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समस्तीपुर में गन्ने की खेती करने वाले किसानों के लिए अब वैज्ञानिक तकनीक एक नई उम्मीद लेकर आई है. हर सीजन में बाजार से महंगे बीज खरीदने की मजबूरी जहां खेती की लागत बढ़ा देती है, वहीं कई बार उत्पादन भी संतोषजनक नहीं मिलता. ऐसे में डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा के वैज्ञानिकों द्वारा सुझाई गई “एकल गांठ विधि” किसानों के लिए गेमचेंजर साबित हो सकती है. इस तकनीक के जरिए किसान अपने ही खेत में कम लागत में स्वस्थ और अधिक पौधे तैयार कर बेहतर उत्पादन हासिल कर सकते हैं.
समस्तीपुर. गन्ने की खेती करने वाले अधिकांश किसान हर सीजन में बाजार से बीज खरीदते हैं, जिससे खेती की लागत बढ़ जाती है. कई बार महंगे बीज लेने के बावजूद पौधों की गुणवत्ता संतोषजनक नहीं मिलती. ऐसे में यदि किसान अपने ही खेत में तैयार गन्ने से पौधा बना लें, तो खर्च कम होने के साथ-साथ बेहतर उत्पादन भी हासिल किया जा सकता है.
इसी उद्देश्य से लोकल लैटिन की टीम ने पूसा स्थित डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय के अनुसंधान केंद्र पहुंचकर वैज्ञानिक डॉ. बलवंत कुमार से खास बातचीत की. वैज्ञानिक ने बताया कि गन्ना ऐसी फसल है जिसे आधुनिक तकनीक के जरिए किसान स्वयं तैयार कर सकते हैं. इसके लिए “एकल गांठ विधि” सबसे उपयोगी और किफायती तरीका माना जा रहा है. इस विधि में किसान सबसे पहले स्वस्थ और अच्छी गुणवत्ता वाले गन्ने का चयन करते हैं. इसके बाद गन्ने को विशेष कटर मशीन से इस प्रकार काटा जाता है कि प्रत्येक टुकड़े में केवल एक गांठ मौजूद रहे.यही गांठ आगे चलकर नए पौधे के रूप में विकसित होती है. वैज्ञानिकों के अनुसार यह तरीका कम जगह में अधिक पौधा तैयार करने के लिए बेहद प्रभावी साबित हो रहा है.
नमी का सही प्रबंधन पौधा तैयार करने में निभाता है अहम भूमिका
डॉ. बलवंत कुमार ने बताया कि कटिंग करने के बाद किसान इन एकल गांठों को ट्रे, प्लास्टिक ग्लास या छोटे कंटेनर में लगा सकते हैं. इसके लिए वर्मी कंपोस्ट, कोकोपीट या अच्छी भुरभुरी मिट्टी का उपयोग करना चाहिए ताकि पौधों को पर्याप्त पोषण और नमी मिल सके.गन्ने की गांठ को लगाने के बाद नियमित रूप से नमी बनाए रखना बेहद जरूरी होता है. यदि मिट्टी सूख जाती है तो अंकुरण प्रभावित हो सकता है. वैज्ञानिकों के अनुसार लगभग 25 से 35 दिनों के भीतर इन गांठों से मजबूत पौधे तैयार हो जाते हैं. जब पौधे पूरी तरह विकसित हो जाएं, तब किसान उन्हें खेत में रोप सकते हैं. यदि खेत तैयार न हो या पौधों को कुछ दिन और सुरक्षित रखना हो, तो ट्रे में ही नमी बनाए रखते हुए पौधों को रखा जा सकता है. इस तकनीक की सबसे बड़ी खासियत यह है कि कम बीज में अधिक पौधे तैयार हो जाते हैं और रोगमुक्त पौध मिलने की संभावना भी बढ़ जाती है. इससे किसान अतिरिक्त पौध तैयार कर दूसरे किसानों को बेचकर अतिरिक्त आमदनी भी प्राप्त कर सकते हैं.
सही किस्म का चयन बढ़ा सकता है उत्पादन
वैज्ञानिक ने बातचीत के दौरान यह भी स्पष्ट किया कि केवल पौधा तैयार करना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि सही किस्म का चयन करना भी उतना ही जरूरी है. उन्होंने बताया कि बिहार और आसपास के जिलों के किसानों के लिए राजेंद्र गन्ना-1 काफी उपयुक्त किस्म मानी जाती है. यह किस्म बेहतर उत्पादन देने के साथ किसानों को अच्छा लाभ भी देती है. इसके अलावा किसान CoP 112 किस्म का भी उपयोग कर सकते हैं, जो कई क्षेत्रों में बेहतर परिणाम दे रही है. वहीं जल जमाव वाले क्षेत्रों के लिए “राजेंद्र गन्ना-2” अधिक लाभकारी मानी जाती है क्योंकि यह जलभराव को सहन करने की क्षमता रखती है. वैज्ञानिकों का कहना है कि यदि किसान आधुनिक तकनीक और सही किस्म का उपयोग करें तो गन्ने की खेती अधिक लाभकारी बन सकती है. आज के समय में जब खेती की लागत लगातार बढ़ रही है,
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