Saharanpur Kanha Upvan Gaushala: सहारनपुर की कान्हा उपवन गौशाला अपनी विशिष्ट कार्यप्रणाली के लिए समय-समय पर चर्चा में रहती है. खुद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ यहां पहुंचकर गोबर और गोमूत्र से बनने वाले उत्पादों की सराहना कर चुके हैं. सावलपुर नवादा में नगर निगम द्वारा संचालित इस गौशाला में वर्तमान में 500 से अधिक आवारा गोवंश संरक्षित हैं. यह गौशाला उत्तर प्रदेश में आत्मनिर्भरता के मामले में शीर्ष स्थान रखती है, जहां लगभग 25 से 30 प्रकार के उत्पाद तैयार किए जा रहे हैं. इन उत्पादों की मांग न केवल प्रदेश में है, बल्कि देशभर में लोग इन्हें ऑनलाइन प्लेटफॉर्म अमेजन के जरिए मंगवा रहे हैं.
गोबर से बिजली उत्पादन: ऊर्जा संरक्षण की अनूठी पहल
आत्मनिर्भरता की दिशा में एक और बड़ा कदम उठाते हुए इस गौशाला ने बिजली उत्पादन में भी महारत हासिल कर ली है. यहां गायों के गोबर से बायोगैस बनाई जाती है और फिर उस गैस को बिजली में परिवर्तित किया जाता है. इस बिजली से गौशाला के पंखे, चारा काटने वाली मशीनें और सबमर्सिबल पंप जैसे तमाम इलेक्ट्रॉनिक संयंत्र चलाए जा रहे हैं. इससे न केवल बिजली के बिल में कटौती हुई है, बल्कि गौशाला ने अपना वैकल्पिक ऊर्जा स्रोत भी तैयार कर लिया है.
ऊर्जा संकट का समाधान और आर्थिक बचत
पशु चिकित्सा एवं कल्याण अधिकारी डॉ. संदीप मिश्रा ने लोकल 18 से विशेष बातचीत में बताया कि नगर निगम सहारनपुर द्वारा संचालित इस गौशाला को आत्मनिर्भर बनाने के लिए बायोगैस का तीन तरह से उपयोग किया जा रहा है. सबसे पहले बायोगैस को इलेक्ट्रिसिटी में कन्वर्ट किया जाता है, जिससे 6 से 7 घंटे तक विभिन्न उपकरण चलाए जाते हैं. डॉ. मिश्रा के अनुसार, पहले इन कामों के लिए डीजल जनरेटर का उपयोग करना पड़ता था, जो काफी महंगा था. अब बायोगैस संयंत्र लगने से डीजल और सरकारी बिजली दोनों की बड़ी बचत हो रही है.
वैश्विक संकट के समय ईंधन का विकल्प
डॉ. मिश्रा ने बताया कि इस 50 क्यूबिक मीटर क्षमता वाले संयंत्र का लाभ केवल बिजली तक सीमित नहीं है. वैश्विक ऊर्जा संकट के दौरान इस बायोगैस को ईंधन के रूप में भी इस्तेमाल किया गया, जिससे भोजन आदि बनाने का प्रबंध किया गया. 3 साल से सफलतापूर्वक चल रहे इस प्रोजेक्ट का मुख्य उद्देश्य ऊर्जा संरक्षण और गांव में बिजली की कमी के बावजूद कार्यों को निर्बाध रूप से जारी रखना है. यह पहल न केवल पर्यावरण के अनुकूल है बल्कि प्रधानमंत्री के ‘वेस्ट टू वेल्थ’ विजन को भी धरातल पर उतार रही है.
सहारनपुर की कान्हा उपवन गौशाला की सबसे बड़ी विशेषता क्या है?
इस गौशाला की सबसे बड़ी विशेषता इसकी आत्मनिर्भरता है. यह उत्तर प्रदेश की पहली ऐसी गौशाला है जो न केवल 500 से अधिक गोवंश का संरक्षण कर रही है, बल्कि गोबर और गोमूत्र से 25-30 प्रकार के उत्पाद बनाकर उन्हें अमेजॉन जैसे प्लेटफॉर्म पर देशभर में बेच रही है. साथ ही, यह अब बिजली उत्पादन में भी आत्मनिर्भर हो गई है.
गौशाला में बायोगैस से बिजली बनाने का क्या लाभ हो रहा है?
बायोगैस से प्रतिदिन 6 से 7 घंटे बिजली का उत्पादन होता है. इससे गौशाला में चारा काटने वाली मशीनें, सबमर्सिबल पंप और पंखे जैसे इलेक्ट्रॉनिक उपकरण चलाए जाते हैं. इससे पहले इस्तेमाल होने वाले महंगे डीजल जनरेटर की जरूरत खत्म हो गई है, जिससे डीजल और बिजली के खर्च में भारी बचत हो रही है.
कान्हा उपवन में बायोगैस संयंत्र की क्षमता कितनी है और इसका उपयोग किन क्षेत्रों में होता है?
यहां 50 क्यूबिक मीटर की क्षमता वाला बायोगैस संयंत्र लगा हुआ है. इसका उपयोग मुख्य रूप से तीन तरह से किया जाता है: पहला बिजली बनाने में, दूसरा ऊर्जा संरक्षण में, और तीसरा ईंधन के रूप में भोजन बनाने के लिए.
कान्हा उपवन गौशाला में गोबर से बिजली बनने की तकनीकी प्रक्रिया क्या है?
यहां बिजली बनाने के लिए ‘बायोगैस टू इलेक्ट्रिसिटी’ तकनीक का उपयोग किया जाता है. सबसे पहले गाय के गोबर को एक बड़े 50 क्यूबिक मीटर के बायोगैस प्लांट (डाइजेस्टर) में डाला जाता है, जहाँ ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में गोबर के गलने से मीथेन गैस पैदा होती है. इस गैस को पाइप के जरिए एक विशेष बायोगैस जनरेटर तक पहुंचाया जाता है. जब यह गैस जनरेटर के इंजन में जलती है, तो वह मैकेनिकल ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में बदल देता है. इसी बिजली का उपयोग गौशाला के भारी उपकरणों जैसे चारा मशीन और सबमर्सिबल पंप चलाने में किया जाता है.


