किया जा सकता था और इस तरह की अचानक स्थिति से बचा जा सकता था.

लघु उद्योग भारती के जिला अध्यक्ष नरेश कुमार गुप्ता कहते हैं कि पहले श्रमिकों और उद्यमियों के बीच बेहतर तालमेल था. श्रमिक पूरी निष्ठा और लगन से काम करते थे और बदले में उन्हें न्यूनतम वेतन, ओवरटाइम, साप्ताहिक अवकाश, बोनस और अन्य सुविधाएं दी जाती थीं. उन्होंने आरोप लगाया कि बाहरी हस्तक्षेप के कारण अब यह संतुलन बिगड़ गया है, जिससे उद्योगों का माहौल भी प्रभावित हुआ है.

कितनी बढ़ रही लागत

लागत के बढ़ते दबाव का उदाहरण देते हुए नरेश कहते हैं कि यदि ईएल, सीएल, बोनस और अन्य सुविधाओं को जोड़ लिया जाए तो प्रति श्रमिक उत्पादन लागत लगभग 6000 रुपये तक बढ़ जाती है. ऐसे में यदि किसी उद्योग में 300 श्रमिक कार्यरत हैं, तो कुल अतिरिक्त भार करीब 18 लाख रुपये तक पहुंच जाता है. यह बढ़ोतरी छोटे उद्योगों के लिए बेहद भारी साबित हो रही है, क्योंकि उनकी पूंजी और मुनाफे की क्षमता सीमित होती है.

नरेश कहते हैं कि यदि स्थिति को जल्द नहीं संभाला गया, तो कई छोटी इकाइयों को उत्पादन घटाने या बंद करने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है. इसका असर न केवल उद्यमियों पर, बल्कि रोजगार पर भी पड़ेगा. ऐसे में सरकार से अपेक्षा की जा रही है कि वह उद्योगों की समस्याओं को गंभीरता से लेते हुए राहत उपायों की घोषणा करे.

About the Author

Priyanshu Gupta

Priyanshu has more than 10 years of experience in journalism. Before News 18 (Network 18 Group), he had worked with Rajsthan Patrika and Amar Ujala. He has Studied Journalism from Indian Institute of Mass Commu…और पढ़ें



Source link

- Advertisement -spot_img

More articles

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

- Advertisement -spot_img

Latest article